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चुनाव में गायब हैं विकास के मुद्दे
ब्यूरो/ अमर उजाला, उत्तरकाशी
Updated Sat, 28 Jan 2017 09:51 PM IST
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आपदा से बेघर हुए लोगों के पुनर्वास और मूलभूत सुविधाओं से जूझ रहे ग्रामीणों की समस्याओं के निराकरण के मुद्दे चुनाव में कहीं नजर नहीं आ रहे हैं। जिले में आपदा से भूस्खलन के खतरे के साये में आए जिले के तीनों विधानसभा क्षेत्र के 55 गांव में 24 गांव तो अत्यधिक संवेदनशील घोषित किए जा चुके हैं, लेकिन वर्षों से इनकी विस्थापन की फाइल राज्य तथा केंद्र सरकार के बीच ही घूम रही है।
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मोरी, पुरोला के 33 गांव के लोगों ने देश की आजादी के बाद से ग्रिड की लाइट नहीं देखी। यहां कुछ घरों में बांटे गए सोलर सिस्टम 10-15 वर्षों से बंद पड़े हैं। लोग लालटेन व चीड़ के छिलकों की रोशनी में रात का अंधेरा काट रहे हैं। सांखाल कामरा में तो पानी, बिजली और सड़क तक नहीं है। गांव के लोग को आज भी तहसील व ब्लाक मुख्यालय के लिए 35 किमी पैदल जंगली रास्ते से आवागमन करते हैं।
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सालू गांव में 1991 के भूकंप के बाद ध्वस्त बिजली की लाइन अभी तक नहीं बनी। कागजों में इस गांव को विद्युतीकृत दिखाया गया है। पिलंग, जौड़ाव गांव में भी 1991 के भूकंप में क्षतिग्रस्त बिजली की लाइन को ठीक करने में 22 साल लगे। फतेह पर्वत के सात गांव के लिए बनी 200 किलोवाट की धौला लघु जल विद्युत परियोजना चार साल से बंद पड़ी है। ओसला, गंगाड़ गांव के लिए बनी लघु जल विद्युत परियोजना आठ साल में अधर में लटकी है।
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कामरा, सांखाल, फतेह पर्वत, ओसला गंगाड़, सरबडियार व पिलंग जौड़ाव के लिए सड़कें तो स्वीकृत हैं, लेकिन सड़क का काम शुरू नहीं हुआ। बावजूद इसके न तो नेताओं की जुबान में ये मुद्दे हैं और न ही प्रभावित गांव के लोग समस्याएं नेताओं के सामने रख पा रहे हैं।