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Jain Manuscripts: ब्रिटेन का संग्रहालय जैन समुदाय को लौटाएगा 2000 दुर्लभ पांडुलिपियां, मिलेगी खोई हुई विरासत
Sun, 17 May 2026 07:08 AM IST
हिमांशु सिंह चंदेल
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वॉशिंगटन
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वॉशिंगटन
Published by: हिमांशु सिंह चंदेल
Updated Sun, 17 May 2026 07:08 AM IST
सार
लंदन का वेलकम कलेक्शन संग्रहालय दक्षिण एशिया के बाहर मौजूद 2,000 दुर्लभ जैन पांडुलिपियों का सबसे बड़ा संग्रह जैन समुदाय को वापस लौटा रहा है। 15वीं से 19वीं सदी की इन पांडुलिपियों में धर्म, साहित्य और चिकित्सा के ग्रंथ शामिल हैं। इसके लिए वेलकम ट्रस्ट, इंस्टीट्यूट ऑफ जैनोलॉजी और बर्मिंघम विश्वविद्यालय के बीच समझौता हुआ है। अब शोधकर्ताओं को इन प्राचीन ग्रंथों के अध्ययन और अनुवाद की सुविधा मिलेगी। पढ़ें रिपोर्ट...
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ब्रिटेन से वापस आएंगे जैन समुदाय के प्राचीन ग्रंथ
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
ब्रिटेन से भारत और जैन समुदाय के लिए एक बहुत ही ऐतिहासिक और गौरवपूर्ण खबर सामने आई है। लंदन के प्रमुख संग्रहालयों में शुमार वेलकम कलेक्शन ने एक सदी से भी अधिक समय से अपने पास रखी जैन धर्म की 2,000 से ज्यादा दुर्लभ पांडुलिपियों को वापस लौटाने का एक बड़ा फैसला लिया है।
यह ऐतिहासिक फैसला इंस्टीट्यूट ऑफ जैनोलॉजी के साथ लंबे संवाद और आपसी सहयोग के बाद लिया गया है। यह दक्षिण एशिया के बाहर मौजूद जैन पांडुलिपियों का सबसे बड़ा संग्रह माना जाता है। इस बड़े कदम से जैन समुदाय को अपनी पुरानी और मूल्यवान धरोहर वापस मिल रही है।
क्या है इन दुर्लभ पांडुलिपियों का इतिहास और महत्व?
लंदन से वापस लौटाई जा रही इन 2000 पांडुलिपियों का इतिहास 15वीं शताब्दी से लेकर 19वीं शताब्दी तक फैला हुआ है। इस विशाल संग्रह में धर्म, साहित्य, चिकित्सा और संस्कृति से जुड़ी कई दुर्लभ सामग्री शामिल है। ये सभी महत्वपूर्ण ग्रंथ प्राकृत, संस्कृत, गुजराती, राजस्थानी और प्रारंभिक हिंदी जैसी प्राचीन लिपियों में सुरक्षित रखे गए हैं।
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महात्मा गांधी और स्वतंत्रता आंदोलन से इसका क्या संबंध है?
इस खास संग्रह में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के नैतिक सिद्धांतों का एक बहुत ही प्रारंभिक और प्रभावशाली उदाहरण भी मौजूद है। यह वही सिद्धांत हैं जिनसे महात्मा गांधी ने प्रेरणा ली थी और बाद में उन्होंने इसे लोकप्रिय बनाया था। इस पुराने दस्तावेज में भारत में ब्रिटिश शासन की बुनियाद की बहुत ही तीखी आलोचना की गई है।
चिकित्सा विज्ञान से जुड़ी कौन सी दुर्लभ प्रति मिली है?
इन हजारों दस्तावेजों के बीच साल 1688 की एक बहुत ही पतली, नाजुक और जर्जर कागजी पांडुलिपि भी संग्रह में मिली है। इस पांडुलिपि को प्रारंभिक हिंदी के सबसे पहले चिकित्सा ग्रंथ 'वैद्य मनोत्सव' (1592) की सबसे पुरानी सुरक्षित प्रति माना जाता है। यह चिकित्सा के इतिहास के लिहाज से एक बहुत ही अहम दस्तावेज है।
इस ऐतिहासिक वापसी को लेकर कई अहम कदम उठाए गए हैं। इस सप्ताह वेलकम ट्रस्ट, इंस्टीट्यूट ऑफ जैनोलॉजी और बर्मिंघम विश्वविद्यालय के बीच एक महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए गए हैं।
इस समझौते की मुख्य बातें
वेलकम कलेक्शन का साहसिक निर्णय
इन दुर्लभ और पवित्र पांडुलिपियों की वापसी से जैन समुदाय में काफी खुशी है। इंस्टीट्यूट ऑफ जैनोलॉजी के प्रबंध न्यासी मेहुल संघराजका ने इस कदम का खुले दिल से स्वागत किया है। उन्होंने वेलकम कलेक्शन के इस साहसिक निर्णय को बेहद ऐतिहासिक बताया है।
मेहुल संघराजका का मानना है कि 2,000 पवित्र ग्रंथों को लौटाने का यह कदम केवल जैन समुदाय के लिए ही नहीं, बल्कि दुनिया के अन्य सभी धार्मिक समुदायों के लिए भी एक बहुत बड़ा आदर्श है। इससे पुरानी धरोहरों के संरक्षण और वापसी की एक नई उम्मीद जगी है।
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यह ऐतिहासिक फैसला इंस्टीट्यूट ऑफ जैनोलॉजी के साथ लंबे संवाद और आपसी सहयोग के बाद लिया गया है। यह दक्षिण एशिया के बाहर मौजूद जैन पांडुलिपियों का सबसे बड़ा संग्रह माना जाता है। इस बड़े कदम से जैन समुदाय को अपनी पुरानी और मूल्यवान धरोहर वापस मिल रही है।
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क्या है इन दुर्लभ पांडुलिपियों का इतिहास और महत्व?
