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ब्रिटेन : भारतीय मूल के डॉक्टरों ने चेताया, कोरोना पर शोध में न हो नस्लीय भेदभाव

Sun, 19 Jul 2020 08:02 PM IST
गौरव पाण्डेय पीटीआई, लंदन
पीटीआई, लंदन Published by: गौरव पाण्डेय Updated Sun, 19 Jul 2020 08:02 PM IST
सार

ब्रिटेन में भारतीय मूल के डॉक्टरों के एक समूह ने चेतावनी दी है कि चिकित्सा अनुसंधान और पद्धति में निहित नस्लीय भेदभाव के चलते ब्रिटेन और दुनियाभर में नस्लीय अल्पसंख्यकों के बीच कोविड-19 का असंगत गंभीर प्रभाव हो सकता है। उन्होंने उनके बीच जीवनशैली से संबंधित जोखिमों का व्यापक अध्ययन किए जाने की मांग की।

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Indian Origin Doctors in Britain warned about racial discrimination in Coronavirus research
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : पिक्साबे

विस्तार

कुछ नस्लीय समूहों के बीच मेटाबोलिक सिंड्रोम (मेट्स) को इस घातक वायरस की भयावहता के लिए जिम्मेदार समझा जा रहा है। ऐसे में ब्रिटेन में कार्यरत हृदय चिकित्सक असीम मल्होत्रा, ब्रिटिश एसोसिएशन ऑफ फिजिशियन ऑफ इंडियन ओरिजन के अध्यक्ष जे एस बामराह और अमेरिका में कार्यरत संक्रामक और मोटापा संबंधी रोग चिकित्सक रवि कामेपल्ली का कहना है कि मेट्स के आनुवांशिक कारकों पर गौर नहीं किया जा रहा है।

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इन चिकित्सकों ने चेतावनी दी कि शरीर में वसा (फैट) के निम्न स्तर पर ही दक्षिण एशियाई मूल के लोगों में टाइप टू मधुमेह जैसी स्थितियों के लिए आनुवांशिक प्रवृतियां जिम्मेदार हो सकती है। उनका कहना है कि 'स्वस्थ वजन' के लिए बॉडी मास इंडेक्स या बीएमआई (व्यक्ति की उंचाई और वजन के बीच अनुपात का सूचकांक) पर विशेष जोर देने के चलते इन तत्वों की अधिक जोखिम के रूप में पहचान नहीं की जा रही है और उसका उपयुक्त प्रबंधन नहीं हो रहा है।
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उन्होंने बड़े बड़े समीक्षकों की कसौटी से गुजरने वाली अकादमिक पत्रिका 'द फिजिशियन' में लिखा है, 'बीएमआई को प्रतिनिधि के रूप में लेने से सुरक्षा को लेकर भ्रांति पैदा हो सकती है और अश्वेत एवं दक्षिण एशियाई मूल के अल्पसंख्यक समूहों के एक बड़े हिस्से के मेट्स जोखिम में होने से ध्यान हटा सकती है।' बीएमआई किसी व्यक्ति की ऊंचाई के संदर्भ में उसके वजन से निर्धारित की जाती है। ब्रिटेन में 30 से अधिक बीएमआई को अस्वस्थता का मानक समझा जाता है।
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बता दें कि स्वास्थ्य और सामाजिक केयर की संस्था पब्लिक हेल्थ इंग्लैंड ने कहा था कि अश्वेतों, एशियाई और अल्पसंख्यक नस्ल (बीएएमई) पृष्ठभूमि के लोगों में कोविड-19 संक्रमण पर अच्छे नतीजे नहीं आने के जोखिम बढ़ जाते हैं। पिछले महीने ब्रिटिश सरकार के एक अधिकारी ने कहा कि ऐतिहासिक नस्लवाद, अल्पसंख्यकों के कोविड-19 से संक्रमित होने और मरने के अधिक जोखिम की वजहों में एक है।


‘बीएएमई समूहों में कोविड-19 मृत्युदर में वृद्धि के लिए खराब चयापचय स्वास्थ्य एक बड़ा मुद्दा है’ नामक अपने शोधपत्र में इन डॉक्टरों ने कहा, ‘जिस तरह नस्लवाद एनएचएस (नेशनल हेल्थ सर्विस में) व्यापक रूप से फैला है , उसी तरह अधिक जोखिम वाले बीएएमई पृष्ठभूमि के मरीजों की पहचान और प्रबंधन में नस्लीय भेदभाव विद्यमान है।’

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