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हांगकांग की स्वायत्तता पर चीन का नया हमला, चीनी संसद में नया कानून पास

Thu, 12 Nov 2020 04:52 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, हांगकांग
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, हांगकांग Published by: Harendra Chaudhary Updated Thu, 12 Nov 2020 04:52 PM IST
सार

चीन की संसद (नेशनल पीपुल्स कांग्रेस) ने एक नया कानून पास किया, जिससे हांगकांग प्रशासन को विधायी परिषद के सदस्यों की सदस्यता खारिज करने का हक मिल गया...

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China new attack on Hong Kong autonomy, new law passed by Chinese Parliament
हांगकांग में प्रदर्शन - फोटो : PTI (फाइल फोटो)

विस्तार

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चीन ने हांगकांग की स्वायत्तता पर एक नया वार किया है। इसके लिए उसने वह वक्त को चुना, जब इस सवाल पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया कमजोर रहने की संभावना उसे नजर आई। राष्ट्रपति चुनाव के बाद अमेरिका इस वक्त अपने अंदरूनी मामलों में फंसा हुआ है।

उधर ब्रिटेन में कोरोना वायरस महामारी का नया दौर आ गया है। बुधवार को ब्रिटेन यूरोप का पहला देश बना, जहां इस संक्रमण के कारण 50 हजार से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं। इसी बीच चीन की कम्युनिस्ट सरकार ने हांगकांग के मामल में एक नया नियम लागू कर दिया, जिससे ‘एक देश, दो व्यवस्था’ का उसका वादा लगभग पूरी तरह बेमतलब हो जाएगा।

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चीन की संसद (नेशनल पीपुल्स कांग्रेस) ने एक नया कानून पास किया, जिससे हांगकांग प्रशासन को विधायी परिषद के सदस्यों की सदस्यता खारिज करने का हक मिल गया। अब हांगकांग प्रशासन उन सदस्यों को परिषद से हटा सकता है, जिनके खिलाफ ‘विदेशी ताकतों से मिलीभगत करने’, हांगकांग की आजादी की वकालत करने या चीन की राष्ट्रीय संप्रभुता के खिलाफ काम करने का सबूत हो।
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हांगकांग प्रशासन ने तुरंत इस कानून का उपयोग करते हुए बुधवार को चार सदस्यों की सदस्यता खारिज कर दी। उसके विरोध में परिषद के सभी विपक्षी सदस्यों ने इस्तीफा दे दिया। इससे हांगकांग में एक नया और गंभीर संकट खड़ा हो गया है।

चीन के इस कदम की अंतरराष्ट्रीय आलोचना हुई है। लेकिन उस पर लोगों का ज्यादा ध्यान नहीं गया है। इसकी वजह इस समय की अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां हैं, जिसमें चीन के प्रमुख आलोचक देश अपनी समस्याओं में उलझे हुए हैं।

गौरतलब है कि हांगकांग को 19वीं सदी में ब्रिटेन ने जबरन चीन से लीज पर ले लिया था। 1997 में उसने ये द्वीप चीन को वापस किया। तब दोनों पक्षों में ये सहमति बनी थी कि हांगकांग चीन का हिस्सा रहेगा, लेकिन चीन वहां अपना कम्युनिस्ट सिस्टम लागू नहीं करेगा। यानी वह हांगकांग के पूंजीवादी लोकतांत्रिक व्यवस्था को पहले की तरह चलने देगा। इसे ही ‘एक देश, दो व्यवस्था’ का सिद्धांत कहा जाता है। लेकिन हाल के वर्षों में चीन लगातार हांगकांग के लोकतांत्रिक ढांचे को संकुचित कर रहा है।   

इसे पश्चिमी देशों मुद्दा बनाया था। लेकिन कोरोना महामारी आने के बाद इसकी चर्चा कम हो गई। वैसे इसी हफ्ते अमेरिका के विदेश मंत्रालय ने हांगकांग के अधिकारियों पर अतिरिक्त प्रतिबंध लगा दिए हैं। अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो हांगकांग के सवाल पर खूब मुखर रहे हैं। दूसरे मुद्दों पर भी वे चीन के खिलाफ बेलाग बोलते रहे हैं।

लेकिन अमेरिकी चुनाव में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की हार के बाद उनका कार्यकाल अब कार्यवाहक जैसा हो गया है। ऐसे में चीन ने अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने का फैसला किया है। चीन की हमेशा दलील रही है कि उसकी नजर में राष्ट्र के प्रति वफादारी लोकतंत्र से पहले आती है।

जबकि हांगकांग के लोकतंत्र समर्थक गुटों का कहना है कि 1997 के समझौते में खुद चीन ने वादा किया था कि वह हांगकांग वासियों के लोकतांत्रिक अधिकारों में दखल नहीं देगा। मगर पिछले साल उसने वहां नए सुरक्षा नियम लागू किए, जिनके तहत नागरिकों पर निगरानी बढ़ा दी गई। उसके खिलाफ हांगकांग में जोरदार जन आंदोलन शुरू हुआ। अब चीन ने जिन लोकतंत्र समर्थक पार्षदों को निशाना बनाया है, वे उस आंदोलन की भावना की ही नुमांदगी करते हैं।  

 
ये धारणा पहले से रही है कि हांगकांग की विधायी परिषद एक रबर स्टांप संस्था है। उसके पास वैसे अधिकार नहीं हैं, जिससे कोई ठोस फर्क पड़ता। मगर इस संस्था में बोलने की स्वतंत्रता का इस्तेमाल करने वाले पार्षद भी उसे मंजूर नहीं हैं। नए नियम और उसके तहत फौरी कार्रवाई से चीन ने यही संदेश दिया है।

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