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Gaza Crisis: 7 अक्तूबर के हमलों के बाद बयां नहीं किया जा सकने वाला दर्दनाक साल; शरणार्थी का छलका दर्द
Wed, 09 Oct 2024 04:08 PM IST
अभिषेक दीक्षित
यूएन हिंदी समाचार
यूएन हिंदी समाचार
Published by: अभिषेक दीक्षित
Updated Wed, 09 Oct 2024 04:08 PM IST
सार
7 अक्तूबर को हमास व अन्य फलस्तीनी हथियारबन्द गुटों के हमलों में करीब 1,200 लोगों की जान गई थी और 250 को बंधक बना लिया गया था। इसके बाद से अब तक गाजा में इस्राइल की जवाबी कार्रवाई में अब तक 40 हजार से अधिक फलस्तीनियों की जान जा चुकी है। साथ ही 90 प्रतिशत से अधिक आबादी विस्थापित होने के लिए मजबूर हुई है, जिनमें से बहुत से लोग कई बार विस्थापन का शिकार हो चुके हैं।
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Gaza Crisis
- फोटो : UN
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विस्तार
युद्धग्रस्त गाजा पट्टी के शरणार्थी शिविर में रह रहे एक फलस्तीनी व्यक्ति ने लड़ाई व तबाही के बीच पिछले एक वर्ष के अपने अनुभव को साझा किया। उनके शब्दों में यह एक ऐसी दर्दनाक व्यथा है, जिसे बयां नहीं किया जा सकता है। अहमद अबू आइता, गाजा के उत्तरी इलाके के एक शरणार्थी कैम्प में रहते हैं। 7 अक्तूबर को दक्षिणी इस्राइल पर हमास व अन्य हथियारबन्द गुटों के हमलों के बाद शुरू हुई इस्राइली बमबारी व सैन्य कार्रवाई के कारण लाखों फलस्तीनी जबरन विस्थापन का शिकार हो चुके हैं।
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अहमद अबू आइता ने अपनी पत्नी व बेटे समेत 45 रिश्तेदारों को खोया है। गाजा युद्ध से पहले उनका परिवार एक डेयरी व्यवसाय चलाता था, मगर 20 अक्तूबर 2023 को एक हवाई हमले में उनका प्रतिष्ठान ध्वस्त हो गया। उन्होंने गाजा पट्टी में यूएन न्यूज संवाददाता जियाद तालेब को बताया कि अपने परिवार, अपने बेटे और अपनी पत्नी को खोने की पीड़ा को बयां नही किया ज सकता है। मैं मलबे में दब गया था। मैं मदद के लिए दो दिनों तक कराह रहा था, लेकिन कोई भी मुझे सुन नहीं सका। इस इलाके को खतरनाक समझा जाता है और इसलिए यहां कोई नहीं था। अन्तत:, एक पड़ोसी ने मदद के लिए मेरी चीत्कार को सुना। मेरे परिवार के कुछ सदस्य अब भी मलबे में दबे हुए हैं।
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हमास के हमले
7 अक्तूबर को हमास व अन्य फलस्तीनी हथियारबन्द गुटों के हमलों में करीब 1,200 लोगों की जान गई थी और 250 को बंधक बना लिया गया था। इसके बाद से अब तक गाजा में इस्राइल की जवाबी कार्रवाई में अब तक 40 हजार से अधिक फलस्तीनियों की जान जा चुकी है। साथ ही 90 प्रतिशत से अधिक आबादी विस्थापित होने के लिए मजबूर हुई है, जिनमें से बहुत से लोग कई बार विस्थापन का शिकार हो चुके हैं।
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‘मानो मृत्यु दंड मिल गया हो’
जोनाथन व्हिटऑल, गाजा पट्टी में मानवीय सहायता मामलों में समन्वय के लिए यूएन कार्यालय में एक वरिष्ठ मानवतावादी अधिकारी हैं। उन्होंने बताया कि गाजा में बहुत से फलस्तीनियों को यह महसूस होता है कि जैसे हर किसी को मौत की सजा सुना दी गई है। या तो उनकी जान बमों और गोलियों से जा रही है, या फिर गुजर-बसर का कोई जरिया न होने के कारण, उनका धीरे-धीरे दम घुट रहा है। यूएन अधिकारी ने क्षोभ जताया कि एकमात्र अंतर केवल यह है कि आपकी मौत किस रफ्तार पर होगी।
विध्वंस, विस्थापन व हताशा का एक वर्ष
जोनाथन व्हिटऑल ने कहा कि पिछले एक वर्ष के दौरान बड़े पैमाने पर हुए विध्वंस, फलस्तीनी आबादी के विस्थापन और वहां पसरी हताशा की वजह से गाजा पट्टी में लगभग सभी निवासी मजबूरी में अपने घर छोड़कर जा चुके हैं। गाजा पट्टी के कुल क्षेत्रफल में से अब केवल 13 फीसदी इलाके में लोगों ने शरण ली हुई है। अहमद अबू आइता 12 अन्य लोगों के साथ एक स्कूल की एक छोटी से कक्षा में रह रहे हैं। वो सोचते हैं कि काश, युद्ध से पहले के जीवन को फिर से जी पाते। हालांकि, यह असम्भव है, मगर मैं उम्मीद करता हूं कि मेरे परिवार के जो सदस्य शहीद हुए हैं, वे फिर से वापिस आएंगे।
उन्होंने गाजा में बद से बदतर हो रहे हालात पर भी चिंता जताई। उनके अनुसार, फिल्टर से छने हुए कुछ लीटर पाने के लिए उन्हें धूप में कतार में खड़ा होना पड़ता है। हम आग जलाने के लिए लकड़ी जुटाने में भी संघर्ष कर रहे हैं।
पुराने दिनों में लौटने की आस
गाजा में फिलहाल भोजन और सुरक्षित जल का अभाव है। जरूरतमंदों के लिए पर्याप्त स्तर पर आश्रय की व्यवस्था नहीं है और स्वास्थ्य प्रणाली दरक चुकी है। यूएन मानवतावादी अधिकारी जोनाथन व्हिटऑल ने बताया कि इन हालात में यूएन एजेंसी को हर दिन, जरूरतमंदों तक मानवीय सहायता पहुंचाने से रोका जा रहा है। भीषण तबाही और बड़े पैमाने पर जनहानि के बावजूद अहमद अबू आइता का जज्बा बरकरार है।
उन्होंने कहा कि काबिज शक्ति द्वारा उन पर चाहे जो कुछ भी थोपा जाए, कुछ भी बर्बाद हो जाए, हम हिम्मत नहीं हारेंगे। हम फिर से निर्माण करेंगे। इंशाअल्लाह, हमारी मजबूत वापसी होगी। अपने पिता के नाम व विरासत को जारी रखने के लिए वह फिर से अपने व्यवसाय को खड़ा करना चाहते हैं।
(नोट: यह लेख संयुक्त राष्ट्र हिंदी समाचार सेवा से लिया गया है।)