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छह महीने की मेहनत से तैयार होते हैं दीपावली के दीये
नीरज नरवरिया
Updated Sat, 31 Oct 2026 08:28 PM IST
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अमर उजाला ब्यूरो
झांसी। दीपावली पर घरों को रोशन करने वाले मिट्टी के दीयों की चमक के पीछे कुम्हार परिवारों की छह महीने की मेहनत छिपी होती है। सिपरी बाजार निवासी रामसेवक प्रजापति का परिवार पिछले 50 वर्षों से इस पुश्तैनी हुनर को संजोए हुए है। दीपावली के लिए दीये और देवी-देवताओं की मूर्तियां बनाने की तैयारी परिवार छह महीने पहले से ही शुरू कर देता है। मिट्टी तैयार करने से लेकर दीये बनाने, उन्हें रंगने और थोक बाजार तक पहुंचाने की जिम्मेदारी परिवार खुद संभालता है।
रामसेवक ने बताया कि पहले हाथ से चलने वाले पत्थर के चाक पर दीये बनाने में काफी मेहनत लगती थी। अब इलेक्ट्रिक चाक आने से काम कुछ आसान हुआ है और उत्पादन भी बढ़ा है। उनके बेटे बृजेंद्र प्रजापति के मुताबिक, पहले पत्थर के चाक से एक दिन में करीब एक हजार दीये बन पाते थे, जबकि इलेक्ट्रिक चाक से अब दो हजार से अधिक दीये तैयार हो जाते हैं।
घर बना कार्यशाला, हर मंजिल पर चलता है काम
दीपावली के सीजन में परिवार का पूरा घर एक छोटी कार्यशाला में तब्दील हो जाता है। छत पर दीये बनाने के लिए मिट्टी रखी जाती है, पहली मंजिल पर अधबने दीये और मूर्तियां तैयार होती हैं, जबकि भूतल पर स्प्रे कलर से दीयों को रंगने का काम किया जाता है। मिट्टी को आकार देने से लेकर तैयार उत्पादों को बाजार तक पहुंचाने का काम परिवार के सदस्य मिलकर करते हैं।
पढ़ाई के साथ पुश्तैनी काम में जुटे बेटे
रामसेवक के बेटे अमित और बृजेंद्र प्रजापति पढ़ाई के साथ पिता का हाथ बंटा रहे हैं। दोनों दीये बनाने के अलावा देवी-देवताओं की मूर्तियां भी तैयार करते हैं। परिवार खुद ही तैयार उत्पादों की थोक बिक्री करता है। दीपावली का सीजन समाप्त होने के बाद परिवार के भरण-पोषण के लिए रामसेवक को मजदूरी भी करनी पड़ती है।
महंगे हुए दीये, बढ़ी लागत और मेहनत
अमित ने बताया कि करीब 20 साल पहले एक हजार दीये 200 रुपये में मिलते थे, जबकि वर्ष 2026 में 650 रुपये में 200 दीये बिक रहे हैं। समय के साथ दीयों की कीमत में बदलाव आया है। त्योहार के मौसम में मांग बढ़ने के साथ परिवार के काम का दबाव भी बढ़ जाता है।
मिट्टी को आकार देकर दीया बनाने से लेकर उसे रंगने और बाजार तक पहुंचाने का यह सफर रामसेवक प्रजापति के परिवार की मेहनत, लगन और पारंपरिक हुनर की कहानी बयां करता है। आधुनिक मशीनों ने काम को आसान जरूर बनाया है, लेकिन मिट्टी के दीयों को तैयार करने में लगने वाली मेहनत आज भी बरकरार है।
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