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एक्सप्लेनर: क्या इस्लामिक नाटो बनाएगा मक्का समझौता, बांग्लादेश इससे क्यों जुड़ना चाहता है, भारत पर कैसा असर?
Tue, 25 Aug 2026 06:01 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Tue, 25 Aug 2026 06:01 PM IST
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सार
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मक्का समझौते में शामिल होने में बांग्लादेश ने दिखाई दिलचस्पी।
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विस्तार
सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान के बीच हाल ही में हुए मक्का समझौते को लेकर पूरी दुनिया में भ्रम की स्थिति बरकरार है। दरअसल, तीनों ही देशों की तरफ से इसे एक समग्र रक्षा समझौते के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि तीनों देश कब इस समझौते के तहत एक-दूसरे की रक्षा करेंगे, उसकी शर्तें और नियम अब तक सामने नहीं आए हैं। इसके बावजूद इस त्रिपक्षीय समझौते में शामिल देश कुछ और मुस्लिम बहुल देशों को गठबंधन में लाने की कोशिश में जुटे हैं। इसमें सबसे ताजा नाम बांग्लादेश का है। भारत के इस पड़ोसी देश ने खुद ही मक्का समझौते में दिलचस्पी दिखाई है। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं किया है कि वह इससे जुड़ेगा या नहीं।ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर यह मक्का समझौता क्या है? बांग्लादेश ने इसमें शामिल होने को लेकर क्या कहा है? क्या मुस्लिम बहुल देशों के लगातार जुड़ने से मक्का समझौता इस्लामिक नाटो में बदल सकता है? क्यों अपने पूर्वी हिस्से में स्थित पड़ोसी देश के मक्का समझौते में दिलचस्पी दिखाने पर भारत की भी नजर है? आइये जानते हैं...
पहले जानें- क्या है मक्का समझौता, इसकी शर्तें क्या?
मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर के साथ तीन देशों पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये की तरफ से इसे लेकर एक साझा बयान जारी किया गया है। इसके मुताबिक तीनों देशों के बीच यह त्रिपक्षीय सुरक्षा और सैन्य समझौता है।- समझौते का सबसे केंद्रीय प्रावधान यह है कि इसमें शामिल तीनों ही देशों में से किसी भी एक पर बाहरी देश की तरफ से किया गया हमला तीनों देशों पर हमला माना जाएगा।
- समझौते में कहा गया है कि यह प्रावधान संयुक्त राष्ट्र के चार्टर (यूएन चार्टर) के अनुच्छेद 51 पर आधारित है, जो व्यक्तिगत और सामूहिक आत्मरक्षा के अधिकार की गारंटी देता है।
- तीनों ही देशों की तरफ से इस समझौते का मकसद एक-दूसरे की रक्षा सुनिश्चित करना बताया गया है, ताकि किसी बाहरी हमले के खिलाफ एकजुटता बनाए रखी जा सके।
- आधिकारिक तौर पर समझौते में स्पष्ट कहा गया है कि यह कोई धार्मिक, सांप्रदायिक सैन्य गुट या परमाणु तकनीक साझा करने का न तो तंत्र है और न ही इसे बनाने की कोशिश।
- तीनों देश लगातार रणनीतिक खुफिया जानकारी साझा करने, अभियानों के लिए संयुक्त योजना बनाने, सैन्य कर्मियों की ट्रेनिंग और सैन्य अभ्यासों का औपचारिक ढांचा भी खड़ा करेंगे।
ये भी पढ़ें: Bangladesh Mecca Pact: बांग्लादेश के लिए क्यों खतरा बन सकता है मक्का समझौता? रिपोर्ट में ईरान-होर्मुज का जिक्र
मक्का रक्षा समझौता।
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इसके अलावा समझौते में रक्षा क्षेत्रों में तकनीकी सहयोग, तकनीक के ट्रांसफर और संयुक्त उत्पादन को बढ़ाने की बात कही गई है। इसके तहत ड्रोन्स, नौसैन्य इंजीनियरिंग, वायु रक्षा प्रणालियों और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का साझा उत्पादन किया जाएगा।
मक्का रक्षा समझौता जिसे इस्लामिक नाटो भी कहा जा रहा है, को केवल तीन मूल संस्थापक देशों- सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान तक सीमित रखने के बजाय इसका दायरा और ज्यादा बढ़ाने की कोशिशें चल रही हैं। अब तक आधिकारिक तौर पर दो देशों को इस समझौते के लिए आमंत्रित किया गया है।
1. बांग्लादेश
गठबंधन का विस्तार करने के लिए बांग्लादेश इस समय सबसे प्रमुख केंद्रित देश है। हाल ही में बांग्लादेश में हुए राजनीतिक बदलाव के बाद, सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान को रियाद आने का विशेष निमंत्रण भेजा है। इसके अलावा, तुर्किये और अजरबैजान के मीडिया समूह, जैसे- येनी शफाक, अजेर न्यूज, सुरक्षा ढांचे का विस्तार करके बांग्लादेश को इसमें जोड़ने को सक्रिय रूप से बढ़ावा दे रहे हैं।
किन-किन देशों को मक्का समझौते में खींचने की हो रही कोशिश?
