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Medicine Nobel: क्या है एमआरएनए तकनीक, पढ़ें कैसे फोटो कॉपी कराने आए वैज्ञानिकों की एक मुलाकात ने दिलाई सफलता
Tue, 03 Oct 2023 05:26 PM IST
शिवेंद्र तिवारी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: शिवेंद्र तिवारी
Updated Tue, 03 Oct 2023 05:26 PM IST
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एमआरएनए टीके
- फोटो :
AMAR UJALA
विस्तार
साल 2023 के नोबेल पुरस्कारों का एलान सोमवार से शुरू हो गया। इसके तहत आज फिजियोलॉजी या मेडिसिन क्षेत्र के लिए इस सम्मान के विजेताओं के नाम का एलान हो चुका है। इस साल कैटालिन कारिको और ड्रू वीसमैन को चिकित्सा का नोबेल दिया गया है।विजेताओं को न्यूक्लियोसाइड बेस संशोधनों से संबंधित उनकी खोजों के लिए यह सम्मान दिया गया। इस खोज की वजह से कोरोना वायरस के खिलाफ प्रभावी एमआरएनए टीकों के विकास में मदद मिली। आइये जानते हैं कि चिकित्सा के नोबेल पुरस्कार विजेता कौन हैं? यह सम्मान उन्हें किस लिए दिया गया है? एमआरएनए तकनीक क्या होती है? एमआरएनए तकनीक में कारिको और वीजमैन की भूमिका क्या रही?
Nobel Prize
- फोटो :
Social Media
चिकित्सा के नोबेल पुरस्कार विजेता कौन हैं?
स्वीडन स्थित कैरोलिंस्का इंस्टीट्यूट की नोबेल समिति ने सोमवार को चिकित्सा के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार विजेताओं की घोषणा कर दी। यह पुरस्कार संयुक्त रूप से कैटालिन कारिको और ड्रू वीसमैन को दिया गया। इन्हें न्यूक्लियोसाइड बेस संशोधनों से संबंधित उनकी खोजों के लिए यह सम्मान दिया गया।
68 वर्षीय कैटलिन कारिको हंगरी मूल की अमेरिकी वैज्ञानिक हैं। कारिको चिकित्सा के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार जीतने वाली 13वीं महिला हैं। फिलहाल वह जर्मनी की कंपनी बायोएनटेक की सीनियर वाइस प्रेसिडेंट हैं, जिसने कोविड-19 टीके बनाने के लिए फाइजर के साथ साझेदारी की थी। वहीं, 64 वर्षीय ड्रू वीसमैन पेन इंस्टीट्यूट फॉर आरएनए इनोवेशन के प्रोफेसर और निदेशक हैं।
स्वीडन स्थित कैरोलिंस्का इंस्टीट्यूट की नोबेल समिति ने सोमवार को चिकित्सा के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार विजेताओं की घोषणा कर दी। यह पुरस्कार संयुक्त रूप से कैटालिन कारिको और ड्रू वीसमैन को दिया गया। इन्हें न्यूक्लियोसाइड बेस संशोधनों से संबंधित उनकी खोजों के लिए यह सम्मान दिया गया।
68 वर्षीय कैटलिन कारिको हंगरी मूल की अमेरिकी वैज्ञानिक हैं। कारिको चिकित्सा के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार जीतने वाली 13वीं महिला हैं। फिलहाल वह जर्मनी की कंपनी बायोएनटेक की सीनियर वाइस प्रेसिडेंट हैं, जिसने कोविड-19 टीके बनाने के लिए फाइजर के साथ साझेदारी की थी। वहीं, 64 वर्षीय ड्रू वीसमैन पेन इंस्टीट्यूट फॉर आरएनए इनोवेशन के प्रोफेसर और निदेशक हैं।
एनआरएनए वैक्सीन (सांकेतिक तस्वीर)।
- फोटो :
सोशल मीडिया
यह सम्मान उन्हें किस लिए दिया गया है?
