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वेद की डायरी में सन्नाटा, बेबसी, खौफ और अब बस मातम...
रुद्रप्रयाग/वेद विलास उनियाल
Updated Sun, 07 Jul 2013 10:05 AM IST
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मौसम विभाग की चेतावनी मन में घुमड़ रही थी कि अगले दो दिन फिर मूसलाधार बारिश हो सकती है। ऋषिकेश में जब दिन में काले बादल छा गए तो लगा अब पहाड़ में जा पाना मुश्किल ही होगा। हल्की सी बारिश में धंस जाने वाले पहाड़ों में अब मूसलाधार बारिश का यही मतलब रह गया है कहीं न कहीं कुछ तहस नहस हो जाना। और सड़के टूट जाना।
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फिर भी चल पड़े जो होगा देखा जाएगा। बारिश तो नहीं हुई। पर मातम के चिह्न पूरे सफर में दिखाई दिए। महाआपदा को लगभग एक पखवाड़ा बीत गया है, पर विनाश हर तरफ नजर आता है। कभी टूटे पहाड़ों के रूप में, कहीं उखड़े पुलों के रूप में, कभी बहती गंगा के कटे ओर छोर से। उन मकानों से भी, जो अब मलबा हो चुके हैं।
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जिन सड़कों में यात्रा सीजन में कभी गाड़ियों का रेला रहता था, वहां एकदम वीरानी हैं। इस मौसम में ऋषिकेश स रुद्रप्रयाग तक अगर सफर करना हो, तो कम से कम तीन हजार वाहन तो सामने से मिलते ही थे। पर सड़कों पर सन्नाटा इस तरह था, कि कभी-कभी ही सामने से कोई वाहन नजर आया। लगा जैसे सफर में हम ही हों।
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हां व्यासी के पास एकाएक कुछ कारें, बसें दिखाईं दी। लेकिन यह और बुरा दृश्य था। कारों में केवल ड्राइवर। हेमकुंड जाने वाले र्तीथयात्री जब यात्रा पूरी करके लौटते थे, तो इन्हीं सड़कों पर समा बंध जाता था। उनके वाहनों पर झंडे फहरे होते। चेहरे में खुशी और उमंग होती। किसी को लुधियाना किसी को जालंधर पहुंचने की ललक होती। पर आपदा ऐसी आई कि जीवन खतरे में पड़ गया तो वाहन की कौन परवाह करता।
आने-जाने वाले से कर गए दर्द बयां
किसी तरह इन वाहनों को कहीं छोड़ गए। एक कार चालक एस के सोढ़ी ने बताया कि पूरा परिवार हेमकुंड के दर्शन के लिए गया था। रास्ते में मुसीबत आई। वो लोग अलग अलग घर पहुंचे। अब किसी तरह उनसे संपर्क हुआ है। अब गाड़ी ले जा रहे हैं। अलग अलग घटनाएं हैं। किसी त्रासदी और गहरे दुख को बयां करते ये वाहन चुपचाप अपने ठिकानों की ओर बढ़ जाते हैं। जिन वाहनों से कभी सत श्री अकाल का उद्घोष उनकी सफल यात्रा का अहसास कराती थी, उनमें अब केवल ड्राइवर ही नजर आता है।
व्यासी में एकदम सन्नाटा पसरा है। यहां यात्रा कुछ देर आराम करते थे। चाय पराठें का भी दौर चलता। दोनों तरफ से आने वाले लोग मिलते। लेकिन अब कुछ नहीं। कुछ दुकानें खुली जरूर है। पर आने वाला कोई नहीं। कब तक आने वालों की राह देखेंगे। महआपदा ने सब कुछ तहस नहस कर दिया। यात्रियों के भरोसे चलते व्यवसाय को भी।
देवप्रयाग में जरूर बाजार में लोग दिखते हैं। कुछ स्थानीय वाहन भी। नीचे अलकनंदा और भगीरथ के संगम में अभी भी गर्जन है। अगला पड़ाव श्रीनगर है। टैक्सी में बैठे एक व्यक्ति की टिप्पणी है, उत्तराखंड में छह ऋःतुओं का स्पष्ट प्रभाव देखकर मन मचलता था। पर अब बरसात को याद नहीं करना चाहेंगे।
एसएसबी में अब तबाही के निशान बाकी