मक्का रक्षा समझौता जिसे इस्लामिक नाटो भी कहा जा रहा है, को केवल तीन मूल संस्थापक देशों- सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान तक सीमित रखने के बजाय इसका दायरा और ज्यादा बढ़ाने की कोशिशें चल रही हैं। अब तक आधिकारिक तौर पर दो देशों को इस समझौते के लिए आमंत्रित किया गया है।
1. बांग्लादेश
गठबंधन का विस्तार करने के लिए बांग्लादेश इस समय सबसे प्रमुख केंद्रित देश है। हाल ही में बांग्लादेश में हुए राजनीतिक बदलाव के बाद, सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान को रियाद आने का विशेष निमंत्रण भेजा है। इसके अलावा, तुर्किये और अजरबैजान के मीडिया समूह, जैसे- येनी शफाक, अजेर न्यूज, सुरक्षा ढांचे का विस्तार करके बांग्लादेश को इसमें जोड़ने को सक्रिय रूप से बढ़ावा दे रहे हैं।
2. मिस्र
रिपोर्ट्स के मुताबिक, तुर्किये की ओर से मिस्र से भी इस समझौते के विस्तार का हिस्सा बनने के लिए संपर्क किया गया। हालांकि, मिस्र ने अपनी मौजूदा भूमध्यसागरीय सुरक्षा प्रतिबद्धताओं और बिना शर्त किसी युद्ध की गारंटी में बंधने में हिचकिचाहट दिखाई है। यानी मिस्र अब तक मक्का ने समझौते से खुद को दूर ही रख रहा है।
3. अन्य मुस्लिम-बहुल देश
इस गठबंधन को एक संकीर्ण ब्लॉक के बजाय व्यापक रूप देने की रणनीति बनाई गई है। तुर्किये के अधिकारियों के मुताबिक, यह समझौता किसी विशिष्ट देश के खिलाफ केंद्रित नहीं है और भविष्य में अन्य क्षेत्रीय देशों, जैसे- कुवैत, बहरीन, मिस्र या कतर के लिए इसमें शामिल होने के रास्ते खुले हैं। कुछ ऐसे ही बयान हालिया समय में पाकिस्तान की तरफ से भी दिए गए हैं।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, तुर्किये की ओर से मिस्र से भी इस समझौते के विस्तार का हिस्सा बनने के लिए संपर्क किया गया। हालांकि, मिस्र ने अपनी मौजूदा भूमध्यसागरीय सुरक्षा प्रतिबद्धताओं और बिना शर्त किसी युद्ध की गारंटी में बंधने में हिचकिचाहट दिखाई है। यानी मिस्र अब तक मक्का ने समझौते से खुद को दूर ही रख रहा है।
3. अन्य मुस्लिम-बहुल देश
इस गठबंधन को एक संकीर्ण ब्लॉक के बजाय व्यापक रूप देने की रणनीति बनाई गई है। तुर्किये के अधिकारियों के मुताबिक, यह समझौता किसी विशिष्ट देश के खिलाफ केंद्रित नहीं है और भविष्य में अन्य क्षेत्रीय देशों, जैसे- कुवैत, बहरीन, मिस्र या कतर के लिए इसमें शामिल होने के रास्ते खुले हैं। कुछ ऐसे ही बयान हालिया समय में पाकिस्तान की तरफ से भी दिए गए हैं।
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ।
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पाकिस्तान के उप-प्रधानमंत्री इशाक डार ने भी पुष्टि की है कि यह सैन्य समझौता क्षेत्र के अन्य देशों के लिए भी खुला है।
