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मौसम पर हिमालयी राज्य ‘भाई-भाई’
देहरादून/प्रवेश कुमारी
Updated Sun, 07 Jul 2013 12:07 PM IST
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उत्तराखंड की केदारघाटी में तबाही के पीछे भले ही राज्य मौसम केंद्र और अन्य विभागों के बीच समन्वय को लेकर खींचातानी रही, लेकिन सवाल यह भी कि आपदा की दृष्टि से संवेदनशील उत्तराखंड में मौसम का सटीक पूर्वानुमान हो भी कैसे? सालों गुजर चुके, प्रस्ताव के बावजूद यहां डाप्लर रडार नहीं लग पाया।
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यह लग जाता तो बादल फटने जैसी स्थितियों की पूर्व सूचना मिल सकती थी। एडवांस वर्क स्टेशन भी तैयार नहीं हो सका, जिसके माध्यम से कई क्षेत्रों के हालात पर स्क्रीन के जरिए मानिटरिंग संभव हो जाती। लाइट डिटेक्टर भी नहीं, जिसके अभाव में बिजली संभावित क्षेत्रों में अलर्ट संभव नहीं।
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न केवल उत्तराखंड बल्कि पड़ोसी हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर जैसे हिमालयी राज्यों में भी हालात एक जैसे हैं। यहां वेदर स्टेशन जरूर हैं, लेकिन रडार, लाइट डिटेक्टर जैसे उपकरण मुहैया नहीं। आपदा कभी कहकर नहीं आती, लेकिन सिर्फ यही सोचकर सामने खड़े खतरे से नजर नहीं चुराई जा सकती।
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यह है अपने उत्तराखंड का हाल
प्रदेश में डाप्लर रडार का प्रस्ताव तकरीबन पांच साल पुराना है। उत्तराखंड राज्य मौसम केंद्र के निदेशक आनंद शर्मा बताते हैं कि यहां 20 ऑटोमेटिक वेदर स्टेशन हैं। इनके माध्यम से तापमान, वायु जैसे कई पैरामीटर की मानिटरिंग होती है। रेन गेज स्टेशनों से बारिश का डाटा मिलता है।
लेकिन ऐडवांस्ड वर्क स्टेशन होने से एक साथ कई स्क्रीन मॉनिटरिंग संभव हो पाएगी, लेकिन अभी यह इंस्टाल नहीं हो सका है। जम्मू-कश्मीर में 22 आटोमेटिक वेदर स्टेशन हैं। इसके अलावा तीन अपर एयर आब्जर्विंग इंस्ट्रूमेंट हैं। जहां तक हिमाचल का सवाल है, राज्य में 23 आटोमेटिक वेदर स्टेशन हैं।
रडार के लिए अभी प्रोसेसिंग चल रही है। इसके लिए शिमला में जमीन ले ली गई है। इस प्रदेश में दिक्कत केवल दो स्थानों लाहौल स्पीति और किन्नौर में आती है, लेकिन बर्फीले क्षेत्र में होने की वजह से अधिकारी उसे चिंताजनक नहीं मानते।
इनका है कहना
दो रडार लगाने के प्रस्ताव को मंजूरी मिली हुई है, लेकिन इसे स्थापित किया जाना अभी शेष है। इसके पश्चात बादल फटने जैसी स्थिति की सूचना मिलनी संभव होगी।
सोनम लोटस, निदेशक, राज्य मौसम केंद्र, जम्मू-कश्मीर।
रेन गेज स्टेशन से जुड़े आंकड़ों के आने के बाद तमाम विभागों से समन्वय बनाया जाता है। इससे किसी भी आपदा की स्थिति में निपटने में मदद मिलती है। रडार लगने बाकी हैं।
मनमोहन सिंह, निदेशक, राज्य मौसम केंद्र, हिमाचल प्रदेश।
आंध्र के सिस्टम से सीखने की जरूरत
आपदा प्रबंधन और विभिन्न विभागों के बीच तालमेल आंध्र प्रदेश से सीखने की जरूरत है। आंध्र प्रदेश में सवा सौ से अधिक आटोमेटिक वेदर स्टेशन हैं। इसके अलावा जर्मनी से आयातित एस-बैंड डाप्लर वेदर रडार लगा हुआ है। चक्रवात से प्रभावित होने वाले इस राज्य में साइक्लोन डिटेक्शन रडार तो है ही, जो चक्रवात संबंधी पूर्वानुमान लगाने में मददगार है, इसके अलावा रेडियो एकाउस्टिक साउंडिंग सिस्टम भी बेहतर है।
हवा और तापमान पर निगाह रखने के साथ ही निचाई वाले बादलों की बेस मॉनिटरिंग के लिए लेजर सीलोमीटर भी लगा है। एसएमएस के माध्यम से मौसम से जुड़ी किसी भी तरह की सूचना आपदा प्रबंधन केंद्र के जरिए कृषि, सिंचाई, जल जैसे विभागों तक पहुंचती है। यह समन्वय बेहतर नतीजे दिलाता है।