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Udham Singh Nagar News: उत्तराखंड में परजीवियों के संक्रमण से घट रहा पशुओं का दूध उत्पादन

Mon, 19 Oct 2026 12:26 AM IST
हल्द्वानी ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, ऊधम सिंह नगर
संवाद न्यूज एजेंसी, ऊधम सिंह नगर Updated Mon, 19 Oct 2026 12:26 AM IST
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Milk production in livestock is declining in Uttarakhand due to parasitic infections.
पंतनगर। उत्तराखंड के तराई और पर्वतीय क्षेत्रों में जुगाली करने वाले अधिकतर दुधारू पशु पेट, लीवर और आंतों के परजीवियों से संक्रमित हैं। जीबी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय के पशु वैज्ञानिकों की ओर से प्रदेश के सभी 13 जिलों में 10 वर्षों तक किए गए अध्ययन में यह तथ्य सामने आया है। वैज्ञानिकों के अनुसार परजीवियों के संक्रमण से पशुओं की प्रजनन क्षमता, दुग्ध उत्पादन और वृद्धि दर प्रभावित हो रही है। अध्ययन के आधार पर संक्रमण की पहचान और उसके उपचार के उपाय भी सुझाए गए हैं।
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विश्वविद्यालय के पशु चिकित्सा विज्ञान महाविद्यालय के पशु परजीवी विज्ञान विभाग की अध्यक्ष डॉ. स्तुति वत्स्या और सह प्राध्यापक डॉ. राजीव रंजन कुमार ने बताया कि प्रदेश के तराई और पर्वतीय क्षेत्रों में पशु सालभर परजीवियों से प्रभावित रहते हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) की परियोजना के तहत किए गए अध्ययन में जुगाली करने वाले पशुओं में स्ट्रॉन्गाइलोसिस, एस्केरियोसिस और पत्ताकृमि के संक्रमण सामने आए। पत्ताकृमि में फैसिओला, एम्फिस्टोम और डाइक्रोसिलियम जैसे परजीवी शामिल हैं। संवाद
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-- परजीवियों के उपचार में इस्तेमाल होने वाली औषधियां
पंतनगर। डॉ. राजीव रंजन कुमार के अनुसार, अलग-अलग परजीवियों के उपचार के लिए फेनबेंडाजोल, लेवामिजोल, टेट्रामिजोल हाइड्रोक्लोराइड, आइवरमेक्टिन, ट्राइक्लाबेंडाजोल, क्लोजांटल, ऑक्सीक्लोजानाइड, रैफोक्सानाइड और एलबेंडाजोल जैसी कृमिनाशक औषधियों का उपयोग किया जाता है। औषधि का चयन परजीवी के प्रकार और पशु के शारीरिक भार के अनुसार किया जाना चाहिए। वैज्ञानिकों ने औषधियों की खुराक और इस्तेमाल के समय को लेकर दिशा-निर्देश भी दिए हैं। हालांकि, दवा देने से पहले पशु चिकित्सक से परामर्श करना जरूरी है। दवाओं की सही मात्रा और उपयोग की विधि पशु की प्रजाति, उम्र, वजन, संक्रमण और दवा के निर्धारित निर्देशों के आधार पर तय की जानी चाहिए।
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तराई में औषधियां कब खिलाएं
रोग जुगाली करने वाले छोटे पशु जुगाली करने वाले बड़े पशु स्ट्रोंगाइलोसिस अप्रैल/मई एवं जुलाई /अगस्त मई/जून एवं सितंबर/अक्टूबर पत्ताकृमि नवंबर/दिसंबर, मई एवं जुलाई/अगस्त नवंबर/दिसंबर, मई, जुलाई/अगस्त फीताकृमि अक्तूबर/नवंबर अक्तूबर/नवंबर

एस्केरिओसिस-जन्म के बाद पहली खुराक 7-15 दिन के बीच, दूसरी खुराक एक माह के अंतराल पर तीन माह तक और तीसरी खुराक तीन माह के अंतराल पर एक साल तक।
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पर्वतीय क्षेत्रों में औषधियां कब खिलाएं
रोग जुगाली करने वाले छोटे पशु जुगाली करने वाले बड़े पशु स्ट्रोंगाइलोसिस अप्रैल/मई एवं जुलाई/अगस्त मई/जून एवं सितंबर/अक्तूबर पत्ताकृमि दिसंबर/जनवरी व जुलाई/अगस्त दिसंबर/जनवरी, मई/जुन, सितंबर/अक्तूबर फीताकृमि अक्तूबर-नवंबर अक्तूबर-नवंबर
एस्केरिओसिस-जन्म के बाद पहली खुराक 7-15 दिन के बीच, दूसरी खुराक एक माह के अंतराल पर तीन माह तक और तीसरी खुराक तीन माह के अंतराल पर एक साल तक।
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