बांग्लादेश के विदेश मामलों के सलाहकार/राज्य मंत्री हुमायूं कबीर ने स्पष्ट किया है कि बांग्लादेश का मक्का समझौते में शामिल होने के प्रति एक सकारात्मक दृष्टिकोण है। उन्होंने हाल ही में पत्रकारों से बातचीत में कहा था कि सरकार इस मक्का रक्षा समझौते में दिलचस्पी रखती है और उम्मीद करती है कि वे इसके लिए सकारात्मक रूप से प्रतिक्रिया देंगे। इसके अलावा, बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान के एक करीबी सहयोगी ने भी पुष्टि की है कि बांग्लादेश मक्का समझौते जैसे गठबंधन में शामिल होने का इच्छुक है। उनका मानना है कि बांग्लादेश इस सैन्य ढांचे के करीब जाकर अपनी विदेश नीति में विविधता लाना चाहता है, ताकि भारत पर अपनी पुरानी रणनीतिक निर्भरता को कम किया जा सके।
ये भी पढ़ें: मक्का रक्षा समझौता: बांग्लादेश का रुख सकारात्मक; कहा- मुस्लिम नाटो में एंट्री का विकल्प खुला, देशहित में फैसला
बांग्लादेश ने इस गठबंधन में शामिल होने को लेकर क्या कहा है?
बांग्लादेश के विदेश मामलों के सलाहकार/राज्य मंत्री हुमायूं कबीर ने स्पष्ट किया है कि बांग्लादेश का मक्का समझौते में शामिल होने के प्रति एक सकारात्मक दृष्टिकोण है। उन्होंने हाल ही में पत्रकारों से बातचीत में कहा था कि सरकार इस मक्का रक्षा समझौते में दिलचस्पी रखती है और उम्मीद करती है कि वे इसके लिए सकारात्मक रूप से प्रतिक्रिया देंगे। इसके अलावा, बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान के एक करीबी सहयोगी ने भी पुष्टि की है कि बांग्लादेश मक्का समझौते जैसे गठबंधन में शामिल होने का इच्छुक है। उनका मानना है कि बांग्लादेश इस सैन्य ढांचे के करीब जाकर अपनी विदेश नीति में विविधता लाना चाहता है, ताकि भारत पर अपनी पुरानी रणनीतिक निर्भरता को कम किया जा सके।
ये भी पढ़ें: मक्का रक्षा समझौता: बांग्लादेश का रुख सकारात्मक; कहा- मुस्लिम नाटो में एंट्री का विकल्प खुला, देशहित में फैसला
बांग्लादेश के मंत्री हुमायूं कबीर।
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बांग्लादेश की एक अन्य विदेश राज्य मंत्री शमा ओबैद इस्लाम ने बांग्लादेश की स्थिति को और स्पष्ट करते हुए कहा कि किसी भी समझौते या बहुपक्षीय मंच पर शामिल होने का निर्णय इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या उससे बांग्लादेश के हित और बांग्लादेश के लोगों के हित सुरक्षित होते हैं या नहीं।
बांग्लादेश की ओर से इस्लामिक नाटो कहे जाने वाले मक्का रक्षा समझौते में शामिल होने की दिलचस्पी ने नई दिल्ली के रणनीतिक गलियारों में सतर्कता बढ़ा दी है। यूं तो बांग्लादेश एक स्वायत्त राष्ट्र है और अपने रक्षा निर्णयों के लिए स्वतंत्र हैं, लेकिन भारत इस घटनाक्रम को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बड़े भू-राजनीतिक बदलाव के रूप में देख रहा है।
बांग्लादेश की मक्का समझौते में दिलचस्पी पर भारत की क्यों नजर?
