बर्बरता पर नहीं पछतावा: हरा हुआ फ्रांस का ‘अल्जीरियाई जख्म’, मैक्रों के बयान पर चौतरफा निराशा
इतिहासकारों के मुताबिक 17 अक्टूबर 1961 को लगभग 30 हजार अल्जीरियाई शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे। उन्होंने कर्फ्यू का उल्लंघन कर प्रदर्शन आयोजित किया था। प्रदर्शन को रोकने के लिए फ्रांस ने दस हजार सैनिकों को तैनात किया था। उन सैनिकों ने अंधाधुंध गोलीबारी की...
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इतिहासकारों और सामाजिक कार्यकर्तां ने इस बात पर निराशा जताई है कि फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने 50 साल पहले अल्जीरिया में फ्रेंच सैनिकों के दमन की साफ शब्दों में निंदा नहीं की। फ्रांस का यह हमला 17 अक्टूबर 1961 को शुरू हुआ था। उसकी पूर्व संध्या पर मैक्रों ने इस बात को स्वीकार किया कि उस दौरान ऐसे अपराध हुए, जिन्हें माफ नहीं किया जा सकता।
लेकिन इससे अल्जीरिया के लोग खुश नहीं हुए हैं। अल्जीरिया फ्रांस का उपनिवेश था। वहां आजादी की लड़ाई के दौरान फ्रेंच सेना ने बर्बर हमला किया था। टीवी चैनल फ्रांस-24 की एक रिपोर्ट के मुताबिक मैक्रों के बयान के बाद अल्जीरिया की लड़ाई में शामिल रहे 81 वर्षीय रहीम रेजिगात ने कहा- ‘यह पर्याप्त नहीं है। मैक्रों शब्दों के साथ खेल रहे हैं। उन्हें अपने मतदाताओं की चिंता है, जो आज भी अल्जीरिया पर फ्रांस के शासन को गर्व के साथ याद करते हैं।’
इतिहासकारों के मुताबिक 17 अक्टूबर 1961 को लगभग 30 हजार अल्जीरियाई शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे। उन्होंने कर्फ्यू का उल्लंघन कर प्रदर्शन आयोजित किया था। प्रदर्शन को रोकने के लिए फ्रांस ने दस हजार सैनिकों को तैनात किया था। उन सैनिकों ने अंधाधुंध गोलीबारी की। उससे 200 से अधिकक लोग मारे गए और 11 हजार घायल हुए। लेकिन फ्रांस सरकार ने सिर्फ तीन लोगों के मारे जाने की बात स्वीकार की थी। फ्रांस सरकार ने यह भी कहा था कि स्थानीय कमांडरों ने बिना उसकी सहमति के ये कार्रवाई की।
राजनीति शास्त्री ओलिवर ला काउर ग्रांडमैसन ने रविवार को फ्रांस-24 से कहा- ‘इस बात पर कोई भरोसा नहीं करता कि स्थानीय कमांडरों ने अपनी मर्जी से कार्रवाई की। हम मानते हैं कि यह सरकारी अपराध था। इसलिए हमें उम्मीद थी कि मैक्रों के बयान में इस बात पर ध्यान दिया जाएगा। लेकिन उसमें पछतावे का कोई संकेत नहीं मिला।’
फ्रांस के औपनिवेशिक दौर के विशेषज्ञ इतिहासकार जाइल्स मैनसेरों ने इसी टीवी चैनल से कहा- ‘यह राजकीय अपराध था, जिसमें कई सरकारी अधिकारी और तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल द’गॉल शामिल दिखते हैँ, हालांकि द’गॉल ने सीधे तौर पर वहां की घटनाओं को निर्देशित नहीं किया था। द’गॉल ने उस घटना पर अफसोस जताया था, लेकिन उन्होंने उस पर परदा डालने की कोशिश भी की थी।’
मानव अधिकार और नस्लभेद विरोधी संगठनों और अल्जीरियाई समुदाय से जुड़ी संस्थाओं ने रविवार को पेरिस में एक श्रद्धांजलि मार्च निकाला। उन्होंने फ्रेंच अधिकारियों से मांग की वे उस घटना में अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करें। उन्होंने कहा कि अल्जीरिया की आजादी की लड़ाई के दौरान जो त्रासदियां और भयानक घटनाएं हुईं, उसकी जिम्मेदारी फ्रेंच अधिकारियों की है। प्रदर्शनकारियों ने मांग की कि उस दौर के और अधिक दस्तावेजों को फ्रांस सरकार सार्वजनिक करे।
हाल ही में मैक्रों की एक टिप्पणी को लेकर फ्रांस और अल्जीरिया में तनाव बढ़ गया था। दोनों देशों में विवाद इतना बढ़ा कि विरोध जताने के लिए अल्जीरिया ने पेरिस स्थित अपने राजदूत को वापस बुला लिया। साथ ही फ्रेंच सेना के विमानों के अल्जीरियाई वायु क्षेत्र के ऊपर से उड़ने पर रोक लगा दी। मैक्रों ने कहा था कि अल्जीरिया पर ‘राजनीतिक-सैनिक व्यवस्था’ का शासन था। इस पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए अल्जीरिया ने कहा कि मैक्रों पूरी तरह से इतिहास को नया रंग देने की कोशिश कर रहे हैँ। उसने कहा- ‘हम इसे नहीं भूल सकते कि अल्जीरिया एक समय फ्रांस का उपनिवेश था। इतिहास को झूठे ढंग से पेश नहीं किया जा सकता।’