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नहीं रहे दूसरे विश्वयुद्ध के सिपाही रामदत्त जोशी
अमर उजाला ब्यूरो ख्ाटीमा।
Updated Wed, 19 Sep 2018 12:40 AM IST
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खटीमा से रामदत्त जोशी की फाइल फोटो।
- फोटो : amar ujala
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एक सितंबर 1939 से दो मई 1945 तक चले मलाया युद्ध में उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई थी। मंगलवार को बनबसा के शारदा घाट पर उनका अंतिम संस्कार किया गया। उनके पुत्र कमलापति जोशी और शंकर दत्त जोशी ने मुखाग्नि दी। रामदत्त के निधन पर नंदन सिंह खड़ायत, बतेशत मुड़ेला, भगवान सिंह, शिवशंकर भाटिया, गोविंद चड्ढ़ा, दीवान सिंह, कृष्णा सिंह, बलवंत नगरकोटी आदि ने शोक जताया है। दूसरे विश्वयुद्ध के सिपाही रामदत्त जोशी ने तीन वर्ष की सेवा में काफी उपलब्धियां हासिल कर ली थीं। उन्हें जॉर्ज पंचम बर्मा स्टार, 1939-1945 स्टार से नवाजे गया था। जोशी के परिवार में दो पुत्र, चार पौत्र और उनका परिवार है।
मूलरूप से गांव कांडा, धारचूला (पिथौरागढ़) निवासी रामदत्त जोशी 21 वर्ष की आयु में 10 जून 1943 को आगरा फर्स्ट पैरा में भर्ती हुए थे। बाद में वह फर्स्ट कुमाऊं में बदल गई थी। सेना में भर्ती के साथ ही उन्होंने एक सितंबर 1939 से दो मई 1945 तक चले मलाया युद्ध में भाग लेकर अंतिम समय तक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस दौरान उन्होंने बर्मा, फ्रांस, इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया और थाईलैंड में अपना युद्ध कौशल दिखाया। युद्ध समाप्ति के बाद उन्हें 23 नवंबर 1946 को इस आश्वासन के साथ सेवानिवृत्त कर दिया गया कि उनकी सेवा की जब भी जरूरत पड़ेगी, बुला लिया जाएगा। इसके बाद उन्हें अन्य साथियों के साथ विशाखापट्टनम भेज दिया गया, जहां से वह पिथौरागढ़ आ गए। उन्हें सेना में बेहतर सेवा के लिए जॉर्ज पंचम द 1939-45 स्टार, जॉर्ज पंचम द बर्मा स्टार और जार्ज पंचम अवार्ड से नवाजा गया था।
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सिपाही रामदत्त जोशी का परिवार वर्ष 1990 में पिथौरागढ़ से खटीमा के आदर्श कॉलोनी में आकर बस गया। उनकी पत्नी नंदा देवी का वर्ष 2006 में निधन हो गया था। सिपाही जोशी के भरे पूरे परिवार में बड़े पुत्र कमलापति त्रिपाठी फॉरेस्ट से और शंकर दत्त जोशी आर्मी से हवलदार के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। उनके चार पौत्रों में जगदीश जोशी घर पर जबकि मनोज जोशी मैकनाइज इन्फेंट्री में बतौर सिपाही मध्य प्रदेश, महेश जोशी उत्तराखंड पुलिस में लोहाघाट में तैनात हैं। सबसे छोटा पौत्र ललित जोशी डिग्री कॉलेज में एमए योग का छात्र है।
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