अमेरिकी मदद का मुद्दा: अपने गले की फांस को नेपाल सरकार ने संसद के माथे डाला
अमेरिका ने चेतावनी दी है कि अगर नेपाल ने ये सहायता स्वीकार नहीं की, तो वह नेपाल के साथ अपने द्विपक्षीय संबंधों पर पुनर्विचार करेगा। उधर अमेरिका की इस धमकी पर बीते सप्ताहांत चीन ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने अमेरिकी धमकी को ‘जोर-जबरदस्ती की कूटनीति’ करार दिया...
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
अमेरिकी संस्था मिलेनियम चैलेंज कॉरपोरेशन (एमसीसी) से आर्थिक सहायता लेने का मसला नेपाल सरकार के लिए गले की फांस बन गया है। एक तरफ इसे लेकर वह अमेरिका और चीन की रस्साकशी में फंस गई है, वहीं इस मसले को लेकर देश में राजनीतिक अस्थिरता और अशांति के हालात बन गए हैं।
एमसीसी से 50 करोड़ डॉलर की सहायता स्वीकार करने के लिए हुए करार का अनुमोदन कराने के लिए रविवार को सरकार ने एक प्रस्ताव संसद में पेश किया। उधर इसके विरोध में देशभर में जगह-जगह पर जनप्रदर्शन हुए। कई जगहों पर भीड़ तो तितर-बितर करने के लिए पुलिस को आंसू गैस के गोलों और लाठी का इस्तेमाल करना पड़ा। नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टियां लगातार इस प्रस्ताव का विरोध कर रही हैं।
देश की संसद करेगी फैसला
इसके बीच नेपाल के विदेश मंत्रालय ने एक बयान में कहा है कि कौन-सी विकास सहायता देश और नेपाल के लोगों के हित में है, इस बारे में फैसला अब देश की संसद करेगी। विदेश मंत्रालय ने कहा- ‘नेपाल ने हमेशा ही स्वतंत्र, संतुलित और गुट-निरपेक्ष विदेश नीति का पालन किया है। इस नीति पर चलते हुए एक संप्रभु देश के रूप में नेपाल ने अपनी राष्ट्रीय जरूरतों और प्राथमिकताओं के अनुरूप विकास सहायता स्वीकार की है और उसका उपयोग किया है।’
कूटनीतिक हलकों में विदेश मंत्रालय के इस बयान को अहम माना गया है। अमेरिका ने चेतावनी दी है कि अगर नेपाल ने ये सहायता स्वीकार नहीं की, तो वह नेपाल के साथ अपने द्विपक्षीय संबंधों पर पुनर्विचार करेगा। उधर अमेरिका की इस धमकी पर बीते सप्ताहांत चीन ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने अमेरिकी धमकी को ‘जोर-जबरदस्ती की कूटनीति’ करार दिया। विश्लेषकों का कहना है कि नेपाल में अमेरिका और चीन दोनों के समर्थक समूह मौजूद हैं। इसलिए इन दोनों बड़ी ताकतों की अंतरराष्ट्रीय खींचतान नेपाल की अंदरूनी राजनीति में भी जाहिर हो रही है।
एमसीसी से करार 2017 में हुआ था। उस पर अमल के लिए संसद में उसका अनुमोदन होना जरूरी है। नेपाली कांग्रेस के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार में संचार और सूचना तकनीक मंत्री ज्ञानेंद्र बहादुर करकी ने रविवार को संसद में अनुमोदन प्रस्ताव पेश किया। ऐसा सत्ताधारी गठबंधन में शामिल नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (माओइस्ट सेंटर) के एतराज के बावजूद किया गया। संसद के निचले सदन प्रतिनिधि सभा के स्पीकर अग्नि सपकोटा ने कहा है कि इस प्रस्ताव पर चर्चा कराई जाएगी।
अमेरिका ने मदद को बताया उपहार
नेपाली अखबारों में छपी खबरों के मुताबिक एमसीसी की सहायता स्वीकार करने के मुद्दे पर सत्ताधारी गठबंधन के भीतर तीखे मतभेद कायम हैं। इसलिए समझा जा रहा है कि अनुमोदन प्रस्ताव पेश कर प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा की सरकार ने एक बड़ा जोखिम मोल लिया है।
इस बीच काठमांडू स्थित अमेरिकी दूतावास ने कहा है कि एमसीसी की सहायता नेपाल के लिए अमेरिका का उपहार है, जिससे वहां नेपाल में नौकरियां पैदा होंगी और बुनियादी ढांचा निर्मित होगा। दूतावास ने ध्यान दिलाया है कि नेपाल सरकार के अनुरोध पर ये मदद देने का फैसला हुआ था। इस प्रस्ताव में पूरी पारदर्शिता बरती गई है।
दूतावास ने ये बयान शनिवार को जारी किया था। लेकिन उसका अमेरिकी मदद के विरोधियों पर कोई असर नहीं दिखा है। रविवार को इस प्रस्ताव के खिलाफ देश भर में प्रदर्शन हुए। पर्यवेक्षकों का कहना है कि जनता में आक्रोश के कारण यह संभावना नहीं दिखती संसद में अनुमोदन प्रस्ताव आसानी से पारित हो जाएगा।