श्रीनगर आता है। शहर में प्रवेश करते ही एसएसबी का सुंदर प्रांगण नजर आता था। सेवा सुरक्षा बंधुत्व के उद्घोष वाली एसएसबी। एसएसबी का यह प्रांगण छावनी, को नदी ने तहस नहस कर दिया। जिन खुले हरे भरे मैदानों में सैनिक कदम ताल करते थे, वहां नदी की रेत पसरी है। नुकसान करोड़ों का है। सब कुछ बर्बाद हुआ है। लोग सहमे हैं कि श्रीनगर की शान एसएसबी यहां से कहीं और स्थानांतरित न हो जाए। आईआईटी में भी बर्बादी के चिन्ह हैं।
सड़कों का हाल बुरा हैं। एक पुराने रास्ते से श्रीनगर पहुंचते हैं। श्रीनगर ने बाढ़ की विभिषिका को बार बार सहा है। रजवाड़ों के समय गौणा ताल क्या फूटी थी कि रजवाड़ों के महल कला महल भी डूब गए थे। नया श्रीनगर बसाया गया। इस बार की बाढ़ से कल्पना की जा सकती है कि किस तरह डूबा होगा शहर। बस स्टेशन में खामोशी पसरी है। बहुत थोड़े से लोग। दुकानों में भीड़ नहीं।
जहां पहले एक चाय पीने के लिए पच्चीस तीस मिनट का इंतजार होता था, वहीं आज कहते ही चाय हाथ में आ जाती है। इस तरह मानों पहले ग्राहक हम ही हो। काला रोड की चहल पहल गायब है। लोग बस ताकते हैं।
सब जगह तबाही
अगला पड़ाव रुद्रप्रयाग है। केवल चौंतीस किमी का सफर। लेकिन इसके बीच बहुत कुछ कहने को है। लोगों की गहरी आस्था से जुड़ा धारी देवी का मंदिर। हर कोई बता देता है कि जहां धारी देवी का मंदिर था, वहां अब जल ही जल है। धारी देवी के मंदिर को ऊपर लाया गया है।
इससे पहले विशाल श्रीनगर जल विद्युत परियोजना नजर आती है। रास्तों में सैलानियों के लिए सुंदर होटल और रेस्त्रा बने हैं। पर सब वीरान है। उनमें कोई नहीं। कभी इन दिनों रेस्त्रा वालों के पास बात करने की फुर्सत नहीं होती थी। रेस्त्रा महकते थे और संगीत गूंजता था वहां अब एकदम खाली कुर्सियां और मेज नजर आते हैं। होटल रेस्त्रा के आगे कोई वाहन नहीं।
सामने एक सुंदर सा गांव दिखाई देता है। हाथ से इशारे गांव की ओर इशारा करते हुए कोई कहता है, दूर से सुंदर दिख रहा है। पर न यहां नारियल होता है न गेंहू, न फूल। बहुत कठिन जिंदगी है। ऊपर से तबाही। गांव का पुल भी टूट गया है। कहां जाएंगे ये लोग।
करीब चालीस पचास घरों का गांव हैं। पता नहीं किस भरोसे यहां लोग टिके हैं या टिके रहेंगे। एक बड़ी दिक्कत तो आगे है। थोड़ी भी बारिश होती है, तो लोग अपने आप से कह देते हैं कि सिरोहबगड़ तो टूट गया होगा। डरावना सिरोहबगड़। हल्की बूंदों में भी चटक जाता है।
बार बार यहां सड़क बनती है। बार बार यह टूटता है। कभी इसका स्थाई समाधान नहीं हुआ। यहां की दरकती चट्टानों के विशेषज्ञों ने न जाने कितने फोटो ले लिए। न जाने मिट्टी के कितनी बार नमूने इक्ट्ठा किए। न जाने कितनी बार नेता यहां आकर गंभीर मुंह बनाकर गए।
नहीं निकला सिरोगगड का विकल्प
पर सिरोहबगड़ का कोई विकल्प नहीं निकला। गाड़ियां यहां घंटों फंसी रह जाती हैं। श्रीनगर से चलते हुए ड्राइवर ने कहा भी, जल्दी चलिए सिरहबगड़ टूट जाएगा।
रुद्रप्रयाग पहुंचने ही वाले थे कि आपदा की त्रासदी उस नीले ढहे मकान पर भी नजर आई। अलकनंदा के दूसरे छोर पर कुछ दूर किसी दूध वाले ने सुंदर सा घर बनाया था। जीवन भर की कमाई से एक सुंदर सा घर बना तो था, पर अभी उसमें रहना शुरू नहीं किया था।
उसमें कोई आता उससे पहले नदी चाकू की तीखी धार की तरह आसपास नीचे की मिट्टी को काटा। और मकान जमीन पर बिछ गया। गंगा का पानी वहां तक नहीं पहुंचा था। पर वहां की मिट्टी को दलदली बनाकर उसे कमजोर कर गया। महाआपदा के तीसरे दिन यह मकान भी ढह गया। ऐसे कई ढहे आशियानें पहाड़ों के दर्द को सुना रहे हैं।