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Udham Singh Nagar News: तराई में सफेद कारोबार का काला गणित
Thu, 27 Aug 2026 12:52 AM IST
हल्द्वानी ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, ऊधम सिंह नगर
संवाद न्यूज एजेंसी, ऊधम सिंह नगर
Updated Thu, 27 Aug 2026 12:52 AM IST
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रुद्रपुर। तराई में दूध, पनीर और खोये के कारोबार का गणित कई सवाल खड़े कर रहा है। शुद्ध दूध से पनीर-खोया बनाने पर लागत और बिक्री के आंकड़े मुनाफे की कहानी नहीं कहते। ऐसे में त्याैहारी सीजन में फिर मिलावटखोरों की सक्रियता के संकेत मिल रहे हैं।
ऊधम सिंह नगर में रोजाना करीब 70 हजार लीटर दूध की आवक बताई जा रही है। खाद्य सुरक्षा विभाग के आंकड़ों के अनुसार इसमें से 42 हजार लीटर दूध के रूप में खप जाता है। शेष 28 हजार लीटर से रोजाना 20 क्विंटल पनीर और 15 क्विंटल खोवा तैयार होने का दावा है। लेकिन उपलब्ध आंकड़ों को जोड़ने पर 8,500 लीटर दूध का हिसाब सामने नहीं आता। यही अंतर मिलावट की आशंका को जन्म दे रहा है।
आंकड़ों के मुताबिक बाजार में रोजाना 20 क्विंटल पनीर और 15 क्विंटल खोये की खपत है। एक किलो पनीर तैयार करने में करीब छह लीटर और एक किलो खोवा बनाने में करीब पांच लीटर दूध की जरूरत मानी जाए तो 2,000 किलो पनीर के लिए 12 हजार लीटर और 1,500 किलो खोये के लिए 7,500 लीटर यानी कुल 19,500 लीटर दूध चाहिए।
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62 रुपये प्रति लीटर की दर से इस दूध की लागत करीब 12.09 लाख रुपये बैठती है। दूसरी ओर 300 रुपये किलो के हिसाब से 20 क्विंटल पनीर की कीमत छह लाख और 350 रुपये किलो की दर से 15 क्विंटल खोये की कीमत 5.25 लाख रुपये होती है। दोनों की कुल बिक्री कीमत 11.25 लाख रुपये बैठती है।
यानी केवल दूध की लागत ही बिक्री मूल्य से करीब 84 हजार रुपये अधिक हो जाती है। इसमें कारीगरों की मजदूरी, बिजली, किराया और परिवहन जैसे खर्च शामिल नहीं हैं। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि शुद्ध दूध से पनीर और खोवा तैयार करने के बाद यह कारोबार मुनाफे में कैसे चल रहा है।
70 हजार में 8,500 लीटर का हिसाब गायब
विभागीय आंकड़ों के अनुसार 70 हजार लीटर दूध में से 42 हजार लीटर सीधे दूध के तौर पर खप जाता है। पनीर और खोवा बनाने में 19,500 लीटर दूध की जरूरत बताई गई है। इस तरह कुल 61,500 लीटर दूध का ही हिसाब बनता है। शेष 8,500 लीटर दूध के उपयोग को लेकर सवाल खड़ा होता है। खाद्य सुरक्षा विभाग की जांच और लैब रिपोर्ट से ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि बाजार में बिक रहे उत्पादों में किस स्तर तक मिलावट हो रही है।
मिलावट से बढ़ता है वजन और घटती है लागत
मिलावट की आशंका का दूसरा पहलू लागत से जुड़ा है। यदि दूध में पानी या अन्य पदार्थ मिलाकर उसकी मात्रा बढ़ाई जाती है और पनीर-खोये में वजन बढ़ाने वाले पदार्थ मिलाए जाते हैं तो उत्पादन लागत कम हो सकती है। इससे कारोबारी कम कीमत पर उत्पाद तैयार कर भी मुनाफा कमा सकते हैं। किस उत्पाद में कौन-सा पदार्थ मिलाया जा रहा है इसकी पुष्टि केवल प्रयोगशाला जांच से ही हो सकती है। इसलिए विभाग द्वारा लिए जा रहे सैंपलों की जांच इस पूरे गणित की असली तस्वीर सामने ला सकती है।
