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दीवाली पर मिट्टी के दिये की रोशनी हुई मंद
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सुल्तानपुर पट्टी बाजार में मिट्टी के बर्तन बेचता बच्चा।
- फोटो : KASHIPUR
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सुल्तानपुर पट्टी। दीपावली का पर्व नजदीक है और मिट्टी के दीये की बिक्री कम होने के कारण कारीगरों के सामने रोजी रोटी का संकट गहरा गया है। वे बाजार में दुकानें लगाकर हाथ पर हाथ रखे बैठे हैं।
मिट्टी के बर्तन बनाने वाले रोहतास प्रजापति ने बताया कि मिट्टी के दीये, बर्तन बनाना उनका पुस्तैनी काम है। पूरा परिवार इस कारोबार में जुटा रहता है। दीपावली आते ही कुम्हारों के चेहरों पर रौनक आ जाती थी लेकिन अब मिट्टी से बने सामान की बिक्री नाममात्र रह जाने से कारोबार पूरी तरह चौपट होने के कगार पर है। कुम्हार किशोरी लाल ने बताया कि मिट्टी के दीये व बर्तन बनाने के लिए मिट्टी व उपले बहुत मंहगे खरीदने पड़ते हैं लेकिन बाजार में दीयों का कोई दाम नहीं मिलता है। बिक्री नहीं होने से मिट्टी के बर्तन घरों में रखे हुए हैं। मिट्टी के बर्तन बनाने वाले रमेश प्रजापति ने बताया कि त्योहार पर बाजार में चाइनीज सामान आने से मिट्टी के दीये और बर्तनों की बिक्री कम हो गई है। कुम्हार राजेंद्र प्रजापति ने बताया कि अपने पुरखों से विरासत में यही काम मिला। दिवाली में हमारे हाथों से बने दीप और मिट्टी के बर्तन सुल्तानपुर पट्टी के साथ यूपी में भी जाते थे लेकिन आज इसकी मांग न होने की वजह से रोजी रोटी का संकट आ खड़ा हुआ है।
युवा कारीगर अजय कुमार ने कहा कि जितनी मेहनत से मिट्टी का सामान तैयार किया जाता है उतना मेहनताना नहीं मिलता। उन्होंने कहा कि कहीं आने वाली पीढ़ी इसको भुला न दे इसलिए भारत सरकार को चाहिए कि इसको जिंदा रखने के लिए कोई योजना लाए।
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मिट्टी के बर्तन बनाने वाले रोहतास प्रजापति ने बताया कि मिट्टी के दीये, बर्तन बनाना उनका पुस्तैनी काम है। पूरा परिवार इस कारोबार में जुटा रहता है। दीपावली आते ही कुम्हारों के चेहरों पर रौनक आ जाती थी लेकिन अब मिट्टी से बने सामान की बिक्री नाममात्र रह जाने से कारोबार पूरी तरह चौपट होने के कगार पर है। कुम्हार किशोरी लाल ने बताया कि मिट्टी के दीये व बर्तन बनाने के लिए मिट्टी व उपले बहुत मंहगे खरीदने पड़ते हैं लेकिन बाजार में दीयों का कोई दाम नहीं मिलता है। बिक्री नहीं होने से मिट्टी के बर्तन घरों में रखे हुए हैं। मिट्टी के बर्तन बनाने वाले रमेश प्रजापति ने बताया कि त्योहार पर बाजार में चाइनीज सामान आने से मिट्टी के दीये और बर्तनों की बिक्री कम हो गई है। कुम्हार राजेंद्र प्रजापति ने बताया कि अपने पुरखों से विरासत में यही काम मिला। दिवाली में हमारे हाथों से बने दीप और मिट्टी के बर्तन सुल्तानपुर पट्टी के साथ यूपी में भी जाते थे लेकिन आज इसकी मांग न होने की वजह से रोजी रोटी का संकट आ खड़ा हुआ है।
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युवा कारीगर अजय कुमार ने कहा कि जितनी मेहनत से मिट्टी का सामान तैयार किया जाता है उतना मेहनताना नहीं मिलता। उन्होंने कहा कि कहीं आने वाली पीढ़ी इसको भुला न दे इसलिए भारत सरकार को चाहिए कि इसको जिंदा रखने के लिए कोई योजना लाए।
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