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सोमनाथ: कई हमलों में हजारों भक्त मारे गए, पुनर्निर्माण पर नेहरू और पटेल-प्रसाद टकराए, जानें कैसे मौजूदा स्थिति में पहुंचा मंदिर?

Sat, 21 Aug 2021 05:48 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सोमनाथ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सोमनाथ Published by: कीर्तिवर्धन मिश्रा Updated Sat, 21 Aug 2021 05:48 PM IST
सार

सोमनाथ मंदिर पर 725 ईसवी से 18वीं सदी तक बार-बार हमले हुए। कई राजाओं ने इसका पुनर्निर्माण करवाया। जानिए इस मंदिर की अब तक की यात्रा...

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As PM Narendra Modi speaks of Terror attacks on Somnath know the history of Temple which was   desecrated many times and how Nehru Patel and Rajendra Prasad fought over its reconstruction
सोमनाथ मंदिर। - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को ऐतिहासिक सोमनाथ मंदिर के लिए कई अलग-अलग परियोजनाओं का वर्चुअल तौर पर उद्घाटन किया। प्रधानमंत्री ने इस दौरान कहा कि यह स्थान आज भी पूरे विश्व के सामने यह आह्वान कर रहा है कि आस्था को आतंक से कुचला नहीं जा सकता। मोदी के भाषण को अफगानिस्तान के ताजा हालात पर टिप्पणी के तौर पर भी देखा गया, जहां तालिबान अल्पसंख्यक समुदाय के धार्मिक प्रतीकों को खत्म करने में जुटा है। ऐसे में यह जानना अहम है कि कैसे हजारों सालों में आक्रांताओं के हमलों, मंदिर को कई बार तोड़े और गिराए जाने के बावजूद यह मंदिर आज भी भारत के अहम ऐतिहासिक स्थलों में शामिल है।
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हिंदू ग्रंथों में क्या है सोमनाथ मंदिर का इतिहास?
हिंदुओं का पवित्र स्थल सोमनाथ मंदिर भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से पहला माना जाता है। गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में स्थित वेरावल बंदरगाह के पास स्थित इस मंदिर की मौजूदगी का जिक्र ऋग्वेद में भी मिलता है।
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सतयुग: प्राचीन हिंदू ग्रंथों के मुताबिक, इस मंदिर का निर्माण सतयुग में राजा चंद्रदेव सोमराज ने करवाया था। तब इस मंदिर को पूरी तरह सोने से तैयार किया गया था।
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त्रेतायुग: माना जाता है कि इस मंदिर को रावण ने चांदी से बनवाया। 

द्वापरयुग: इस मंदिर का पुनर्निर्माण भगवान श्रीकृष्ण ने लकड़ी से करवाया।

कलियुग: राजा भीमदेव सोलंकी ने इस मंदिर को पत्थर की कारीगरी से बनवाया। पुरातन खोजों से अब तक यह बात सामने आई है कि साल 1026 में महमूद गजनवी के इस मंदिर पर हमले से पहले इसे तीन बार बनवाया जा चुका था। बाद में इस पर मुगलकाल तक करीब 17 हमले हुए।

इतिहास की किताबों में क्या है मंदिर का जिक्र?
इतिहास की किताबों की मानें तो सोमनाथ मंदिर आदिकाल से ही त्रिवेणी संगम (तीन नदियों- कपिला, हिरण और सरस्वती का संगम) होने की वजह से हिंदुओं का लोकप्रिय तीर्थस्थल था।

649 ईसवी: अमेरिकी धार्मिक इतिहासकार जे गॉर्डन मेल्टन ने मंदिर के इतिहास से जुड़ी जो जानकारी इकट्ठा की, उसके मुताबिक इस मंदिर का निर्माण प्राचीन समय में हुआ, जबकि मुख्य मंदिर के पास बना एक दूसरा मंदिर यादव राजा वल्लाभी ने 649 ईसवी में बनवाया।

725 ईसवी: सिंध क्षेत्र के अरब शासक अल-जुनायद ने गुजरात और राजस्थान पर आक्रमण के दौरान राजा वल्लाभी के बनवाए मंदिर को गिराया।

1026: बताया जाता है कि अरब यात्री अल बरूनी ने अपने यात्रा वृत्तांत में सोमनाथ मंदिर का विवरण लिखा था। इससे प्रभावित होकर महमूद गजनवी ने सन 1024 में सोमनाथ मंदिर पर हमला किया, उसकी सम्पत्ति लूटी और उसे नष्ट कर दिया। माना जाता है कि गजनवी ने उस दौर में 2 करोड़ दिनार यानी आज के करीब 500 करोड़ रुपए के बराबर की संपत्ति लूटी थी। यह भी माना जाता है कि महमूद गजनवी ने मंदिर पर हमले के दौरान करीब 50 हजार भक्तों की हत्या कर दी थी।

1026-1042: महमूद गजनवी के लौटने के बाद गुजरात के सोलंकी राजा भीमदेव और मालवा के राजा भोज ने इस मंदिर का पुनर्निर्माण कराया।

1299: सन 1297 में जब अलाउद्दीन खिलजी की दिल्ली सल्तनत ने गुजरात पर कब्जा किया तो इसे फिर तबाह किया गया। मंदिर में फिर लूटपाट हुई और अगले कुछ सालों तक यही सिलसिला जारी रहा।

