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अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था: अवैध कमाई से राजकाज चलाने को मजबूर है तालिबान!

Fri, 27 Aug 2021 06:35 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काबुल
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काबुल Published by: Harendra Chaudhary Updated Fri, 27 Aug 2021 06:35 PM IST
सार

विश्लेषकों के मुताबिक बीते दो दशक के अफगानिस्तान सरकार के बजट का 80 फीसदी हिस्सा अमेरिका और दूसरे अंतरराष्ट्रीय देशों से अनुदान के रूप में मिलता था। अब ये पूरी रकम रोक दी गई है...

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funds of the Central Bank of Afghanistan in American banks will not be available to the Taliban government
अफगानिस्तान में तालिबानी लड़ाके - फोटो : पीटीआई (फाइल)

विस्तार

तालिबान के काबुल पर कब्जे के बाद से अफगानिस्तान सरकार की नकदी के स्रोत लगभग सूख गए हैं। अफगान सरकार के खजाने में मुख्य आमदनी विदेशी सहायता से होती थी। तालिबान के आने के पहले तक अफगानिस्तान सरकार को मिली सहायता में से एक बड़ी रकम विदेश में जमा थी। लेकिन अमेरिका और अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने अब उस रकम को तालिबान सरकार की पहुंच से बाहर कर दिया है।

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विश्लेषकों के मुताबिक बीते दो दशक के अफगानिस्तान सरकार के बजट का 80 फीसदी हिस्सा अमेरिका और दूसरे अंतरराष्ट्रीय देशों से अनुदान के रूप में मिलता था। अब ये पूरी रकम रोक दी गई है। बीते हफ्ते अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने एलान किया था कि अब अफगानिस्तान उसके संसाधनों को प्राप्त नहीं कर पाएगा। इसमें 37 करोड़ डॉलर की वह रकम भी है, जो इसी महीने अफगानिस्तान को मिलने वाली थी।
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उधर अमेरिका के जो बाइडेन प्रशासन ने एलान किया कि अमेरिकी बैंकों में अफगानिस्तान के सेंट्रल बैंक का जो धन है, वह तालिबान सरकार को उपलब्ध नहीं होगा। बाइडेन प्रशासन ने कहा कि 11 सितंबर 2001 को अमेरिका पर हुए आतंकवादी हमलों के बाद से तालिबान अमेरिकी वित्त विभाग की आतंकवादी संगठनों उस सूची में है, जिन पर प्रतिबंध लगा हुआ है। इसलिए उसकी सरकार को अफगानिस्तान सरकार के नाम पर जमा धन को नहीं निकालने दिया जाएगा।

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पूर्व अफगान अधिकारियों के मुताबिक बाइडन प्रशासन के इस फैसले से अफगानिस्तान सरकार की 9.5 अरब डॉलर की संपत्ति जब्त हो गई है। पिछले 20 साल में जर्मनी भी अफगानिस्तान को अनुदान देने वाले बड़े देशों में शामिल था। उसने अब 50 करोड़ डॉलर की उस रकम का भुगतान रोक दिया है, जो इस साल अफगानिस्तान को मिलने वाली थी। यूरोपियन यूनियन ने अगले चार साल की अवधि में अफगानिस्तान को 1.4 अरब डॉलर की सहायता देने का एलान किया था। अब उसने भी इस रकम का भुगतान रोकने की घोषणा कर दी है।

मानवीय सहायता पहुंचाने वाली संस्था इंटरनेशनल रेस्क्यू कमेटी के मुताबिक इस समय अफगानिस्तान में लगभग एक करोड़ 84 लाख लोगों को तुरंत मानवीय सहायता की जरूरत है। विश्लेषकों ने कहा है कि सहायता रकम रोकने के पश्चिमी देशों के फैसले से तालिबान के लिए राज करना जरूर मुश्किल हो जाएगा, लेकिन उसकी वजह से लाखों अफगान लोगों की मुसीबतें भी बढ़ेंगी। उन्होंने ध्यान दिलाया है कि पिछले हफ्ते वेस्टर्न यूनियन और मनीग्राम ने अफगानिस्तान में अपनी सेवाएं रोक दीं। उससे जो अफगान विदेशों में काम करते हैं, उनके लिए अपनी कमाई हुई रकम को अपने परिवारों तक भेजना अब असंभव हो गया है।

रूसी वेबसाइट रशिया टुडे में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक तालिबान ने 2020 में 1.6 अरब डॉलर खरीदे थे। रशिया टुडे ने ये खबर उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) की तरफ से तैयार कराई गई एक गोपनीय रिपोर्ट के हवाले से छापी है। अनुमान है कि इन डॉलरों के जरिए तालिबान कुछ दिन तक राजकाज का खर्च लाएगा। उसके बाद उसे अवैध स्रोतों से हासिल धन पर ही निर्भर रहना पड़ेगा।

संयुक्त राष्ट्र ने हाल की अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि तालिबान का मुख्य वित्तीय स्रोत आपराधिक है। इनमें अफीम की खेती सबसे बड़ा स्रोत है। इसके अलावा तालिबान गैर-कानूनी खनन से भी पैसा बनाता है। कुछ खबरों के मुताबिक जिन इलाकों पर तालिबान ने पहले ही कब्जा जमा लिया था, वहां उसने एक खास ढंग की कर प्रणाली लागू की थी। उसके तहत खेती की फसल पर दस फीसदी और व्यक्तिगत धन पर 2.5 फीसदी टैक्स लगाया जाता था।

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