ऐसे परखें पनीर, खोवा और दूध
पनीर: घर पर केवल देखकर मिलावट की पुख्ता पहचान करना मुश्किल है। पनीर के रबर जैसा अत्यधिक खिंचने या असामान्य बनावट जैसे संकेत संदेह पैदा कर सकते हैं। स्टार्च की जांच के लिए आयोडीन आधारित परीक्षण किया जाता है, लेकिन अंतिम पुष्टि प्रयोगशाला जांच से ही होती है।
खोवा: असामान्य स्वाद, गंध या बनावट मिलावट का संकेत हो सकती है। केवल हाथ पर रगड़कर या स्वाद के आधार पर मिलावट की निश्चित पुष्टि नहीं की जा सकती।
दूध: दूध का बहाव, रंग या सतह पर व्यवहार देखकर उसकी शुद्धता का भरोसेमंद निर्धारण नहीं किया जा सकता। पानी या अन्य पदार्थों की मिलावट की पुष्टि के लिए मान्य परीक्षण जरूरी है।
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शुद्धता का गणित
प्रोडक्ट - बाजार में रोज की खपत एक किलो/लीटर का रेट एक किलो बनाने में दूध कुल दूध की जरूरत
दूध - 42,000 लीटर - 62 रु/लीटर - - 42,000 लीटर
पनीर - 20 क्विंटल (2000 किलो) - 300 रु/किलो - छह लीटर - 12,000 लीटर
खोवा - 15 क्विंटल (1500 किलो) - 350 रु/किलो - पांच लीटर - 7,500 लीटर
(नोट- 70,000 लीटर आवक में से 61,500 लीटर का हिसाब मिला तो भी 8,500 लीटर दूध बच रहा है।)
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कोट:
मिलावटी मिठाई, दूध, पनीर और खोवा खाना सेहत के लिए हानिकारक है। इंसान कोई भी मिलावटी खाद्य सामग्री खाता है तो वह धीमे जहर का ही काम करता है। -डॉ. एसके गोस्वामी, सीएमओ
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खाद्य सुरक्षा विभाग लगातार सीमाओं से आने वाले वाहनों की तलाशी कर रहा है। साथ ही बाजार में मिठाई की दुकान, डेयरी और अन्य प्रतिष्ठानों पर चेकिंग की जा रही है। सैंपलों को जांच के लिए लैब भेजा जा रहा है। -ललित मोहन पांडेय, सहायक आयुक्त, खाद्य सुरक्षा विभाग
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ऊधम सिंह नगर में रोजाना करीब 70 हजार लीटर दूध की आवक बताई जा रही है। खाद्य सुरक्षा विभाग के आंकड़ों के अनुसार इसमें से 42 हजार लीटर दूध के रूप में खप जाता है। शेष 28 हजार लीटर से रोजाना 20 क्विंटल पनीर और 15 क्विंटल खोवा तैयार होने का दावा है। लेकिन उपलब्ध आंकड़ों को जोड़ने पर 8,500 लीटर दूध का हिसाब सामने नहीं आता। यही अंतर मिलावट की आशंका को जन्म दे रहा है।
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आंकड़ों के मुताबिक बाजार में रोजाना 20 क्विंटल पनीर और 15 क्विंटल खोये की खपत है। एक किलो पनीर तैयार करने में करीब छह लीटर और एक किलो खोवा बनाने में करीब पांच लीटर दूध की जरूरत मानी जाए तो 2,000 किलो पनीर के लिए 12 हजार लीटर और 1,500 किलो खोये के लिए 7,500 लीटर यानी कुल 19,500 लीटर दूध चाहिए।
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62 रुपये प्रति लीटर की दर से इस दूध की लागत करीब 12.09 लाख रुपये बैठती है। दूसरी ओर 300 रुपये किलो के हिसाब से 20 क्विंटल पनीर की कीमत छह लाख और 350 रुपये किलो की दर से 15 क्विंटल खोये की कीमत 5.25 लाख रुपये होती है। दोनों की कुल बिक्री कीमत 11.25 लाख रुपये बैठती है।