1394: दिल्ली सल्तनत के इस मंदिर पर आक्रमण के बाद मंदिर को फिर से सौराष्ट्र के हिंदू राजा महिपाल-I ने बनवा दिया। फिर तीसरी बार 1394 में दिल्ली सल्तनत के मुजफ्फर शाह ने मंदिर को फिर से तुड़वाया और सारा चढ़ावा लूट लिया। शाह के गुजरात का सुल्तान बनने के बाद यह मंदिर लंबे समय तक क्षतिग्रस्त हालात में रहा। इस बीच मंदिर को बीच-बीच में कई बार तोड़ा गया और हिंदू राजाओं ने इसका पुनर्निर्माण कराना जारी रखा।

1665-1706: मुगल शासन में मंदिर में कई बार तोड़फोड़ की गई। हालांकि, सोमनाथ मंदिर की इमारत में जो बड़ी तबाही की गई, वो 1665 से लेकर 1706 के बीच औरंगजेब के समय में हुई। दरअसल, 1665 में जब इस मंदिर को तोड़ने के बाद भी भक्तों का यहां आना कम नहीं हुआ, तो औरंगजेब ने सैन्य टुकड़ी भेजी और बड़ी संख्या में लोगों को मरवा दिया। बताया जाता है कि इसके बाद 18वीं सदी के अंत तक यह मंदिर क्षतिग्रस्त रहा।

1780: इतिहास की किताबों में जो जानकारी मिलती है, उसके मुताबिक इंदौर की महारानी देवी अहिल्याबाई होलकर ने औरंगजेब के शासन में तबाह किए गए ज्योतिर्लिंगों वाले कई मंदिरों का पुनर्निर्माण कराया। इनमें उत्तर प्रदेश में स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर, महाराष्ट्र के घृष्णेश्वर मंदिर प्रमुख रहे। बताया जाता है कि जब अहिल्याबाई सोमनाथ मंदिर का निर्माण कराने पहुंचीं, तो इस पर हमले की आशंका के चलते उन्होंने पुराने मंदिर का जीर्णोद्धार नहीं कराया, बल्कि इससे कुछ दूरी पर ही एक अलग मंदिर बनवाया। कहा जाता है कि ऐसा करने के पीछे उनका मकसद ध्वस्त मंदिर को भविष्य में हो सकने वाली टूट-फूट से बचाना था, ताकि लोगों का इस पर ध्यान ही न जाए।

1947: भारत पर अंग्रेजों के तकरीबन 200 सालों के राज के दौरान सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण पर किसी का ध्यान नहीं गया। हालांकि, 13 नवंबर 1947 को पहले उप-प्रधानमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने तबाह हुए सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का बीड़ा उठाया। इस मंदिर के निर्माण के लिए तब आर्किटेक्ट प्रभाशंकर सोमपुरा को बुलाया गया और सोमनाथ से 28 किमी दूर चोरवाड से चूनापत्थर मंगाए गए। पत्थरों को 'नागर' शैली में तराशा गया।

1950: मौजूदा समय में जो मंदिर है, उसका शिलान्यास 11 मई 1950 को पहले राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने किया था। बताया जाता है कि पहले इस मंदिर के निर्माण को लेकर प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का सरदार पटेल और तत्कालीन कैबिनेट मंत्री केएम मुंशी से विवाद रहा। पटेल और नेहरू के बीच इस मुद्दे पर तनाव का कोई पुख्ता रिकॉर्ड नहीं है, वहीं केएम मुंशी और राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के मंदिर के अनावरण समारोह में जाने को लेकर नेहरू की आपत्ति के कई लिखित रिकॉर्ड मौजूद हैं।

केएम मुंशी ने अपनी एक किताब में इस विवाद का जिक्र करते हुए कहा था, "मैं दिसंबर 1922 में एक टूटे तीर्थस्थल के दौरे पर गया। वह तबाह और जला हुआ था, लेकिन मजबूती के साथ खड़ा था।" मुंशी के मुताबिक, अक्टूबर 1947 में जब जूनागढ़ का भारत में विलय हुआ, तब सरदार पटेल ने उनसे कहा था, 'जय सोमनाथ'। इसके बाद पटेल ने मुंशी की देखरेख में सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण शुरू कराया।

मुंशी के मुताबिक, सोमनाथ का पुनर्निर्माण देश से किया गया एक वादा था। हालांकि, जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें बुलाकर कहा कि उन्हें सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण की कोशिश बिल्कुल पसंद नहीं है। यह एक तरह से हिंदू पुनर्जागरण की कोशिश है। माना जाता है कि नेहरू मंदिर के खिलाफ नहीं थे, लेकिन उनके धर्मनिरपेक्ष विचारों में मंदिर का निर्माण उस वक्त अनुचित था।

1951: रिकॉर्ड्स के मुताबिक, जब राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद मंदिर का अनावरण करने जा रहे थे, तब नेहरू ने उन्हें ऐसा करने से रोका, लेकिन राजेंद्र प्रसाद ने नेहरू की सलाह को अनसुना कर दिया और मंदिर के उद्घाटन कार्यक्रम में शामिल हुए। नेहरू का तर्क था कि जनसेवक खुद को पूजा स्थलों से न जोड़ें। वहीं, राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद मानते थे कि सभी धर्मों को बराबरी का आदर मिले।


इतिहासकार रामचंद्र गुहा की किताब के मुताबिक, 2 मई 1951 को नेहरू ने मुख्यमंत्रियों को चिट्ठी लिखी और कहा कि भारत सरकार का इस कार्यक्रम से कोई लेना-देना नहीं है। हालांकि, राजेंद्र प्रसाद ने नेहरू को भेजी चिट्ठी में कहा, "मुझे अपने धर्म पर पूरा भरोसा है और मैं खुद को इससे अलग नहीं कर सकता।" आखिरकार 11 मई 1951 को राष्ट्रपति ने पुनर्निर्मित सोमनाथ मंदिर का उद्घाटन किया।
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