बांग्लादेश की ओर से इस्लामिक नाटो कहे जाने वाले मक्का रक्षा समझौते में शामिल होने की दिलचस्पी ने नई दिल्ली के रणनीतिक गलियारों में सतर्कता बढ़ा दी है। यूं तो बांग्लादेश एक स्वायत्त राष्ट्र है और अपने रक्षा निर्णयों के लिए स्वतंत्र हैं, लेकिन भारत इस घटनाक्रम को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बड़े भू-राजनीतिक बदलाव के रूप में देख रहा है।
1. पूर्वी सीमा पर पाकिस्तान के प्रभाव की वापसी
- 1971 के मुक्ति संग्राम से पहले पाकिस्तान भारत के दोनों तरफ मौजूद था। पश्चिम में पश्चिमी पाकिस्तान और पूर्व में पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश)। 1971 के युद्ध के बाद बांग्लादेश के स्वतंत्र होने से भारत का रणनीतिक नक्शा बदला और उसे दोनों मोर्चों पर पाकिस्तानी खतरे से बड़ी राहत मिली।
- मक्का समझौते में पाकिस्तान एक संस्थापक सदस्य है। अगर बांग्लादेश इस सैन्य गठबंधन का हिस्सा बनता है, तो पाकिस्तान को भारत की पूर्वी सीमा पर अपनी खुफिया पैठ, सैन्य सलाहकारों की तैनाती और दीर्घकालिक रणनीतिक प्रभाव बढ़ाने का एक नया मंच मिल सकता है।
- बांग्लादेश में राजनीतिक बदलाव और मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार में ढाका और इस्लामाबाद के बीच सैन्य संबंध तेजी से सुधरे। यह स्थिति तारिक रहमान के नेतृत्व वाली बीएनपी सरकार में भी बरकरार है। दोनों देशों के बीच हवाई और समुद्री संपर्क बहाल हुए हैं और बांग्लादेश में पाकिस्तान से जेएफ-17 थंडर लड़ाकू विमान खरीदने पर भी चर्चा चल रही है।
मक्का रक्षा समझौता।
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अमर उजाला
2. सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) की सुरक्षा पर नजर
भारत की मुख्य भूमि को उसके आठ उत्तर-पूर्वी राज्यों से जोड़ने वाला सिलीगुड़ी कॉरिडोर, जो कि महज 22 किलोमीटर चौड़ा एक अत्यंत संवेदनशील भौगोलिक मार्ग है। अगर बांग्लादेश मक्का समझौते के जरिए पाकिस्तान और तुर्किये के सुरक्षा ढांचे से गहराई से जुड़ता है, तो भारत को अपनी पूर्वी सीमा पर खुफिया गतिविधियों का सामना करना पड़ सकता है। अतीत में पूर्वोत्तर के भारत-विरोधी उग्रवादी गुटों को बांग्लादेश में शरण मिलती थी; अब ढाका और इस्लामाबाद के बीच सैन्य और खुफिया संबंध बनने से इस संवेदनशील क्षेत्र में फिर से अस्थिरता का खतरा पैदा हो सकता है।
3. बंगाल की खाड़ी में रणनीतिक बदलाव
इसके अलावा बंगाल की खाड़ी भारत की समुद्री सुरक्षा रणनीति और एक्ट ईस्ट नीति का मुख्य केंद्र है, जहां भारत का विशाखापत्तनम में पूर्वी नौसेना कमान और अंडमान निकोबार द्वीप समूह में महत्वपूर्ण सैन्य ठिकाने हैं। अगर बांग्लादेश इस समझौते के तहत तुर्की के उन्नत युद्धपोतों या पाकिस्तानी सैन्य बलों को अपने बंदरगाहों पर डॉकिंग अधिकार या संयुक्त नौसैनिक अभ्यास की सुविधा देता है, तो बंगाल की खाड़ी भारत के लिए एक सुरक्षित समुद्री क्षेत्र नहीं रह जाएगी। भारत को अपनी रक्षा संपदा और नौसैनिक खुफिया तंत्र को हिंद महासागर से हटाकर पूर्वी तट की ओर मोड़ना पड़ेगा।
भारत की मुख्य भूमि को उसके आठ उत्तर-पूर्वी राज्यों से जोड़ने वाला सिलीगुड़ी कॉरिडोर, जो कि महज 22 किलोमीटर चौड़ा एक अत्यंत संवेदनशील भौगोलिक मार्ग है। अगर बांग्लादेश मक्का समझौते के जरिए पाकिस्तान और तुर्किये के सुरक्षा ढांचे से गहराई से जुड़ता है, तो भारत को अपनी पूर्वी सीमा पर खुफिया गतिविधियों का सामना करना पड़ सकता है। अतीत में पूर्वोत्तर के भारत-विरोधी उग्रवादी गुटों को बांग्लादेश में शरण मिलती थी; अब ढाका और इस्लामाबाद के बीच सैन्य और खुफिया संबंध बनने से इस संवेदनशील क्षेत्र में फिर से अस्थिरता का खतरा पैदा हो सकता है।
3. बंगाल की खाड़ी में रणनीतिक बदलाव
इसके अलावा बंगाल की खाड़ी भारत की समुद्री सुरक्षा रणनीति और एक्ट ईस्ट नीति का मुख्य केंद्र है, जहां भारत का विशाखापत्तनम में पूर्वी नौसेना कमान और अंडमान निकोबार द्वीप समूह में महत्वपूर्ण सैन्य ठिकाने हैं। अगर बांग्लादेश इस समझौते के तहत तुर्की के उन्नत युद्धपोतों या पाकिस्तानी सैन्य बलों को अपने बंदरगाहों पर डॉकिंग अधिकार या संयुक्त नौसैनिक अभ्यास की सुविधा देता है, तो बंगाल की खाड़ी भारत के लिए एक सुरक्षित समुद्री क्षेत्र नहीं रह जाएगी। भारत को अपनी रक्षा संपदा और नौसैनिक खुफिया तंत्र को हिंद महासागर से हटाकर पूर्वी तट की ओर मोड़ना पड़ेगा।
4. धार्मिक कट्टरपंथ और सैन्य टकराव की स्थिति
तुर्किये के राष्ट्रपति रजब तैयब अर्दोआन राजनीतिक इस्लाम के जरिए वैश्विक मुस्लिम समुदाय (उम्माह) पर अपना प्रभाव बढ़ाना चाहते हैं और उनके दक्षिण एशिया में जमात-ए-इस्लामी जैसे कट्टरपंथी संगठनों से गहरे संबंध रहे हैं। इस त्रिकोणीय सुरक्षा गठजोड़ से बांग्लादेश के अंदर कट्टरपंथ को बल मिल सकता है, जो भारत के सीमावर्ती राज्यों के लिए भी खतरा बनेगा।
मक्का संयुक्त रक्षा समझौते को लेकर इस्लामिक देशों के नाटो जैसी चर्चाएं तेज हो गई हैं, क्योंकि इसके मूल प्रावधान में 'एक पर हमला, सभी पर हमला' जैसी सामूहिक सुरक्षा की नाटो-शैली जैसी शर्त शामिल है। हालांकि, आधिकारिक बयानों और रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक, फिलहाल जिन तीन देशों का गठबंधन बना है, उसमें सभी की अपनी-अपनी चाहत हैं। इसे अभी एक पूर्ण 'इस्लामिक नाटो' कहना जल्दबाजी होगी।
तुर्किये के राष्ट्रपति रजब तैयब अर्दोआन राजनीतिक इस्लाम के जरिए वैश्विक मुस्लिम समुदाय (उम्माह) पर अपना प्रभाव बढ़ाना चाहते हैं और उनके दक्षिण एशिया में जमात-ए-इस्लामी जैसे कट्टरपंथी संगठनों से गहरे संबंध रहे हैं। इस त्रिकोणीय सुरक्षा गठजोड़ से बांग्लादेश के अंदर कट्टरपंथ को बल मिल सकता है, जो भारत के सीमावर्ती राज्यों के लिए भी खतरा बनेगा।
क्या इस्लामिक नाटो बनने की तरफ बढ़ रहा मक्का समझौता?
