4 साल का सफर और चुनावी आहट, खोया पाया का हिसाब बनाने जुटी सरकार
सत्ताधारी दल में अंदरूनी सत्ता संघर्ष।
सरकार के सत्ता संभालने के बाद कांग्रेस को बदलना अपना मुख्यमंत्री।
कांग्रेस ने लोक सभा में प्रदेश से पांचों सीटों को खोने का भी झेला दंश।
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विस्तार
मुख्यमंत्री बदलने में जून 2013 की आपदा भले की तात्कालिक कारण बनी हो, लेकिन प्रदेश में कांग्रेस में सत्ता संघर्ष और राजनीतिक महत्वाकांक्षा इसका बड़ा कारण बनती दिखी।
केदारनाथ आपदा से राज्य अब कुछ हद तक संभला हुआ दिख रहा है, लेकिन सत्ताधारी दल के अंदरूनी सत्ता संघर्ष में खास बदलाव नहीं दिख रहा है।
एक बार फिर से चुनाव की आहट है और सरकार भी खोया-पाया का हिसाब बनाने में जुटी हुई हैं। इन सब के बीच में वह चुनौतियां बरकरार हैं, जिनका सामना कांग्रेस ने सत्ता संभालते हुए किया था।
प्रदेश में कांग्रेस ने 2012 को सत्ता संभाली थी। उस समय विजय बहुगुणा मुख्यमंत्री बनाए गए थे। विजय बहुगुणा के सामने पहाड़ और मैदान में पनप चुकी आर्थिक असमानता की खाई को पाटने, पलायन की समस्या से निपटने, विकास दर को बनाए रखने, धड़ों में बंटी कांग्रेस को एक सूत्र में पिरोने की चुनौती थी।
बहुगुणा को जूझना पड़ा रावत के लेट बमों से, गंवानी पड़ी कुर्सी
प्रदेश के आर्थिक मोरचे पर जूझ रहे बहुगुणा को उस समय केंद्रीय मंत्री हरीश रावत के लेटर बमों और रावत समर्थकों की दूरी से जूझना पड़ा था। ऐसे वक्त पर जून 2013 की केदारनाथ आपदा ने पूरा सिनेरियो ही बदल कर रख दिया।
आपदा को लेकर देर से जागने, उत्तरकाशी में आपदा पीड़ितों को भजन करने की सलाह देने सहित कई आरोपों के चलते बहुगुणा को अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी थी।
आपदा कई नई चुनौतियां भी लेकर सामने आई और इन सबका सामना हरीश रावत को करना पड़ा। एक फरवरी 2014 को हरीश रावत ने प्रदेश में मुख्यमंत्री का ताज संभाला। कांग्रेस ने लोक सभा में प्रदेश से पांचों सीटों को खोने का दंश भी झेला।
आपदा से बदहाल प्रदेश को संभालने मैदान में उतरे हरीश रावत ने चार धाम यात्रा को स्थगित करने से इनकार किया। गैरसैंण की ओर बहुगुणा कदम बढ़ा ही चुके थे।
राजधानी, पलायन, रोजगार, शिक्षा का सवाल बरकरार
हरीश रावत ने इस सूत्र को भी नहीं छोड़ा, लेकिन गैरसैंण के सवाल को अभी तक पूरी तरह से हल करने में भी वह सफल नहीं हो पाए हैं। इतना होने पर भी चार साल का सफर तय करने वाली कांग्रेस सरकार के सामने चुनौतियां बरकरार हैं।
पलायन इन चार सालों में बढ़ा ही है। प्रति व्यक्ति आय और अन्य आर्थिक मोरचों पर राहत है, लेकिन पहाड़ और मैदान के बीच असमान विकास की खाई जस की तस है। रोजगार, बेहतर शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य, गांवों को फलने-फूलने के लिण् उपयुक्त वातावरण बनाने की चुनौती अभी जस की तय है।
पंचशील सिद्धांत से गरीब, गांव तक का सफर किया तय:
वित्त मंत्री इंदिरा हृदयेश ने 2012-13 का बजट सामने रखते हुए आजीविका सुरक्षा, आर्थिक सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा, आंतरिक और बाहरी सुरक्षा और पर्यावरण सुरक्षा का पंचशील सिद्धांत दिया था।
पांचवां बजट पेश करते हुए इंदिरा ने गरीब, गांव, गुरूजी, गलगल, गन्ना का जिक्र किया। पहले बजट से पांचवें बजट तक की यह यात्रा कांग्रेस में आए बदलाव को बताने के लिए भी पर्याप्त है। सत्ता संभालने के बाद पांच बिंदुओं के आधार तत्व की बात करने वाली कांग्रेस गांव और गरीब तक के चुनावी बजट तक जा पहुंची है।