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फिल्म रिवाइंड  हो जाएगी लेकिन बांध नहीं...

Wed, 27 Dec 2017 12:58 AM IST
विपिन खर्कवाल/अमर उजाला ब्यूरो, पिथौरागढ़
विपिन खर्कवाल/अमर उजाला ब्यूरो, पिथौरागढ़ Updated Wed, 27 Dec 2017 12:58 AM IST
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films can be rewinded but not the dam
दिबाकर बेनर्जी - फोटो : अमर उजाला

यशराज फिल्म्स और दिबाकर बनर्जी प्रोडक्शन के बैनर तले बन रही ‘संदीप और पिंकी फरार’ की यूनिट यहां पर फिल्म का क्लाइमैक्स शूट करने में व्यस्त है। फिल्म के निर्देशक दिबाकर पहाड़ की आबोहवा, खान-पान, पहनावे और संस्कृति को लेकर किसी आम पहाड़ी से ज्यादा गहरी समझ रखते हैं। वह पिछले 25 सालों से कुमाऊं-गढ़वाल का दौरा करते आ रहे हैं। फिल्म के जरिये झूलाघाट ऐतिहासिक दस्तावेज बनने जा रहा है। पंचेश्वर बांध को लेकर उनकी सोच भी एक आम पहाड़ी और पर्यावरण प्रेमी से जुदा नहीं है। उनका कहना है कि विकास के साथ तकनीक आज की जरूरत है, लेकिन बांध बनने से हमें वो सब मिलना बंद हो जाएगा जो हमारे लिए आज आसानी से उपलब्ध है। फिर हम वापस आज में आना चाहेंगे। ये हवा, ये लोग, ये वादियां, ये गांव और संस्कृति क्या हम लौटा पाएंगे? नहीं, क्योंकि फिल्मों को रिवाइंड (रीप्ले) करना बेहद आसान है लेकिन बांध या इस जगह का अस्तित्व कभी रिवाइंड नहीं होगा। उम्मीद है इस बारे में सरकारों ने जरूर कुछ न कुछ सोचा होगा। उनसे बातचीत के अंश... 

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-झूलाघाट और पिथौरागढ़ शूट करने का आइडिया कहां से आया, कहीं पढ़ा था या किसी ने सलाह दी ?

-वरुण ग्रोवर (मसान फिल्म के लेखक) ने  संदीप पिंकी की पटकथा लिखी है। कहानी के हिसाब से ऐसा बॉर्डर चाहिए था जहां से किरदार गैरकानूनी तरीके से नेपाल निकल जाए। हमारी रेकी में तीन लोकेशन थी धारचूला, जौलजीबी और झूलाघाट। अगस्त में हमने यहां का दौरा किया तब लैंडस्लाइड हुआ था। धारचूला में इतना बड़ा सेटअप तैयार करना असंभव लगा। पर्याप्त होटल भी नहीं थे। झूलाघाट को टेक्निकल रेकी टीम ने ओके कहा और झूला पुल कहानी को परफेक्शन दे रहा था, तो हम यहां आ गए।
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-लगभग एक महीने से पिथौरागढ़ जिले में हैं। फिल्म निर्माण में क्या चुनौतियां आईं और संभावनाएं कुमाऊं में कितनी देखते हैं?

-दिक्कतें भारत के हर शहर जितनी हैं, लेकिन जब कभी आपको जिंदगी के साथ चलने वाले लोग, मुस्कुराते चेहरे और देसी खाना मिल जाए तो 50 प्रतिशत दिक्कतें मिनटों में खत्म समझो। यहां का खाना इतना स्वादिष्ट और आर्गेनिक है कि उसे शब्दों से कम नहीं करूंगा। मुझे मडुवे की रोटी सबसे अच्छी लगी। जबसे आया हूं वहीं खा रहा हूं। उत्तराखंड में सड़कें चौड़ी हैं इससे आसानी होती है. हवाई सेवा नहीं है तो क्या करें ‘हर किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता...’।
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-‘संदीप और पिंकी फरार ’ का कथानक जहां का है। उस इलाके के लोग ही इस फिल्म को नहीं देख पाएंगे। क्योंकि उनके पास सिंगल स्क्रीन और मल्टीप्लेक्स की सुविधा नहीं है। क्या फिल्मकारों के पास इसका कोई विकल्प है।

-मैं मानता हूं भारत में उस अनुपात में पर्दे नहीं उपलब्ध हैं जितनी आंखें हैं, जबकि हमारे देश में फिल्मों का बोलबाला है। यह समस्या सिर्फ पिथौरागढ़ की नहीं पूरे भारत के छोटे शहरों की है। खराब वितरण इसकी जड़ है। यही वजह है कि पायरेसी बढ़ रही है और उसका आज के दिन तो कोई विकल्प नहीं है। इसे ऐसे समझिए, आप मिट्टी का तेल नहीं देंगे तो लोग इसे ब्लैक में ले लेंगे। ठीक ऐसा ही यहां पर है,  लेकिन इंटरनेट का विस्तार इसे एक दिन विकल्प देगा। समय लगेगा लेकिन हर ब्लॉक के लोग फिल्म का लुत्फ उठा पाएंगे।


- यहां के लोगों को और सरकार को एक निर्माता के तौर पर क्या कहना कहना चाहेंगे ताकि फिल्म निर्माण अधिक से अधिक हो एवं पर्यटन को गति मिल सके?

-यहां के लोगों के चेहरों के खिले रहने और तनावमुक्त रहने का कारण हैं यहां के पेड़ और पौधे। पेड़ नहीं रहेेंगे तो न ये मुस्कान रहेगी और न छोलिया नृत्य रहेगा और न ही यहां की कलाएं रहेंगी। पेड़ भी वह नहीं जो अंग्रेजों के लाए हैं। वह पेड़ जो यहां के हैं, बांज, चीड़, देवदार एवं चौड़ी पत्ती वाले सभी पेड़। इन पेड़ों की तो यहां के लोगों को अपने बच्चों से भी अधिक देखभाल करनी होगी। वरना देवभूमि प्लास्टिक भूमि बन जाएगी। ये हमारे लिए भी जरूरी है कि हम और आगे आने वाली फिल्म यूनिट यहां आकर प्लास्टिक न फेंक कर जाएं। बाकी काम तो यहां के लोगों को ही करना होगा।

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