मक्का संयुक्त रक्षा समझौते को लेकर इस्लामिक देशों के नाटो जैसी चर्चाएं तेज हो गई हैं, क्योंकि इसके मूल प्रावधान में 'एक पर हमला, सभी पर हमला' जैसी सामूहिक सुरक्षा की नाटो-शैली जैसी शर्त शामिल है। हालांकि, आधिकारिक बयानों और रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक, फिलहाल जिन तीन देशों का गठबंधन बना है, उसमें सभी की अपनी-अपनी चाहत हैं। इसे अभी एक पूर्ण 'इस्लामिक नाटो' कहना जल्दबाजी होगी।
नाटो जैसा ढांचा खड़ा करना सबसे बड़ी चुनौती
नाटो के उलट इस समझौते में कोई केंद्रीकृत एकीकृत सैन्य कमान ढांचा, साझा वैश्विक मुख्यालय या स्थायी रूप से तैनात संयुक्त सैन्य बल शामिल नहीं हैं। यह मुख्य रूप से एक उच्च-स्तरीय बाध्यकारी राजनीतिक और रणनीतिक संधि के रूप में काम करता है, जो संकट के समय सैन्य बलों के तत्काल साथ आने को सक्षम बनाता है। दूसरी तरफ नाटो के पास सात दशकों से ज्यादा समय से एकीकृत कमान ढांचा, जंग से जुड़े सिद्धांत, साझा रसद नेटवर्क और स्थायी सैन्य बुनियादी ढांचा है।
अपनी-अपनी प्राथमिकताओं वाले देश गठबंधन में शामिल
त्रिपक्षीय गठबंधन के मौजूदा तीनों सदस्य देशों का अपना अलग सुरक्षा दायरा, इसे नाटो गठबंधन की तरह बनने से खास तौर पर रोकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इन तीनों देशों की बिल्कुल अलग सैन्य प्राथमिकताएं इसके साथ आने में मुश्किल पैदा करती हैं।
तुर्किये: नाटो का एक अहम सदस्य बना हुआ है और उसका ध्यान खास तौर पर भूमध्य सागर और लेवांत क्षेत्र पर केंद्रित है।
सऊदी अरब: इसकी सुरक्षा चिंताएं मुख्य रूप से फारस की खाड़ी, लाल सागर और हूती विद्रोहियों जैसे खतरों तक सीमित हैं।
पाकिस्तान: सैन्य ध्यान और रक्षा ढांचा पारंपरिक रूप से भारत, दक्षिण एशिया और अपनी पूर्वी सीमा की ओर केंद्रित है।
नाटो के उलट इस समझौते में कोई केंद्रीकृत एकीकृत सैन्य कमान ढांचा, साझा वैश्विक मुख्यालय या स्थायी रूप से तैनात संयुक्त सैन्य बल शामिल नहीं हैं। यह मुख्य रूप से एक उच्च-स्तरीय बाध्यकारी राजनीतिक और रणनीतिक संधि के रूप में काम करता है, जो संकट के समय सैन्य बलों के तत्काल साथ आने को सक्षम बनाता है। दूसरी तरफ नाटो के पास सात दशकों से ज्यादा समय से एकीकृत कमान ढांचा, जंग से जुड़े सिद्धांत, साझा रसद नेटवर्क और स्थायी सैन्य बुनियादी ढांचा है।
अपनी-अपनी प्राथमिकताओं वाले देश गठबंधन में शामिल
त्रिपक्षीय गठबंधन के मौजूदा तीनों सदस्य देशों का अपना अलग सुरक्षा दायरा, इसे नाटो गठबंधन की तरह बनने से खास तौर पर रोकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इन तीनों देशों की बिल्कुल अलग सैन्य प्राथमिकताएं इसके साथ आने में मुश्किल पैदा करती हैं।
तुर्किये: नाटो का एक अहम सदस्य बना हुआ है और उसका ध्यान खास तौर पर भूमध्य सागर और लेवांत क्षेत्र पर केंद्रित है।
सऊदी अरब: इसकी सुरक्षा चिंताएं मुख्य रूप से फारस की खाड़ी, लाल सागर और हूती विद्रोहियों जैसे खतरों तक सीमित हैं।
पाकिस्तान: सैन्य ध्यान और रक्षा ढांचा पारंपरिक रूप से भारत, दक्षिण एशिया और अपनी पूर्वी सीमा की ओर केंद्रित है।