यानी केवल दूध की लागत ही बिक्री मूल्य से करीब 84 हजार रुपये अधिक हो जाती है। इसमें कारीगरों की मजदूरी, बिजली, किराया और परिवहन जैसे खर्च शामिल नहीं हैं। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि शुद्ध दूध से पनीर और खोवा तैयार करने के बाद यह कारोबार मुनाफे में कैसे चल रहा है।
70 हजार में 8,500 लीटर का हिसाब गायब
विभागीय आंकड़ों के अनुसार 70 हजार लीटर दूध में से 42 हजार लीटर सीधे दूध के तौर पर खप जाता है। पनीर और खोवा बनाने में 19,500 लीटर दूध की जरूरत बताई गई है। इस तरह कुल 61,500 लीटर दूध का ही हिसाब बनता है। शेष 8,500 लीटर दूध के उपयोग को लेकर सवाल खड़ा होता है। खाद्य सुरक्षा विभाग की जांच और लैब रिपोर्ट से ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि बाजार में बिक रहे उत्पादों में किस स्तर तक मिलावट हो रही है।
मिलावट से बढ़ता है वजन और घटती है लागत
मिलावट की आशंका का दूसरा पहलू लागत से जुड़ा है। यदि दूध में पानी या अन्य पदार्थ मिलाकर उसकी मात्रा बढ़ाई जाती है और पनीर-खोये में वजन बढ़ाने वाले पदार्थ मिलाए जाते हैं तो उत्पादन लागत कम हो सकती है। इससे कारोबारी कम कीमत पर उत्पाद तैयार कर भी मुनाफा कमा सकते हैं। किस उत्पाद में कौन-सा पदार्थ मिलाया जा रहा है इसकी पुष्टि केवल प्रयोगशाला जांच से ही हो सकती है। इसलिए विभाग द्वारा लिए जा रहे सैंपलों की जांच इस पूरे गणित की असली तस्वीर सामने ला सकती है।
ऐसे परखें पनीर, खोवा और दूध
पनीर: घर पर केवल देखकर मिलावट की पुख्ता पहचान करना मुश्किल है। पनीर के रबर जैसा अत्यधिक खिंचने या असामान्य बनावट जैसे संकेत संदेह पैदा कर सकते हैं। स्टार्च की जांच के लिए आयोडीन आधारित परीक्षण किया जाता है, लेकिन अंतिम पुष्टि प्रयोगशाला जांच से ही होती है।
खोवा: असामान्य स्वाद, गंध या बनावट मिलावट का संकेत हो सकती है। केवल हाथ पर रगड़कर या स्वाद के आधार पर मिलावट की निश्चित पुष्टि नहीं की जा सकती।
दूध: दूध का बहाव, रंग या सतह पर व्यवहार देखकर उसकी शुद्धता का भरोसेमंद निर्धारण नहीं किया जा सकता। पानी या अन्य पदार्थों की मिलावट की पुष्टि के लिए मान्य परीक्षण जरूरी है।
शुद्धता का गणित
प्रोडक्ट - बाजार में रोज की खपत एक किलो/लीटर का रेट एक किलो बनाने में दूध कुल दूध की जरूरत
दूध - 42,000 लीटर - 62 रु/लीटर - - 42,000 लीटर
पनीर - 20 क्विंटल (2000 किलो) - 300 रु/किलो - छह लीटर - 12,000 लीटर
खोवा - 15 क्विंटल (1500 किलो) - 350 रु/किलो - पांच लीटर - 7,500 लीटर
(नोट- 70,000 लीटर आवक में से 61,500 लीटर का हिसाब मिला तो भी 8,500 लीटर दूध बच रहा है।)
कोट:
मिलावटी मिठाई, दूध, पनीर और खोवा खाना सेहत के लिए हानिकारक है। इंसान कोई भी मिलावटी खाद्य सामग्री खाता है तो वह धीमे जहर का ही काम करता है। -डॉ. एसके गोस्वामी, सीएमओ
खाद्य सुरक्षा विभाग लगातार सीमाओं से आने वाले वाहनों की तलाशी कर रहा है। साथ ही बाजार में मिठाई की दुकान, डेयरी और अन्य प्रतिष्ठानों पर चेकिंग की जा रही है। सैंपलों को जांच के लिए लैब भेजा जा रहा है। -ललित मोहन पांडेय, सहायक आयुक्त, खाद्य सुरक्षा विभाग