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Liquid Biopsy Test: शोधकर्ताओं का दावा, लिक्विड बायोप्सी टेस्ट से शुरुआत में ही लगा सकेंगे कैंसर का पता
Fri, 03 Jun 2022 03:54 PM IST
Amit Mandal
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, न्यूयॉर्क
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, न्यूयॉर्क
Published by: Amit Mandal
Updated Fri, 03 Jun 2022 03:54 PM IST
सार
यह अध्ययन दर्शाता है कि फेफड़े के कैंसर रोगियों में पीडी-एल1 बायोमार्कर की जांच रोगी के ब्लड टेस्ट से हो सकती है और इससे रोगी के जीवित बचने के बारे में ज्यादा सटीक पूर्वानुमान लगाया जा सकता है।
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कैंसर का इलाज
- फोटो : istock
विस्तार
कैंसर का शुरुआती चरण में पता चलना मुश्किल होता इसलिए जब बीमारी बढ़ती है तो उसका इलाज ज्यादा जटिल हो जाता है। इन समस्याओं से निपटने के लिए लगातार शोध हो रहे हैं। इसी क्रम में माउंट सिनाई के शोधकर्ताओं ने दावा किया है कि एक सामान्य ब्लड टेस्ट, लिक्विड बायोप्सी से इस बात का एक पूर्वानुमान लगाया जा सकता है कि फेफड़े के कैंसर रोगियों पर इम्यूनोथेरेपी का असर होगा या नहीं। इसके साथ ही यह पूर्वानुमान या आकलन इन्वेसिव ट्यूमर बायोप्सी तकनीक से होने वाली जांच की तुलना में ज्यादा विश्वसनीय होगी। यह अध्ययन 'एक्सपेरिमेंटल एंड क्लीनिकल कैंसर जर्नल' में प्रकाशित हुआ है।
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रोगी के जीवित बचने के बारे में ज्यादा सटीक पूर्वानुमान
लिक्विड बायोप्सी से पीडी-एल1 बायोमार्कर की जांच की जाती है। यह एक प्रकार का प्रोटीन होता है, जो एक प्रकार के इम्यूनोथेरेपी को टारगेट करता है, जिसे चेकप्वाइंट इन्हीबिटर कहते हैं। यह रोगी के इम्यून सिस्टम पर हमले में मदद करता है और कैंसर कोशिकाओं को मारता है। यह अध्ययन दर्शाता है कि फेफड़े के कैंसर रोगियों में पीडी-एल1 बायोमार्कर की जांच रोगी के ब्लड टेस्ट से हो सकती है और इससे रोगी के जीवित बचने के बारे में ज्यादा सटीक पूर्वानुमान लगाया जा सकता है। इस तरह की जांच मौजूदा प्रचलित लंग कैंसर बायोप्सी से पीडी-एल1 की जांच से अधिक विश्वसनीय होती है।
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उन रोगियों के लिए फायदेमंद जिनमें विश्वसनीय बायोमार्कर नहीं मिला
शोधकर्ताओं का कहना है कि रक्त में पाया जाने वाला बायोमार्कर ईवी पीडी-एल1 कोशिकाओं की बाहरी वेसिकल से आते हैं, जो ट्यूमर कोशिकाओं से मिलते हैं। इसलिए रक्त में बाहरी कोशिकाओं के वेसिकल (पुटिकाएं) में पीडी-एल1 की कम मात्रा से यह पता लगाया जा सकता है कि नान-स्माल-सेल वाले कौन से लंग कैंसर के रोगी को इम्यूनोथेरेपी से फायदा होगा। माउंड सिनाई में इकाहन स्कूल ऑफ मेडिसिन में हीमैटोलाजी एंड ऑन्कोलॉजी के प्रोफेसर व इस अध्ययन के वरिष्ठ लेखक क्रिश्चियन रोल्फो ने बताया कि इस टेस्ट के परिणाम उन रोगियों के लिए फायदेमंद हो सकते हैं, जिनमें अभी तक कोई विश्वसनीय बायोमार्कर नहीं पाया गया है और इससे इम्यूनोथेरेपी के होने वाले असर का भी पूर्वानुमान मिलेगा।
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उन्होंने बताया कि यदि इसकी पुष्टि व्यापक स्तर पर होती है तो यह प्रोटीन ऊतकों के पीडी-एल1 का विकल्प हो सकता है। यह इम्यूनोथेरेपी ले रहे कैंसर रोगियों की जांच का एक मानक तरीका हो सकता और इलाज के दौरान बिना किसी विशेष सर्जरी के बार-बार जांच को दोहराना आसान होगा।