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आर्थिक नीतियों में बदलाव: चीन से कारोबार समेटने को लेकर विदेशी कंपनियों का असमंजस जारी

Mon, 11 Oct 2021 07:34 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, लंदन
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, लंदन Published by: Harendra Chaudhary Updated Mon, 11 Oct 2021 07:34 PM IST
सार

सेमीकंडक्टर, ऑटोमोबाइल और टेलीकॉम उद्योगों में आम राय है कि धीरे-धीरे अपना कोराबार हटाना समझदारी भरा कदम होगा। इन क्षेत्र की कंपनियों में आम राय है कि अगर सुरक्षा का वातावरण तनावपूर्ण बना रहा, तो चीन से हट जाना ही उचित कदम होगा। इसके अलावा चीन में हो रहे अंदरूनी बदलावों से भी कारोबार के लिए माहौल बिगड़ रहा है...

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foreign companies in China are in dilemma that continues or close business with China due to changes in economic policies
चीन में मजदूरों की कमी - फोटो : iStock

विस्तार

चीन में आर्थिक नीतियों में तेजी से आ रहे बदलावों के बीच विदेशी कंपनियां यह तय नहीं कर पा रही हैं कि वे अभी वहां बनी रहें, या वहां से तुरंत अपना कारोबार समेट लें। यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफॉर्निया में कंपनियों की इस दुविधा को समझने के लिए एक अध्ययन किया गया। ये अध्ययन रिपोर्ट अब जारी हुई है। इसमें अमेरिका और चीन के बीच चल रहे व्यापार युद्ध के बीच यह समझने की कोशिश की गई है कि चीन से कारोबार समेटने के मामले में कंपनियों की प्रतिक्रिया मिली-जुली क्यों रही है।

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रिपोर्ट के मुताबिक अभी बहुत से विदेशी निवेशक चीन में अपना दांव लगाए रखने के पक्ष में हैं। उनमें ज्यादातर की राय है कि जैसे- जैसे स्थिति ज्यादा स्पष्ट होगी, वैसे-वैसे कुछ चुने हुए क्षेत्रों से विदेशी कंपनियां बाहर जाने का फैसला करेंगी। इस बीच ब्रिटिश अखबार फाइनेंशियल टाइम्स में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक ज्यादातर विदेशी कंपनियों के निदेशक मंडल में चीन से कारोबार समेटने के बारे में चर्चा हुई है। ये कंपनियां चीन में लिए जा रहे फैसलों से नाराज हैं। लेकिन उनमें एक राय यह भी है कि चीन में कुल मिला कर प्राइवेट सेक्टर के लिए सरकारी समर्थन जारी है।
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फाइनेंशियल टाइम्स ने कहा है कि चीन का बाजार इतना बड़ा है कि उसका मोह छोड़ना कंपनियों के लिए मुश्किल साबित हुआ है। इसलिए वे आखिरी मौके तक इंतजार करना चाहती हैँ। इसी क्रम में कई कंपनियों ने चीन में अपना निवेश बढ़ाया भी है। पर्यवेक्षकों के मुताबिक इस मामले में अमेरिका सरकार का रुख भी भ्रम पैदा करने वाला है।

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इस मामले में उन्होंने अमेरिका की वाणिज्य मंत्री के पिछले महीने दिए एक बयान का जिक्र किया। संवाददाताओं से बातचीत करते हुए वाणिज्य मंत्री ने कहा था- ‘पूरी तरह अलगाव की बात करने का कोई मतलब नहीं है, क्योंकि अमेरिका और चीन दोनों एक दूसरे की अर्थव्यवस्था तक पहुंच बनाए रखना चाहते हैं।’ लेकिन उसके साथ ही उन्होंने जोड़ा कि अमेरिका का मकसद चीन में आविष्कार की रफ्तार को धीमा करना है। इसके लिए उसे यूरोप जैसे अपने सहयोगियों के साथ ज्यादा निकटता के साथ काम करना होगा।

मीडिया रिपोर्टों में कारोबारियों के हवाले से बताया गया है कि जब तक चीन के बाजार में वृद्धि जारी रहेगी, पश्चिमी कंपनियां वहां अपना निवेश बनाए रखेंगी। 2020 में यूरोप में साझा उद्यम में शामिल 27 फीसदी कंपनियों ने अपना निवेश बढ़ाया, जबकि 18 फीसदी ने इसमें कटौती की। लेकिन फाइनेंशियल टाइम्स ने कंपनी अधिकारियों से बातचीत के आधार पर कहा है कि ज्यादातर पश्चिमी कंपनियां क्रमिक रूप से चीन से कारोबार हटाने की योजना बना रही हैं।

इस रिपोर्ट के मुताबिक सेमीकंडक्टर, ऑटोमोबाइल और टेलीकॉम उद्योगों में आम राय है कि धीरे-धीरे अपना कोराबार हटाना समझदारी भरा कदम होगा। इन क्षेत्र की कंपनियों में आम राय है कि अगर सुरक्षा का वातावरण तनावपूर्ण बना रहा, तो चीन से हट जाना ही उचित कदम होगा। इसके अलावा चीन में हो रहे अंदरूनी बदलावों से भी कारोबार के लिए माहौल बिगड़ रहा है। यूरोपीय कंपनियों के बीच एक ताजा सर्वे में कंपनी अधिकारियों के बहुमत ने राय जताई कि चीन के नए साइबर सुरक्षा कानून, डेटा सुरक्षा कानून और निजी सूचना संरक्षण कानून का अगले पांच साल में विदेशी कंपनियों पर ‘गहरा नकारात्मक प्रभाव’ पड़ेगा।

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