लंदन से वापस लौटाई जा रही इन 2000 पांडुलिपियों का इतिहास 15वीं शताब्दी से लेकर 19वीं शताब्दी तक फैला हुआ है। इस विशाल संग्रह में धर्म, साहित्य, चिकित्सा और संस्कृति से जुड़ी कई दुर्लभ सामग्री शामिल है। ये सभी महत्वपूर्ण ग्रंथ प्राकृत, संस्कृत, गुजराती, राजस्थानी और प्रारंभिक हिंदी जैसी प्राचीन लिपियों में सुरक्षित रखे गए हैं।
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महात्मा गांधी और स्वतंत्रता आंदोलन से इसका क्या संबंध है?
इस खास संग्रह में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के नैतिक सिद्धांतों का एक बहुत ही प्रारंभिक और प्रभावशाली उदाहरण भी मौजूद है। यह वही सिद्धांत हैं जिनसे महात्मा गांधी ने प्रेरणा ली थी और बाद में उन्होंने इसे लोकप्रिय बनाया था। इस पुराने दस्तावेज में भारत में ब्रिटिश शासन की बुनियाद की बहुत ही तीखी आलोचना की गई है।
चिकित्सा विज्ञान से जुड़ी कौन सी दुर्लभ प्रति मिली है?
इन हजारों दस्तावेजों के बीच साल 1688 की एक बहुत ही पतली, नाजुक और जर्जर कागजी पांडुलिपि भी संग्रह में मिली है। इस पांडुलिपि को प्रारंभिक हिंदी के सबसे पहले चिकित्सा ग्रंथ 'वैद्य मनोत्सव' (1592) की सबसे पुरानी सुरक्षित प्रति माना जाता है। यह चिकित्सा के इतिहास के लिहाज से एक बहुत ही अहम दस्तावेज है।
इस ऐतिहासिक वापसी को लेकर कई अहम कदम उठाए गए हैं। इस सप्ताह वेलकम ट्रस्ट, इंस्टीट्यूट ऑफ जैनोलॉजी और बर्मिंघम विश्वविद्यालय के बीच एक महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए गए हैं।
इस समझौते की मुख्य बातें
- इस विशाल संग्रह को प्रारंभिक रूप से बर्मिंघम विश्वविद्यालय में स्थित 'धर्मनाथ नेटवर्क इन जैन स्टडीज' के पास सुरक्षित रखा जाएगा।
- यहां शोधकर्ताओं और जैन समुदाय के लोगों को इन प्राचीन पांडुलिपियों का गहराई से अध्ययन करने की पूरी सुविधा मिलेगी।
- इन ऐतिहासिक ग्रंथों की व्याख्या की जाएगी और लोगों के समझने के लिए इनका आसान भाषा में अनुवाद भी किया जाएगा।
वेलकम कलेक्शन का साहसिक निर्णय
इन दुर्लभ और पवित्र पांडुलिपियों की वापसी से जैन समुदाय में काफी खुशी है। इंस्टीट्यूट ऑफ जैनोलॉजी के प्रबंध न्यासी मेहुल संघराजका ने इस कदम का खुले दिल से स्वागत किया है। उन्होंने वेलकम कलेक्शन के इस साहसिक निर्णय को बेहद ऐतिहासिक बताया है।
मेहुल संघराजका का मानना है कि 2,000 पवित्र ग्रंथों को लौटाने का यह कदम केवल जैन समुदाय के लिए ही नहीं, बल्कि दुनिया के अन्य सभी धार्मिक समुदायों के लिए भी एक बहुत बड़ा आदर्श है। इससे पुरानी धरोहरों के संरक्षण और वापसी की एक नई उम्मीद जगी है।