गौरतलब है कि इस्लामिक नाटो की चर्चा कोई नई नहीं है। साल 2015 में सऊदी अरब के नेतृत्व में 41 देशों का इस्लामिक सैन्य आतंकवाद विरोधी गठबंधन बनाया गया था। लेकिन वह गठबंधन मुख्य रूप से आतंकवाद विरोधी अभियानों तक सीमित रहा। इससे इतर मक्का समझौता फिलहाल सिर्फ तीन विशिष्ट सैन्य शक्तियों का एक व्यावहारिक रणनीतिक कदम है।
जर्मन मार्शल फंड (यूएस) के दक्षिण और व्यापक यूरोप कार्यालय के प्रबंध निदेशक और तुर्किये के क्षेत्रीय निदेशक ओजगुर उनलुहिसासिकली का कहना है कि यह रक्षा समझौता तीनों देशों की बढ़ती क्षेत्रीय रणनीतिक स्वायत्तता की इच्छा को दर्शाता है। वह भी ऐसे समय जब मौजूदा सुरक्षा व्यवस्था में विश्वास कम हो गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह तीन प्रभावशाली क्षेत्रीय शक्तियों के बीच घनिष्ठ रणनीतिक, सैन्य और रक्षा-औद्योगिक समन्वय का एक ढांचा है, न कि नाटो जैसा कोई रक्षा समझौता।
पूर्व राजनयिक एम. शाहिदुल इस्लाम ने सोशल मीडिया पर इस फैसले पर कड़ा विश्लेषण पेश किया। उनका सुझाव है कि अगर बांग्लादेश इस समझौते में आगे बढ़ता है, तो उसे सऊदी अरब से अधिक प्रवासियों के रोजगार, निवेश और ऊर्जा सुरक्षा की ठोस प्रतिबद्धता मांगनी चाहिए।
जर्मन मार्शल फंड (यूएस) के दक्षिण और व्यापक यूरोप कार्यालय के प्रबंध निदेशक और तुर्किये के क्षेत्रीय निदेशक ओजगुर उनलुहिसासिकली का कहना है कि यह रक्षा समझौता तीनों देशों की बढ़ती क्षेत्रीय रणनीतिक स्वायत्तता की इच्छा को दर्शाता है। वह भी ऐसे समय जब मौजूदा सुरक्षा व्यवस्था में विश्वास कम हो गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह तीन प्रभावशाली क्षेत्रीय शक्तियों के बीच घनिष्ठ रणनीतिक, सैन्य और रक्षा-औद्योगिक समन्वय का एक ढांचा है, न कि नाटो जैसा कोई रक्षा समझौता।
बांग्लादेश में इस समझौते को लेकर क्या अंदरूनी आवाजें उठीं?
'इस समझौते की कीमत तय, पर फायदे नहीं'पूर्व राजनयिक एम. शाहिदुल इस्लाम ने सोशल मीडिया पर इस फैसले पर कड़ा विश्लेषण पेश किया। उनका सुझाव है कि अगर बांग्लादेश इस समझौते में आगे बढ़ता है, तो उसे सऊदी अरब से अधिक प्रवासियों के रोजगार, निवेश और ऊर्जा सुरक्षा की ठोस प्रतिबद्धता मांगनी चाहिए।
मक्का रक्षा समझौते पर विशेषज्ञ की राय।
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अमर उजाला
'पश्चिम एशिया के संघर्षों का आयात न करें'
बौद्धिक और नागरिक समाज के स्तर पर इस समझौते का कड़ा विरोध हो रहा है। बांग्लादेशी अखबार- द डेली स्टार में राजनीतिक विश्लेषक और मानवाधिकार कार्यकर्ता कोलोल किबरिया ने तर्क दिया है कि बांग्लादेश को मक्का समझौते को पूरी तरह से खारिज कर देना चाहिए।
बौद्धिक और नागरिक समाज के स्तर पर इस समझौते का कड़ा विरोध हो रहा है। बांग्लादेशी अखबार- द डेली स्टार में राजनीतिक विश्लेषक और मानवाधिकार कार्यकर्ता कोलोल किबरिया ने तर्क दिया है कि बांग्लादेश को मक्का समझौते को पूरी तरह से खारिज कर देना चाहिए।
मक्का रक्षा समझौते पर विशेषज्ञ की राय।
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अमर उजाला
'संविधान के अनुच्छेद 25 का उल्लंघन'
बांग्लादेशी विश्लेषकों के मुताबिक, देश के संविधान का अनुच्छेद 25- 'सभी के साथ दोस्ती, किसी से बैर नहीं' और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान की वकालत करता है। एक सैन्य गठबंधन में शामिल होना इस पारंपरिक कूटनीतिक लचीलेपन को खत्म कर सकता है।
