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डेंगू मरीजों के लिए बकरी का दूध रामबाण
ब्यूरो/अमर उजाला, उत्तरकाशी।
Updated Wed, 09 Dec 2015 09:38 PM IST
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डेंगू जैसी जानलेवा बीमारी पर अंकुश लगाने में रामबाण साबित हो चुके बकरी के दूध की अस्पताल के अलाव अब इसके चीज, पनीर की डिमांड पांच सितारा होटल में बढ़ गई है।
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नेहरू पर्वता रोहण संस्थान के प्राचार्य कर्नल अजय कोठियाल के सहयोग से तैयार ग्रीन पिपुल संगठन ने स्थानीय लोगों की सहभागिता से नागटिब्बा बकरी गांव में बकरियों की जमुनापारी तथा बरबरी जैसी दुधारू नस्ल तैयार करने की मुहिम शुरू कर दी है।
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टाटा फाउंडेशन के सर्वेक्षण में उत्तराखंड में करीब 13 लाख बकरियां हैं। ग्रीन पिपुल संगठन ने शुरूआत में टिहरी जिले की सिलवाड़ लालूर तथा इडवालस्यू पट्टी तथा इससे लगी उत्तरकाशी जिले की गोडर खाटल पट्टी में स्थानीय प्रजाति की बकरियों को दुधारू नस्ल की बकरियों में बदलने की योजना पर काम शुरू किया।
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इसके लिए पंतवाड़ी में दस-दस जमुनापारी तथा बरबरी बकरे लाकर उनसे तैयार शंकर नस्ल को पंतवाड़ी में पनपा कर छह माह बाद नागटिब्बा पहुंचाया जाएगा। संगठन ने अभी देहरादून के विभिन्न हिस्से में एक सौ लोगों तक स्थानीय बकरी का दूध पहुंचाना शुरू कर दिया है।
नई दिल्ली में 400 रुपए गिला तक बिका
नई दिल्ली के फोर्टिश अस्पताल में फार्मेसिस्ट उत्तरकाशी के दीपक भद्री को सितंबर में डेंगू हुआ। यहां बकरी का दूध 400 रुपये गिलास तक बिका।
डाक्टरों ने बताया कि बकरी के दूध में डेंगू के मरीज के खून में प्लेटलेट्स की कमी की भरपाई करने की अद्भुत क्षमता है। भद्री को दूध की कमी के कारण अपने घर उत्तरकाशी आकर एक सप्ताह तक यहीं बकरी का दूध पीकर जान बचानी पड़ी।