फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttarakhand ›   Udham Singh Nagar News ›   From tongue to mind... Kashipur's sugar candy, which adds sweetness to relationships, will never be forgotten.

Udham Singh Nagar News: जुबां से जेहन तक... कभी न भूलेगी रिश्तों में मिठास घोलने वाली काशीपुर की मिश्री

Mon, 06 Oct 2025 01:45 AM IST
हल्द्वानी ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, ऊधम सिंह नगर
संवाद न्यूज एजेंसी, ऊधम सिंह नगर Updated Mon, 06 Oct 2025 01:45 AM IST
विज्ञापन
From tongue to mind... Kashipur's sugar candy, which adds sweetness to relationships, will never be forgotten.
काशीपुर। पहाड़ी समाज में रिश्तों की मिठास घोलने वाली काशीपुर की मिश्री का सुनहरा दाैर अब बस यादों में है। लंबे अरसे तक यह इस शहर की खास पहचान बनी रही। 15 साल पहले यहां मिश्री बनाने की भट्ठियां ठंडी हो गईं। यह धंधा अब रामनगर में शिफ्ट हो चुका है।
विज्ञापन

मिश्री सिर्फ मुंह मीठा करने के लिए ही नहीं बल्कि पहाड़ी परंपरा का भी अहम हिस्सा रही है। शादीशुदा बेटियों के घर जाते समय इसे ले जाना शुभ माना जाता था। मेहमानों के स्वागत में ही परोसा जाता था। यह त्योहारों-खुशियों में मिठास घोलती रही। आज भी पहाड़ में कई जगहों पर मिश्री ले जाने का चलन बरकरार है। इतना ही नहीं मिश्री का इस्तेमाल चाय में और आयुर्वेदिक उपचारों में भी किया जाता रहा। गले की खराश से राहत से लेकर पाचन दुरुस्त करने तक।
विज्ञापन




काशीपुर में बने मिश्री और गट्टे की इतनी मांग थी कि कारीगर दिन-रात मेहनत कर रोजाना डेढ़ से दो क्विंटल तक माल तैयार करते थे। करीब 50 साल पहले काशीपुर की बूरा बताशा वाली गली में मिश्री के कारखाने गुलजार रहते थे। यहां से रानीखेत, अल्मोड़ा, बागेश्वर, देघाट और बीरोंखाल जैसे पहाड़ी कस्बों में मिश्री की खेप जाती थी। पुराने कारोबारी बताते हैं कि हरीश लाल अरोड़ा ने मिश्री और गट्टा बनाने का कारोबार शुरू किया था। मांग इतनी होती थी कि माल तैयार करके पहले रामनगर भेजा जाता और वहां से यह पहाड़ के लिए रवाना होती थी। वक्त की मार ने यह कारोबार भी बदल दिया। पिछले 15 वर्षों में यह कारोबार ठप सा हो गया। काशीपुर के बूरा बताशा वाली गली में कारखाने होते थे जो अब बंद हो गए हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन


दिन-रात चलती थी भट्टियां

काशीपुर के नूर मोहम्मद के चाचा अब्दुल हमीद, हलील अहमद मिश्री मिश्री का कारोबार करते थे। नूर बताते हैं कि पहाड़ से इतना ऑर्डर मिलता था कि एक दिन में दो क्विंटल तक मिश्री तैयार की जाती थी। इसके लिए दिन-रात मेहनत की जाती थी। 15 साल पहले उनके दोनों चाचाओं की मौत होने के बाद कारोबार बंद हो गया। अब रामनगर में काशीपुर के कुछ कारीगर मिश्री बनाने का काम करते हैं।


फिर से शुरू करने का सपना

कारोबारी योगेश अरोड़ा कहते हैं कि वह दोबारा मिश्री का कारोबार शुरू करना चाहते हैं। उनका मानना है कि यह सिर्फ व्यापार नहीं बल्कि संस्कृति से जुड़ा काम है। अगर काशीपुर में फिर से बड़े पैमाने पर मिश्री बनेगी तो यहां की पुरानी पहचान और पहाड़ की परंपरा को भी नया जीवन मिलेगा।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed