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जूलियस-आर्डेम को नोबेल: दर्द महसूस कराने वाले रिसेप्टर्स की खोज पर मिला यह सम्मान, जानें क्यों अहम?

Mon, 04 Oct 2021 07:31 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वॉशिंगटन
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वॉशिंगटन Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Mon, 04 Oct 2021 07:31 PM IST
सार

नोबेल कमेटी का कहना है कि इन दोनों वैज्ञानिकों की खोज ने मानव स्थिति के एक सबसे अहम सवाल का जवाब दिया है: आखिर कैसे हम अपने आसपास के वातावरण को महसूस करते हैं?

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David Julius and Ardem Patpoutian the Nobel Winners in Physiology and medicine know what they discovered
चिकित्सा के नोबेल पुरस्कार का एलान। - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

चिकित्सा के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार का एलान सोमवार को किया गया। इस बार अमेरिका के डेविड जूलियस और आर्डेम पैटापूटियन को यह सम्मान दिया गया है। नोबेल पुरस्कार के ट्वीट में कहा गया है कि दोनों को तापमान और छू कर महसूस करने की इंद्रियों से जुड़े रिसेप्टर्स की खोज के लिए नोबेल दिया गया। 
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नोबेल कमेटी ने एक न्यूज रिलीज जारी कर कहा, "हमारी गर्मी, सर्दी और छूकर महसूस करने की क्षमता हमारे जीवन के लिए अहम है और यही हमारे आसपास के वातावरण से हमारी प्रतिक्रिया का आधार है। अपनी रोजाना की जिंदगी में हम इन अनुभवों को महत्व नहीं देते, लेकिन तापमान और दबाव पड़ने पर हमारी नर्व इंपल्स (तंत्रिका आवेग) आखिर किस तरह काम करना शुरू कर देती है?" नोबेल कमेटी ने कहा कि अब इस सवाल का जवाब दो वैज्ञानिकों ने ढूंढ निकाला है।
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क्यों मिला जूलियन और पैटापूटियन को नोबेल?

वैज्ञानिकों के इस जोड़े ने जबरदस्त रिसर्च के बाद यह समझाने की कोशिश की है कि कैसे हमारा स्नायु तंत्र (नर्वस सिस्टम) गर्मी, सर्दी और शरीर से बाहर होने वाली उत्तेजक घटनाओं पर प्रतिक्रिया देता है। इन दोनों ने हमारे आसपास के वातावरण और हमारी इंद्रियों के बीच के जटिल परस्पर प्रभाव को विस्तार से बताया है। 
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जूलियस ने कैपसाइचिन (तीखे असर वाले मिर्च के दाने से बने कंपाउंड) का इस्तेमाल किया, जो कि छूने पर जलन का अहसास कराता है। इसी के जरिए उन्होंने त्वचा की सतह पर उन स्नायु तंत्रिकाओं का पता लगाया, जो कि किसी व्यक्ति को गर्मी का अहसास कराती हैं। 

उधर पैटापूटियन ने दबाव के प्रति संवेदनशील कोशिकाओं के जरिए स्नायु तंत्र में ऐसे नए सेंसर्स का पता लगाया, जो कि किसी बाहरी उत्तेजक घटना पर त्वचा और अंदर मौजूद अंगों की प्रतिक्रिया तय करते हैं। 

क्यों अहम है इन वैज्ञानिकों की रिसर्च?

नोबेल कमेटी का कहना है कि इन दोनों वैज्ञानिकों की खोज ने मानव स्थिति के एक सबसे अहम सवाल का जवाब दिया है: आखिर कैसे हम अपने आसपास के वातावरण को महसूस करते हैं?

हमारी इंद्रियों के चलने के तरीके हजारों साल से हमारा कौतूहल बढ़ा रहे थे। आखिर कैसे हमारी आंखें रोशनी को पहचान लेती हैं, कैसे आवाज की तरंगे हमारे कानों पर प्रभाव डालती हैं और कैसे अलग-अलग केमिकल कंपाउंड हमारे रिसेप्टर्स के साथ संवाद करते हैं, जिससे हमारी नाक और मुंह गंध और स्वाद महसूस करते हैं। 

इस क्षेत्र में पहले क्या खोज हुईं?

17वीं सदी में दार्शनिक रेने डेसकार्टेस ने शरीर के अंदर ऐसे धागों की कल्पना की थी, जिनके जरिए हमारी त्वचा और अलग-अलग अंग दिमाग से कुछ इस तरह जुड़े रहते हैं कि जब भी हमारे पैर में ज्वलनशील पदार्थ लगता है तो उससे एक सिग्नल सीधे दिमाग में जाता है और हमें दर्द महसूस होता है। आगे की रिसर्च में सामने आया कि शरीर में मौजूद सेंसरी न्यूरॉन्स वातावरण में बदलाव को महसूस करते हैं। 

1944 में जोसेफ एरलैंगर और हर्बर्ट गैसर को चिकित्सा क्षेत्र में ऐसी ही एक खोज के लिए नोबेल दिया गया था। इन दोनों ने खोज की थी कि इंसान के शरीर में कई ऐसे नर्व फाइबर होते हैं, जो अलग-अलग उत्तेजकों के बीच फर्क के बारे में बताती हैं। मसलन दर्द देने वाले स्पर्श और बिना दर्द वाले स्पर्शों के बीच में।

अब इस क्षेत्र में नई खोज क्या?

पहले हुई इन खोजों के बावजूद यह सवाल अभी तक बाकी था कि आखिर कैसे तापमान और बाहरी उत्तेजकों पर स्नायु तंत्र में विद्युत आवेग पैदा होते हैं? जूलियस और पैटापूटियन की रिसर्च ने इसी अहम सवाल का जवाब दिया है कि कैसे गर्मी, सर्दी और दबाव पर हमारे स्नायु तंत्र में आवेग पैदा होते हैं। 

दुनियाभर के वैज्ञानिक समुदाय का मानना है कि दर्द महसूस कराने वाले रिसेप्टर्स की पहचान के बाद इन्हें कई तरह की बीमारियों और सदमे के दौरान मिलने वाले दर्द को रोका जा सकता है। इतना ही नहीं कई फार्मास्यूटिकल लैब्स इस वक्त ऐसे मॉलिक्यूल्स की पहचान कर रही हैं, जो इन रिसेप्टर्स को प्रभावित कर के दर्द के उपचार में काम आ सके। खासकर आर्थराइटिस या किसी लंबी बीमारी में मिलने वाले दर्द के उपचार में।

कौन हैं विजेता?

डॉक्टर डेविड जूलियस सैन फ्रैंसिस्को की यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया में फिजियोलॉजी (शरीर विज्ञान) के प्रोफेसर हैं। 1990 में उनके केमिकल कंपाउंड कैपसाइचिन से किए गए एक्सपेरिमेंट ने स्नायु तंत्र पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर कई अहम थ्योरी तैयार करने में मदद की थी।

आर्डेम पैटापूटियन कैलिफोर्निया की ला जोल स्थित स्क्रिप्स रिसर्च में मॉलिक्यूलर बायोलॉजिस्ट और न्यूरोसाइंटिस्ट हैं। उन्होंने बाहरी उत्तेजकों के जरिए पड़ने वाले प्रभावों के केमिकल सिग्नल्स में बदलने पर रिसर्च की है।
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