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कहीं हेड टूटा, कहीं गूलें हैं क्षतिग्रस्त
ब्यूरो/अमर उजाला
Updated Tue, 19 Jan 2016 08:18 PM IST
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किसानों के लिए कभी सिंचाई का महत्वपूर्ण साधन मानी जाने वाली हाइड्रम सिंचाई योजना दम तोड़ रही है।
देखरेख के अभाव में अकेले रवाईं घाटी में लघु सिंचाई विभाग की बीस हाइड्रम योजनाएं सालों से बंद पड़ी हैं। अधिकांश योजनाओं का या तो हेड टूटा है या फिर सिंचाई गूलें क्षतिग्रस्त पड़ी हैं।
सब डिवीजन कार्यालय के अंतर्गत रवाईं घाटी के नौगांव, पुरोला और मोरी ब्लाक में 37 हाइड्रम सिंचाई योजनाओं का निर्माण किया गया। इनसे सैकड़ों नाली कृषि भूमि सिंचित होती थी।
आज स्थिति यह है कि इनमें से सिर्फ 17 योजनाओं पर ही पानी चल रहा है और शेष 20 ठप पड़ी हैं। इनमें से सात को विभाग मृत घोषित कर चुका है।
सूत्रों के अनुसार एक योजना के निर्माण पर करीब 80 से 90 लाख रुपये खर्च होता है।
ऐसे में करोड़ों रुपये की योजनाओं की मरम्मत और देखरेख पर भारी भरकम बजट खर्च होने के डर से इन्हें निष्प्रयोज्य घोषित किया गया है। हाइड्रम योजनाओं के ठप होने से इनसे सिंचित होने वाले खेत बंजर हो रहे हैं।
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कोट...
क्षेत्र में अधिकांश हाइड्रम योजनाएं बंद होने से किसानों के समक्ष सिंचाई का संकट खड़ा हो गया है। खेतों तक पानी नहीं पहुंचने से मटर और गेहूं की फसल बर्बाद हो रही है।
विभाग शीघ्र बंद पड़ी योजनाओं को चालू कराए।
जगमोहन सिंह चंद, अध्यक्ष, रवाईं घाटी फल एवं सब्जी उत्पादक एसोसिएशन
कोट...
बजट के अभाव में मरम्मत नहीं होने से अधिकांश हाइड्रम योजनाएं बंद पड़ी हैं। निष्प्रयोज्य योजनाओं पर पानी चलना संभव नहीं है। बंद पड़ी योजनाओं की मरम्मत के लिए इस साल जिला योजना में बजट स्वीकृत हुआ है। जल्द ही मरम्मत कर खेतों तक पानी पहुंचाया जाएगा।
दीपांकर भारती, सहायक अभियंता लघु सिंचाई
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देखरेख के अभाव में अकेले रवाईं घाटी में लघु सिंचाई विभाग की बीस हाइड्रम योजनाएं सालों से बंद पड़ी हैं। अधिकांश योजनाओं का या तो हेड टूटा है या फिर सिंचाई गूलें क्षतिग्रस्त पड़ी हैं।
सब डिवीजन कार्यालय के अंतर्गत रवाईं घाटी के नौगांव, पुरोला और मोरी ब्लाक में 37 हाइड्रम सिंचाई योजनाओं का निर्माण किया गया। इनसे सैकड़ों नाली कृषि भूमि सिंचित होती थी।
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आज स्थिति यह है कि इनमें से सिर्फ 17 योजनाओं पर ही पानी चल रहा है और शेष 20 ठप पड़ी हैं। इनमें से सात को विभाग मृत घोषित कर चुका है।
सूत्रों के अनुसार एक योजना के निर्माण पर करीब 80 से 90 लाख रुपये खर्च होता है।
ऐसे में करोड़ों रुपये की योजनाओं की मरम्मत और देखरेख पर भारी भरकम बजट खर्च होने के डर से इन्हें निष्प्रयोज्य घोषित किया गया है। हाइड्रम योजनाओं के ठप होने से इनसे सिंचित होने वाले खेत बंजर हो रहे हैं।
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क्षेत्र में अधिकांश हाइड्रम योजनाएं बंद होने से किसानों के समक्ष सिंचाई का संकट खड़ा हो गया है। खेतों तक पानी नहीं पहुंचने से मटर और गेहूं की फसल बर्बाद हो रही है।
विभाग शीघ्र बंद पड़ी योजनाओं को चालू कराए।
जगमोहन सिंह चंद, अध्यक्ष, रवाईं घाटी फल एवं सब्जी उत्पादक एसोसिएशन
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बजट के अभाव में मरम्मत नहीं होने से अधिकांश हाइड्रम योजनाएं बंद पड़ी हैं। निष्प्रयोज्य योजनाओं पर पानी चलना संभव नहीं है। बंद पड़ी योजनाओं की मरम्मत के लिए इस साल जिला योजना में बजट स्वीकृत हुआ है। जल्द ही मरम्मत कर खेतों तक पानी पहुंचाया जाएगा।
दीपांकर भारती, सहायक अभियंता लघु सिंचाई