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दिल्ली और देहरादून में खुशबु फैला रहे हैं नौगांव के गुलदावदी

Fri, 25 Nov 2016 09:05 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला उत्तरकाशी
ब्यूरो/अमर उजाला उत्तरकाशी Updated Fri, 25 Nov 2016 09:05 PM IST
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Delhi and Dehradun are spreading fragrance of Nagaon Guldavdi
नौगांव के गुलदावदी - फोटो : amarujala
रवांई घाटी के काश्तकारों ने अब जंगली जानवरों से महफूज फूलों की खेती को अपनी आजीविका के लिए अतिरिक्त आय का जरिया बनाना शुरू कर दिया है। कम मेहनत और कम लागत में अधिक मुनाफा देने वाली फूलों की खेती काश्तकारों को खूब रास आ रही है।
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पिछले पांच सालों से नौगांव क्षेत्र के नैणी पिसाऊं, किम्मी, धारी मुलाणा गावों के काश्तकार फूलों की खेती से अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं तो बड़कोट, गडोली तथा राजगढ़ी क्षेत्र के कृष्णा, उपराड़ी, इड़क, बिगराड़ी, कूणी, डख्याटगांव गांवों के 200 काश्तकार इस समय पहली बार गुलदावदी की खेती कर रहे हैं। इनमें 100 महिला काश्तकार भी शामिल हैं।
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काश्तकार साठ रुपये प्रति किलो के औसत दाम से दो टन फूल देहरादून तथा दिल्ली की मंडियों में बेच चुके हैं। फसल को बाजार में भेजने के लिए गडोली, राजगढी तथा बड़कोट के कृष्णा गांव को केन्द्र बनाया गया है, जहां नजदीकी गांव के काश्तकार अपनी फसल को पहुंचाते हैं। उसके बाद सामूहिक रूप से गत्ते की पेटियों में पैक कर मंडी भेजा जा रहा है।       
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जून व जुलाई में बोई जाने वाली गुलदावदी की पौध तीन माह में तैयार हो जाती है तथा काश्तकार इसे नवंबर दिसंबर में बाजार में बेचना शुरू कर देता है। बाजार की डिमांड के हिसाब से काश्तकार व्हाईट स्टार, एलो स्टार तथा पूर्णिमा प्रजाति के फूलों को तैयार कर रहा है।

काश्तकार एक नाली में औसतन दस हजार पौधे उगा सकता है और प्रत्येक पौधे से छह सौ ग्राम से एक किलो तक फूल का उत्पादन होता है। हार्क के सीनियर प्रोग्राम मैनेजर शिशुपाल मेहता का कहना है कि गुलदावदी के फूलों की खेती काश्तकारों के लिए एक अतिरिक्त आय का साधन है।      

  
अर्जुन सिंह, संजय डोभाल, जयदेव सिंह, लायबीरी देवी, सुभद्रा, स्वतंत्री देवी आदि काश्तकारों का कहना है कि उन्होंने हार्क के सहयोग से पहली बार फूलों की खेती की है जिसके अच्छे परिणाम सामने आ रहे हैं। अच्छा मुनाफा मिलने पर वह बड़े स्तर पर फूलों की खेती करने को तैयार हैं।
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