साथ ही यह भी तर्क दिया गया है कि बांग्लादेश को सिर्फ सऊदी अरब ही नहीं, बल्कि संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), कतर, कुवैत और ओमान जैसे देशों से भी भारी मात्रा में प्रवासियों का पैसा और ऊर्जा मिलती है। सऊदी-ईरान या अन्य संघर्षों में किसी एक का पक्ष लेने से बांग्लादेश के अन्य खाड़ी देशों और ईरान, जिसके साथ ढाका का कोई विवाद नहीं है के साथ संबंध बिगड़ सकते हैं।
'क्षेत्र में सैन्यीकरण का खतरा'
इतिहासकार और शोधकर्ता अल्ताफ परवेज ने बांग्लादेशी अखबार- प्रोथोम आलो में एक लेख के जरिए चेतावनी दी है कि मक्का समझौते के बाद दक्षिण एशिया में भारत और पाकिस्तान/तुर्किये के बीच सैन्य प्रतिद्वंद्विता और तेज होगी। परवेज के मुताबिक, बांग्लादेश के लिए बांग्लादेश फर्स्ट का नारा तभी सार्थक होगा जब वह किसी दूसरे के युद्धों का मैदान बनने से बचे।
बांग्लादेशी विश्लेषकों के मुताबिक, देश के संविधान का अनुच्छेद 25- 'सभी के साथ दोस्ती, किसी से बैर नहीं' और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान की वकालत करता है। एक सैन्य गठबंधन में शामिल होना इस पारंपरिक कूटनीतिक लचीलेपन को खत्म कर सकता है।
साथ ही यह भी तर्क दिया गया है कि बांग्लादेश को सिर्फ सऊदी अरब ही नहीं, बल्कि संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), कतर, कुवैत और ओमान जैसे देशों से भी भारी मात्रा में प्रवासियों का पैसा और ऊर्जा मिलती है। सऊदी-ईरान या अन्य संघर्षों में किसी एक का पक्ष लेने से बांग्लादेश के अन्य खाड़ी देशों और ईरान, जिसके साथ ढाका का कोई विवाद नहीं है के साथ संबंध बिगड़ सकते हैं।
'क्षेत्र में सैन्यीकरण का खतरा'
इतिहासकार और शोधकर्ता अल्ताफ परवेज ने बांग्लादेशी अखबार- प्रोथोम आलो में एक लेख के जरिए चेतावनी दी है कि मक्का समझौते के बाद दक्षिण एशिया में भारत और पाकिस्तान/तुर्किये के बीच सैन्य प्रतिद्वंद्विता और तेज होगी। परवेज के मुताबिक, बांग्लादेश के लिए बांग्लादेश फर्स्ट का नारा तभी सार्थक होगा जब वह किसी दूसरे के युद्धों का मैदान बनने से बचे।
मक्का रक्षा समझौते पर विशेषज्ञ की राय।
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अमर उजाला
'1971 के मुक्ति संग्राम की यादें ताजा'
विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान की मुख्य भूमिका वाले किसी भी सैन्य समझौते में शामिल होने से मौजूदा सरकार को देश के भीतर राजनीतिक विरोध का सामना करना पड़ेगा। बांग्लादेश की धर्मनिरपेक्ष ताकतें इसका कड़ा विरोध कर सकती हैं, क्योंकि समाज के एक बड़े हिस्से के मन में आज भी 1971 के मुक्ति संग्राम और पाकिस्तानी सेना की तरफ से बांग्ला भाषियों पर किए गए जुल्मों की यादें ताजा हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान की मुख्य भूमिका वाले किसी भी सैन्य समझौते में शामिल होने से मौजूदा सरकार को देश के भीतर राजनीतिक विरोध का सामना करना पड़ेगा। बांग्लादेश की धर्मनिरपेक्ष ताकतें इसका कड़ा विरोध कर सकती हैं, क्योंकि समाज के एक बड़े हिस्से के मन में आज भी 1971 के मुक्ति संग्राम और पाकिस्तानी सेना की तरफ से बांग्ला भाषियों पर किए गए जुल्मों की यादें ताजा हैं।