पंतनगर। मधुमक्खी (मौन) पालन पर्यावरण के अनुकूल एक कृषि वानिकी आधारित व्यवसाय है। मधुमक्खियों की ओर से पुष्पों से रस एकत्र करके तैयार किया जाने वाला शहद हानिरहित पूर्ण भोजन और पौष्टिक तत्व प्रदान करने वाला खाद्य पदार्थ है। मौन पालन को कम लागत में आसानी से शुरू किया जा सकता है जिसके लिए अधिक समय, श्रम व किसी विशेष प्रशिक्षण की जरूरत नहीं होती। पर्वतीय क्षेत्रों में मौन पालन आय का बेहतरीन जरिया बन सकता है।
जीबी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय स्थित मधुमक्खी अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्र की सह निदेशक डॉ. पूनम श्रीवास्तव ने बताया कि वर्तमान में शहद की राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बढ़ती मांग के कारण मौन पालन बहुत लोकप्रिय हो रहा है। इससे हमें मधु, मोम, मधुमक्खी गोंद (प्रोपोलिस), राज अवलेह एवं मौनविष आदि की प्राप्ति होती है। इसके अलावा मौन, परागण द्वारा फसलों की पैदावार बढ़ाने में भी हमारी अद्भुत सहायता करती है। देश में भूमि की जोत प्राय: बहुत छोटी होती है। मौन पालन के लिए अतिरिक्त भूमि की आवश्यकता नहीं होती है। छोटे किसान व भूमिहीन व्यक्ति भी इस व्यवसाय को सरलतापूर्वक अपना सकते हैं। मौन पालन के लिए भारी शारीरिक कार्य की भी आवश्यकता नहीं होती है। पर्वतीय क्षेत्रों में भारतीय मधुमक्खी एपिस सेरेना इंडिका को पारंपरिक तरीकों द्वारा सदियों से घरों में पाला जा रहा है। इससे लगभग 10-15 किग्रा. शहद/मौन वंश प्रतिवर्ष प्राप्त किया जा सकता है। आज इस शहद की कीमत 500-1000 रुपये प्रति किलो है। वैज्ञानिक तकनीक अपनाकर इससे और अधिक लाभ कमाया जा सकता है। इन क्षेत्रों में कीटनाशकों व रसायनों का उपयोग कम से कम होता है। क्षेत्रों में निर्मित शहद जैविक उत्पाद के रुप में विक्रय किया जाता है।