ऑकुस का असर: निराश यूरोपियन यूनियन अमेरिका से अपने रिश्तों पर नए सिरे से कर रहा है विचार
पर्यवेक्षकों के मुताबिक अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन के ‘अमेरिका इज बैक’ जुमले से ईयू में उम्मीद पैदा हुई थी। लेकिन अब वह टूट गई है। इसकी शुरुआत तभी हो गई, जब अमेरिका ने बिना किसी योजना के अफगानिस्तान से अपनी फौज वापस बुलाने का फैसला कर लिया। ऑकुस समझौते से यूरोपीय राजधानियों में ये राय गहरा गई है कि जहां खास सौदों की बात हो, अमेरिका उन्हें अपना पार्टनर नहीं मानता...
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तीन अंग्रेजी भाषी देशों- ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, और अमेरिका के बीच नए रक्षा समझौते (ऑकुस) के एलान के बाद से यूरोपियन यूनियन के भीतर ये भावना लगातार गहरा गई है कि चीन का मुकाबला करने के मामले में अमेरिका ने यूरोप को किनारे टिका दिया है। ऑकुस के तहत अमेरिका और ब्रिटेन ने परमाणु पनडुब्बी बनाने के लिए ऑस्ट्रेलिया को टेक्नोलॉजी देने का करार किया है। ये समझौता फ्रांस और ऑस्ट्रेलिया के बीच पहले हो चुके पनडुब्बी करार की कीमत पर हुआ।
इसको लेकर ईयू के भीतर ये भावना पैदा हुई है कि अमेरिका की यूरोप में दिलचस्पी नहीं है। थिंक टैंक यूरोपियन काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के एशिया प्रोग्राम में सीनियर फेलॉ फ्रेडरिक ग्रेयर ने वेबसाइट निक्कई एशिया से कहा- ‘यूरोप में दिलचस्पी गवां देना अमेरिका के लिए कोई नई बात नहीं है। डोनाल्ड ट्रंप को यूरोप के प्रति अपमान का भाव रखने के लिए याद रखा जाएगा। लेकिन यूरोप के प्रति उदासीनता उसके पहले की बात है। चीन से प्रतिद्वंदिता अब अमेरिका की पहली चिंता है और वह उसके मुताबिक ही काम कर रहा है। इसको लेकर किसी को अचरज नहीं होना चाहिए।’
पर्यवेक्षकों के मुताबिक अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन के ‘अमेरिका इज बैक’ जुमले से ईयू में उम्मीद पैदा हुई थी। लेकिन अब वह टूट गई है। इसकी शुरुआत तभी हो गई, जब अमेरिका ने बिना किसी योजना के अफगानिस्तान से अपनी फौज वापस बुलाने का फैसला कर लिया। ऑकुस समझौते से यूरोपीय राजधानियों में ये राय गहरा गई है कि जहां खास सौदों की बात हो, अमेरिका उन्हें अपना पार्टनर नहीं मानता।
यूरोपियन काउंसिल के अध्यक्ष चार्ल्स मिशेल ने कहा है कि ऑकुस से ये जाहिर हुआ है कि जो बाइडन का यूरोप में भरोसा नहीं है। उन्होंने कहा- ‘ट्रंप के समय तो यह उनकी बातों से ही जाहिर था कि यूरोप अमेरिका का पार्टनर या ऐसा सहयोगी नहीं है, जिसकी जगह कोई नहीं ले सकता।
विश्लेषकों के मुताबिक अमेरिकी राजनयिक ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया के साथ अपने को अधिक सहज पा रहे हैं। इसकी एक वजह यह भी हो सकती है कि ईयू के सदस्य कई देशों के चीन के साथ निकट व्यापार संबंध हैं। वे देश अमेरिका के लिए अपने व्यापारिक फायदों की बलि नहीं चढ़ा सकते। चीन के खिलाफ गठबंधन बनाने की जो बाइडन की अपील को फ्रांस, जर्मनी, स्पेन, और इटली कई बार ठुकरा चुके हैं। पिछले हफ्ते ईयू के विदेश मामलों के प्रमुख जोसेप बॉरेल ने कहा था कि ईयू चीन के साथ टकराव के बजाय सहयोग के रास्ते पर चलना चाहता है।
एथेंस स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल इकॉनमिक रिलेशन्स में एशियाई मामलों के प्रमुख प्लामेन तोनचेव ने निक्कई एशिया से कहा- ‘सच यह है कि ईयू के सदस्य 27 देशों के चीन के बारे में अलग-अलग 27 विचार हैं।’ 2019 में जारी ईयू के स्ट्रेटेजिक आउटलुक में चीन को ‘सहभागी, प्रतिस्पर्धी, और प्रतिद्वंद्वी’ बताया गया था। तोनचेव ने कहा- ‘अमेरिका चीन को प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखता है, जबकि ईयू की राय लचीली है। जिस समय अमेरिका का मूड बदल रहा है, ईयू चीन के प्रति उसकी इच्छा के मुताबिक टकराव के लिए तैयार नहीं है।’
फ्रेडरिक ग्रेयर के मुताबिक एक तरफ अमेरिका चाहता है कि ईयू इंडो-पैसिफिक में अधिक भूमिका निभाए। लेकिन जब ईयू कुछ करना चाहता है, तो वह उसे हाशिये पर डाल देता है। इससे ईयू में इस सवाल पर भ्रम बन गया है कि आखिर अमेरिका का सहयोगी होने का मतलब क्या है।