नेपाल का आंदोलन बांग्लादेश-श्रीलंका पैटर्न से भी उग्र: घुटनभरी निराशा की विस्फोटक अभिव्यक्ति... नेताओं से नफरत
नेपाल का जेन-जी आंदोलन देश की भ्रष्ट और वंशवादी व्यवस्था के प्रति युवा पीढ़ी की घुटनभरी निराशा की विस्फोटक अभिव्यक्ति है। नौजवानों और आम लोगों में नेताओं के प्रति घोर नफरत दिख रही है।युवाओं का यह आक्रोश बांग्लादेश-श्रीलंका वाले पैटर्न से भी उग्र आंदोलन बन चुका है। इसका एक प्रमुख कारण 19% की बेरोजगारी दर है जो दक्षिण एशिया में सर्वाधिक है। पढ़िए ये रिपोर्ट
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विस्तार
नेपाल में छात्र और आम नागरिक सड़कों पर हैं। राजधानी काठमांडो से लेकर पोखरा और बिराटनगर तक प्रदर्शन हो रहे हैं। भीषण विरोध की आंधी में ओली सरकार तिनकों की तरह बिखर गई। आंदोलन की शुरुआत बेरोजगारी और भ्रष्टाचार विरोधी नारों से हुई, पर अब इसमें राजनीतिक असंतोष और सत्ता-विरोधी भावनाएं भी खुलकर सामने आ गईं। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह सिर्फ भ्रष्टाचार विरोध की लड़ाई नहीं है, बल्कि नेपाल की अस्थिर व वंशवादी राजनीतिक व्यवस्था के प्रति युवा पीढ़ी की घुटनभरी निराशा की विस्फोटक अभिव्यक्ति है। यह आंदोलन बांग्लादेश व श्रीलंका में हाल में हुए जनविद्रोह से भी आगे निकल गया है। इस आंदोलन में युवाओं व आम लोगों में नेताओं के प्रति घोर नफरत दिखाई दी।
नई दिल्ली स्थित सेंटर फार साउथ एशियन स्टडीज की शोधकर्ता डॉ. सीमा ठाकुर कहती हैं,नेपाल की स्थिति में बांग्लादेश और श्रीलंका के आंदोलनों जैसी समानताएं दिख रही हैं,पर वास्तविक विरोध के लिए लिहाज से ज्यादा उग्र है। वहां भी शुरुआत भ्रष्टाचार और महंगाई से हुई थी, जो बाद में सत्तारूढ़ नेतृत्व की वैधता पर सवालों में बदल गई। नेपाल में युवाओं की नाराजगी इस समय चरम पर है और यह केवल भ्रष्टाचार विरोध तक सीमित नहीं रह सकती। मामला सत्ता पलट तक भी सीमित नहीं है, क्योंकि प्रधानमंत्री और सरकार गद्दी छोड़ चुकी है फिर भी युवाओं का आक्रोश घट नहीं रहा है।
त्रिभुवन यूनिवर्सिटी, काठमांडो के राजनीतिक विश्लेषक प्रो. गोविंद अधिकारी नेपाल में पिछले एक दशक में बार-बार सरकारें बदलीं, पर रोजगार सृजन, शिक्षा सुधार और आर्थिक स्थिरता जैसे मुद्दों को नजरअंदाज किया गया। छात्र इसे उनके भविष्य के साथ धोखा मान रहे हैं। यही कारण है कि आंदोलन परिवर्तन से आगे अब सीधे सत्ता में भागीदारी चाहता है।
कोलंबो विश्वविद्यालय के दक्षिण एशिया विशेषज्ञ डॉ. अशोक परेरा का कहना है,श्रीलंका में 2022 का आंदोलन तब सरकार गिराने तक गया जब महंगाई व आर्थिक संकट ने लोगों को जीवित रहना मुश्किल कर दिया। नेपाल में सरकार ने समय रहते ठोस सुधार कदम नहीं उठाए इसीलिए यह आंदोलन भी सत्ता-विरोधी विद्रोह में बदल गया।
ढाका विश्वविद्यालय के समाजशास्त्री डॉ.रजा अनवर कहते हैं कि नेपाल में छात्र नेताओं की रणनीति बांग्लादेशी छात्रों जैसी है। तेज डिजिटल अभियान, धरना व सत्ता से जवाब मांगना। यह ट्रेंड द. एशिया के छोटे देशों में युवाओं की नई राजनीतिक भाषा को जन्म दे रहा है। यह गहरी असंतुष्टि, राजनीतिक अस्थिरता व नेतृत्व पर अविश्वास का परिणाम है। सरकार ने लंबे समय से इसे केवल छात्रों का आक्रोश मानकर नजरअंदाज किया, इसीलिए यह राजनीतिक भूचाल में बदल गया।
बेरोजगारी दर 19% द. एशिया में सर्वाधिक
