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उत्तराखंड: चुनाव से पहले फौजी फैक्टर पर फोकस, वन रैंक वन पेंशन से सैनिक कल्याण को बनाया हथियार; पढ़ें पूरी खबर

Fri, 11 Sep 2026 11:02 AM IST
Heera अमर उजाला नेटवर्क, हल्द्वानी
अमर उजाला नेटवर्क, हल्द्वानी Published by: Heera Updated Fri, 11 Sep 2026 11:02 AM IST
सार

उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा ने सैनिक और पूर्व सैनिक परिवारों पर फोकस बढ़ा दिया है। हल्द्वानी में पांच हजार से अधिक पूर्व सैनिकों के गौरव सेनानी मिलन समारोह में राष्ट्रीय अध्यक्ष की मौजूदगी इसी रणनीति की कड़ी मानी जा रही है। 

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2027 Uttarakhand Assembly elections the BJP has increased its focus on military and ex-servicemen families
हल्द्वानी में आयोजित गौरव सेनानी मिलन समारोह में आर्मी कैप लगाए भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ए - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा ने सैनिक और पूर्व सैनिक परिवारों पर फोकस बढ़ा दिया है। हल्द्वानी में पांच हजार से अधिक पूर्व सैनिकों के गौरव सेनानी मिलन समारोह में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की मौजूदगी को इसी रणनीति की कड़ी माना जा रहा है। राज्य में सैनिक और पूर्व सैनिकों की संख्या करीब 3.3 प्रतिशत बताई जाती है जबकि परिवार और रिश्तेदारी के व्यापक प्रभाव के चलते यह वोट बैंक 12 से 13 फीसदी तक बढ़ जाता है।

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भाजपा इस वर्ग के बीच वन रैंक-वन पेंशन, सैनिक सम्मान और राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रमुख मुद्दा बना रही है। नितिन नवीन ने कांग्रेस के पुराने शासनकाल की सीमा सड़कों और सैनिक सुविधाओं की स्थिति की तुलना मौजूदा सरकार के रक्षा बजट, निर्यात और सीमा ढांचे से की। कश्मीर से चीन सीमा तक का जिक्र कर उन्होंने भाजपा सरकार को मजबूत राष्ट्रीय सुरक्षा के नैरेटिव से जोड़ा। इसके पीछे 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले उस सामाजिक आधार को मजबूत करने की कोशिश दिखाई देती है जिसका प्रभाव पहाड़ से लेकर मैदानी सीटों तक माना जाता है।

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ओआरओपी से अग्निवीर तक, मुद्दों की पूरी श्रृंखला
भाजपा के सैनिक संपर्क अभियान का सबसे मजबूत आधार वन रैंक-वन पेंशन (ओआरओपी) है। 2015 में लागू हुई इस व्यवस्था को पूर्व सैनिकों की पेंशन में असमानता कम करने की दिशा में बड़ा कदम बताया गया। उत्तराखंड जैसे राज्य में जहां सैन्य सेवा की परंपरा बड़ी संख्या में परिवारों से जुड़ी है, इसका राजनीतिक महत्व स्वाभाविक रूप से बढ़ जाता है। राज्य सरकार भी इसी नैरेटिव को आगे बढ़ाती रही है। राज्य सरकार भी सैनिक कल्याण के फैसलों को राजनीतिक संदेश के तौर पर सामने रख रही है। शहीदों के गांवों में प्रतिमा लगाने और मृत आश्रितों के आवेदन की समय सीमा बढ़ाने जैसे फैसलों के साथ अग्निवीरों के लिए 10 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण और रोजगार सेल की घोषणा की गई है। हालांकि अग्निवीर योजना भाजपा के लिए चुनौती भी है। कांग्रेस इसे युवाओं के रोजगार और सैन्य भर्ती के भविष्य से जोड़कर सरकार को घेरती रही है।

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नवीन के भाषण में दो चुनावी नैरेटिव

हल्द्वानी के मंच से नितिन नवीन ने सैनिकों के मुद्दे को सीधे राष्ट्रीय सुरक्षा के नैरेटिव से जोड़ दिया। उन्होंने 2011-12 के अरुणाचल दौरे का उदाहरण देते हुए सीमा क्षेत्रों में खराब सड़कों और सैनिकों की कठिनाइयों का जिक्र किया। इसके बाद उन्होंने भाजपा सरकार के दौर में सीमा सड़क ढांचे, रक्षा बजट और रक्षा निर्यात में बढ़ोतरी को रखा। भाजपा पूर्व सैनिकों के बीच सिर्फ यह संदेश नहीं देना चाहती कि उसने सैनिकों के कल्याण के लिए काम किया बल्कि वह कमजोर सुरक्षा व्यवस्था से मजबूत सैन्य क्षमता तक का व्यापक राजनीतिक आख्यान भी स्थापित करना चाहती है।

कश्मीर का लाल चौक भी इसी रणनीति का हिस्सा रहा। भाजपा युवा मोर्चा के महामंत्री रहते हुए प्रेसवार्ता के लिए वह कश्मीर के लाल चौक पहुंचे तो वहां पाकिस्तानी झंडा लहराता देख शर्म से सिर झुक गया। भाजपा की सरकार आने के बाद उसी लाल चौक पर तिरंगा लहराने लगा है। पाकिस्तानी झंडे से तिरंगे तक के प्रतीकात्मक बदलाव का उल्लेख कर नवीन ने राष्ट्रीय सुरक्षा को सीधे भाजपा सरकार की उपलब्धियों से जोड़ा।

सैनिक कार्ड का बड़ा अर्थ

नितिन नवीन का हल्द्वानी दौरा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भाजपा सैनिकों को अलग-अलग सरकारी योजनाओं के लाभार्थी के रूप में नहीं, बल्कि अपने व्यापक चुनावी सामाजिक गठजोड़ के हिस्से के रूप में देखती दिखाई दे रही है। इस रणनीति के तीन स्तर हैं- पूर्व सैनिकों से सीधा संपर्क, उनके परिवारों के जरिए सामाजिक प्रभाव और राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर भाजपा के पक्ष में भावनात्मक माहौल। पहाड़ी जिलों में इसका असर परंपरागत सैन्य पृष्ठभूमि के कारण महत्वपूर्ण हो सकता है जबकि मैदानी सीटों पर सैनिक परिवारों का बिखरा हुआ प्रभाव कई करीबी मुकाबलों में निर्णायक हो सकता है।

गणेश जोशी का ‘लांसनायक’ वाला संदेश

सैनिक कल्याण मंत्री गणेश जोशी का खुद को मंत्री के बजाय ‘लांसनायक’ के रूप में पूर्व सैनिकों के बीच पेश करना भी राजनीतिक संदेश से कम नहीं है। इससे सरकार और पूर्व सैनिक समुदाय के बीच भावनात्मक जुड़ाव बनाने की कोशिश साफ दिखाई देती है। उनका यह कहना कि हल्द्वानी से उठी आवाज दिल्ली तक पहुंचनी चाहिए और 2027 में फिर भाजपा की सरकार बनानी है, समारोह को सीधे चुनावी लक्ष्य से जोड़ देता है। सैनिक सम्मान और राजनीतिक अपील के बीच की दूरी यहां लगभग खत्म हो जाती है।

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