दो साल पहले दुनिया सदी की सबसे विनाशकारी कोरोना महामारी से जूझ रही थी। उस वक्त दो अमेरिकी वैज्ञानिकों कारिको और वीजमैन का शोध ही था जिसके जरिए कोरोना के खिलाफ एमआरएनए वैक्सीन तैयार की गई। इसी अहम योगदान के लिए दोनों वैज्ञानिकों ने इस साल का नोबेल मेडिसिन पुरस्कार जीता है।
नोबेल समिति के सचिव थॉमस पर्लमैन ने कहा कि कारिको और वीजमैन ने आरएनए में न्यूक्लियोसाइड आधारित संशोधनों की अहम खोज की, जिससे एमआरएनए टीकों के विकास में मदद मिली।
पर्लमैन ने बताया कि उनके शोधकार्यों से यह समझ आया कि एमआरएनए और हमारे शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली के बीच संपर्क कैसे काम करता है। इसी वजह से मानवता पर आए सबसे बड़े खतरे को टालने के लिए तेजी से टीका विकसित करने में मदद मिली।
दो साल पहले दुनिया सदी की सबसे विनाशकारी कोरोना महामारी से जूझ रही थी। उस वक्त दो अमेरिकी वैज्ञानिकों कारिको और वीजमैन का शोध ही था जिसके जरिए कोरोना के खिलाफ एमआरएनए वैक्सीन तैयार की गई। इसी अहम योगदान के लिए दोनों वैज्ञानिकों ने इस साल का नोबेल मेडिसिन पुरस्कार जीता है।
नोबेल समिति के सचिव थॉमस पर्लमैन ने कहा कि कारिको और वीजमैन ने आरएनए में न्यूक्लियोसाइड आधारित संशोधनों की अहम खोज की, जिससे एमआरएनए टीकों के विकास में मदद मिली।
पर्लमैन ने बताया कि उनके शोधकार्यों से यह समझ आया कि एमआरएनए और हमारे शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली के बीच संपर्क कैसे काम करता है। इसी वजह से मानवता पर आए सबसे बड़े खतरे को टालने के लिए तेजी से टीका विकसित करने में मदद मिली।
mRNA बेस्ड वैक्सीन
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अमर उजाला
आखिर क्या है एमआरएनए तकनीक?
एमआरएनए असल में जेनेटिक कोड का एक छोटा हिस्सा है, जिसका इस्तेमाल कोशिकाओं को खास तरह का प्रोटीन बनाने का संदेश देने के लिए किया जाता है। जब शरीर में वायरस या बैक्टीरिया का संक्रमण होता है, तो वैक्सीन के रूप में एक संदेशवाहक आरएनए शरीर में भेजा जाता है, जिसके बाद शरीर वायरस के खिलाफ खास प्रोटीन बनाने लगता है। इस तरह हमारे इम्यून सिस्टम वह प्रोटीन मिल जाता है, जो बीमारी से लड़ने के लिए जरूरी है और शरीर में संक्रमण के खिलाफ एंटीबॉडी बनने लगती हैं।
एमआरएनए असल में जेनेटिक कोड का एक छोटा हिस्सा है, जिसका इस्तेमाल कोशिकाओं को खास तरह का प्रोटीन बनाने का संदेश देने के लिए किया जाता है। जब शरीर में वायरस या बैक्टीरिया का संक्रमण होता है, तो वैक्सीन के रूप में एक संदेशवाहक आरएनए शरीर में भेजा जाता है, जिसके बाद शरीर वायरस के खिलाफ खास प्रोटीन बनाने लगता है। इस तरह हमारे इम्यून सिस्टम वह प्रोटीन मिल जाता है, जो बीमारी से लड़ने के लिए जरूरी है और शरीर में संक्रमण के खिलाफ एंटीबॉडी बनने लगती हैं।
अमेरिकी वैज्ञानिक कारिको और वीजमैन
- फोटो :
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एमआरएनए तकनीक में कारिको और वीजमैन की भूमिका क्या रही?
एमआरएनए की जानकारी 1961 से मौजूद है। 1970 के दशक के अंत में टेस्ट-ट्यूब कोशिकाओं को प्रोटीन बनाने के लिए एमआरएनए का उपयोग करने में मिली। वहीं 1991 में पहली बार चूहों पर एमआरएनए आधारित फ्लू वैक्सीन का परीक्षण किया गया। इस परीक्षण में पता चलता कि एमआरएनए को शरीर में इंजेक्ट करने से प्रतिरक्षा प्रणाली में खतरनाक प्रतिक्रिया शुरू हो जाती है। इस वजह से संदेश के मुताबिक प्रोटीन का निर्माण नहीं हो पाता। कारिको और वीजमैन ने आरएनए के निर्माण खंडों में छोटे संशोधन का पता लगाया, जिसने प्रतिरक्षा प्रणाली को नुकसान पहुंचाए बिना प्रोटीन निर्माण कर पाता है।
एमआरएनए की जानकारी 1961 से मौजूद है। 1970 के दशक के अंत में टेस्ट-ट्यूब कोशिकाओं को प्रोटीन बनाने के लिए एमआरएनए का उपयोग करने में मिली। वहीं 1991 में पहली बार चूहों पर एमआरएनए आधारित फ्लू वैक्सीन का परीक्षण किया गया। इस परीक्षण में पता चलता कि एमआरएनए को शरीर में इंजेक्ट करने से प्रतिरक्षा प्रणाली में खतरनाक प्रतिक्रिया शुरू हो जाती है। इस वजह से संदेश के मुताबिक प्रोटीन का निर्माण नहीं हो पाता। कारिको और वीजमैन ने आरएनए के निर्माण खंडों में छोटे संशोधन का पता लगाया, जिसने प्रतिरक्षा प्रणाली को नुकसान पहुंचाए बिना प्रोटीन निर्माण कर पाता है।
अमेरिकी वैज्ञानिक कारिको और वीजमैन
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SOCIAL MEDIA
एक दिलचस्प मुलाकात ने दिलाई कामयाबी
कारिको एमआरएनए के जरिये पुरानी बीमारियों के लिए टीके और दवाएं बनाने के लिए पेन्सिल्वेनिया यूनिवर्सिटी में शोध कर रही थीं। लेकिन, 1990 में फंड की कमी बाधा बन गई। 1997 में ड्रू वीसमैन पेन्सिल्वेनिया यूनिवर्सिटी आए और एक दिन फोटोकॉपी कराते हुए कारिको से मिले। वीसमैन ने कारिको को फंडिंग मुहैया कराई और साझेदारी में इस तकीनक पर काम शुरू किया।
2013 में मनुष्यों पर रेबीज के लिए परीक्षण
2005 में ड्रू और कारिको ने एक शोधपत्र में दावा किया कि मॉडिफाइड एमआरएनए के जरिये इम्युनिटी बढ़ाई जा सकती है। उस समय इसे किसी ने अहमियत नहीं दी, लेकिन 2010 में अमेरिकी वैज्ञानिक डैरिक रोसी ने मॉडिफाइड एमआरएनए आधारित वैक्सीन बनाने को मॉडर्ना कंपनी स्थापित कर दी।
2013 में मनुष्यों पर रेबीज के लिए पहली एमआरएनए वैक्सीन का परीक्षण किया गया। आखिर में 2020 में कोविड महामारी के दौरान इस तकनीक पर आधारित वैक्सीन का इंसानों पर पहली बार व्यापक इस्तेमाल हुआ।
कारिको एमआरएनए के जरिये पुरानी बीमारियों के लिए टीके और दवाएं बनाने के लिए पेन्सिल्वेनिया यूनिवर्सिटी में शोध कर रही थीं। लेकिन, 1990 में फंड की कमी बाधा बन गई। 1997 में ड्रू वीसमैन पेन्सिल्वेनिया यूनिवर्सिटी आए और एक दिन फोटोकॉपी कराते हुए कारिको से मिले। वीसमैन ने कारिको को फंडिंग मुहैया कराई और साझेदारी में इस तकीनक पर काम शुरू किया।
2013 में मनुष्यों पर रेबीज के लिए परीक्षण
2005 में ड्रू और कारिको ने एक शोधपत्र में दावा किया कि मॉडिफाइड एमआरएनए के जरिये इम्युनिटी बढ़ाई जा सकती है। उस समय इसे किसी ने अहमियत नहीं दी, लेकिन 2010 में अमेरिकी वैज्ञानिक डैरिक रोसी ने मॉडिफाइड एमआरएनए आधारित वैक्सीन बनाने को मॉडर्ना कंपनी स्थापित कर दी।
2013 में मनुष्यों पर रेबीज के लिए पहली एमआरएनए वैक्सीन का परीक्षण किया गया। आखिर में 2020 में कोविड महामारी के दौरान इस तकनीक पर आधारित वैक्सीन का इंसानों पर पहली बार व्यापक इस्तेमाल हुआ।
एमआरएनए तकनीक
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SOCIAL MEDIA
एमआरएनए तकनीक और किस काम में इस्तेमाल की जा सकती है?
वैज्ञानिकों ने मौसमी फ्लू, रेबीज और जीका जैसी बीमारियों के साथ-साथ मलेरिया और एड्स सहित उन बीमारियों के लिए एमआरएनए टीका विकसित करने पर काम किया है, जो अब तक टीका-प्रतिरोधी रहे हैं। शोधकर्ताओं ने विशेष एमआरएनए बनाने के लिए उनके ट्यूमर में प्रोटीन के नमूनों का उपयोग करके कैंसर रोगियों पर व्यक्तिगत उपचार का परीक्षण भी शुरू कर दिया है। इसके साथ ही एमआरएनए तकनीक की प्रतिरक्षा प्रणाली को विशिष्ट कैंसर कोशिकाओं को खत्म करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।
वैज्ञानिकों ने मौसमी फ्लू, रेबीज और जीका जैसी बीमारियों के साथ-साथ मलेरिया और एड्स सहित उन बीमारियों के लिए एमआरएनए टीका विकसित करने पर काम किया है, जो अब तक टीका-प्रतिरोधी रहे हैं। शोधकर्ताओं ने विशेष एमआरएनए बनाने के लिए उनके ट्यूमर में प्रोटीन के नमूनों का उपयोग करके कैंसर रोगियों पर व्यक्तिगत उपचार का परीक्षण भी शुरू कर दिया है। इसके साथ ही एमआरएनए तकनीक की प्रतिरक्षा प्रणाली को विशिष्ट कैंसर कोशिकाओं को खत्म करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।