नेपाल की अर्थव्यवस्था लंबे समय से धीमी गति से बढ़ रही है। विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक 2024-25 में नेपाल की जीडीपी वृद्धि दर मात्र 3.2 प्रतिशत रही, जबकि मुद्रास्फीति दर 7 प्रतिशत के आसपास बनी रही। सबसे गंभीर स्थिति रोजगार को लेकर है। नेपाल में युवा बेरोजगारी दर लगभग 19 प्रतिशत है, जो दक्षिण एशिया की सबसे ऊंची दरों में गिनी जाती है। हर साल लगभग 4 से 5 लाख युवा विदेश पलायन करते हैं, जिनमें से अधिकांश खाड़ी देशों और मलेशिया में मजदूरी करते हैं। जबकि नेताओं, अफसर और बिचौलियों के बच्चे विदेशों में पढ़ाई करने के नाम पर आलीशान जिंदगी जी रहे हैं। देश की कुल आय का लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा विदेशी प्रेषण (रेमिटेंसेस) से आता है, जिससे अर्थव्यवस्था टिक तो रही है, लेकिन घरेलू स्तर पर नौकरी का संकट और भयंकर तरीके से गहरा गया है।
नेताओं को चुन-चुन कर बनाया निशाना
नेपाली मीडिया के अनुसार आंदोलन के केंद्र में सिर्फ भ्रष्टाचार या बेरोजगारी का मुद्दा नहीं है, बल्कि राजनीतिक नेतृत्व के प्रति गहरा अविश्वास और और घोर नफरत भी है। नेपाल की सड़कों पर उठती नाराजगी यह संकेत दे रही है कि लोग अब दलों और उनके शीर्ष नेताओं से उम्मीद खो चुके हैं। इसीलिए नेताओं को चुन-चुन कर निशाना बनाया जा रहा है।
लोकतंत्र का अधूरा वादा
नई दिल्ली स्थित द. एशिया विशेषज्ञ डॉ. सीमा ठाकुर कहती हैं,1990 व 2006 के जनांदोलनों ने नेपाली जनता को लोकतंत्र और स्थिरता की उम्मीद दी थी। लेकिन दशकों बाद भी रोजगार, शिक्षा व स्वास्थ्य सेवाओं में ठोस सुधार नहीं हुए। इसलिए लोग मानने लगे हैं कि लोकतंत्र नेताओं के लिए सत्ता का खेल बन गया, जनता के लिए नहीं।
पाकिस्तान : बलूचिस्तान, सिंध खैबरपख्तूनख्वा में हमले
भारत के पड़ोसी देशों में पाकिस्तान की हालत संभवत: सबसे खराब है। पाकिस्तान के पूर्व पीएम इमरान खान को 9 मई, 2023 को गिरफ्तार किए जाने के बाद उनके समर्थकों ने लाहौर में प्रधानमंत्री आवास के साथ-साथ रावलपिंडी में सेना मुख्यालय और अधिकारियों के घरों पर हमला बोल दिया था। अभी हाल यह है कि पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में अलगाववादी आवाजें जोर पकड़ रही हैं। बलूच लिबरेशन आर्मी जैसे संगठन सीधे सरकार को चुनौती देते रहते हैं। खैबर पख्तूनख्वा और सिंध प्रांत में भी अक्सर हमले होते हैं।
श्रीलंका : आर्थिक संकट से उबरने की कोशिश
अप्रैल, 2022 में महंगाई और आर्थिक तंगी को लेकर राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे के खिलाफ प्रदर्शन हुए। जुलाई आते-आते प्रदर्शन हिंसा में बदल गया। 13 जुलाई को गोटबाया को मालदीव भागना पड़ा। देश अपने सबसे बुरे आर्थिक संकट से उबरने की कोशिश कर रहा है।
बांग्लादेश : शेख हसीना का हुआ तख्ता पलट
5 अगस्त, 2024 को बांग्लादेश में 2 महीने से जारी आरक्षण विरोधी आंदोलन बेकाबू हो गया। प्रदर्शन के दौरान एक दिन में 100 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई। इसके बाद करीब 4 लाख लोग ढाका की सड़कों पर उतर गए। भीड़ ने हिंसा-तोड़फोड़ की। प्रदर्शनकारी प्रधानमंत्री आवास में घुस गए। पीएम शेख हसीना को इस्तीफा देकर भागना पड़ा। उन्होंने भारत में शरण ली है।
म्यांमार : गृहयुद्ध से बिगड़े हालात, हजारों की मौत
साल 2021 में सेना ने आंग सान सू की सरकार को उखाड़ फेंका था। इसके बाद से म्यांमार एक गंभीर घरेलू राजनीतिक संकट का सामना कर रहा है। विद्रोही समूहों और सैन्य जुंटा के बीच गृह संघर्ष के तेज होने से स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है। गृहयुद्ध में छह हजार से ज्यादा लोगों की मौत हुई है।
अफगानिस्तान : सत्ता पर काबिज हुआ तािलबान
नेपाल जैसे हालात साल 2021 में अफगानिस्तान में भी पनपे थे, जब तालिबान ने काबुल की सत्ता पर कब्जा कर लिया था। जान बचाने के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति अशरफ गनी देश छोड़कर भाग गए और तालिबान ने राष्ट्रपति भवन पर कब्जा कर लिया।