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बच्चों के बचपन पर भारी बस्तों का बोझ

Sun, 28 Aug 2016 12:57 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो काशीपुर
अमर उजाला ब्यूरो काशीपुर Updated Sun, 28 Aug 2016 12:57 AM IST
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Children's childhood burden of heavy bags
काशीपुर में दोनों बच्चों के बैग टांगकर ले जाती मम्मी - फोटो : अमर उजाला
 नाजुक कंधों पर बस्ते का भारी बोझ बच्चों के बचपन पर भारी पड़ रहा है। कॉपी-किताब भरे बस्ते के बोझ मासूमों के कंधों को झुकाने के साथ ही अनावश्यक तनाव भी दे रहा है। भारी बोझ बच्चों के साथ ही अभिभावकों के लिए भी चिंता का सबब है।
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बच्चों के बस्ते का बोझ कम करने के लिए होने वाली तमाम बातें धरातल पर नहीं उतर पाती हैं। जनकवि स्व. गिरीश तिवारी गिर्दा ने बच्चों का दर्द महसूस किया और कई साल पहले जहां न बस्ता कंधा तोड़े ऐसा हो स्कूल हमारा गीत में उसे उकेरा। बस्तों के बोझ से तंग आकर महाराष्ट्र के दो छात्रों ने प्रेस कांफ्रेंस बुलाकर सरकार से बोझ को कम करने की मांग कर डाली। बच्चों के कदम के बाद भारी भरकम बस्तों का मुद्दा फिर से चर्चाओं में है।
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बच्चों की ओर से उठाए गए सवाल की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है कि बस्तों के बोझ से वे किस कदर मुसीबत में हैं। यह सवाल केवल दो बच्चों का ही नहीं बल्कि प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने वाले कमोबेश हर बच्चे का है। लगातार भारी होती किताबें बच्चों का तनाव बढ़ा रही है। बस्तों से बच्चों की दिक्कतों को अभिभावक बखूबी जानते हैं, मगर मजबूर हैं। हां वे इतना जरूर करते हैं कि बसों या स्कूल तक बच्चों का बैग खुद ढोकर ले जाते हैं।  
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- प्रियंका कहती है कि आज के हिसाब से बच्चों का बस्ता बहुत भारी हो गया है। बस्ते का भार ज्यादा होने की वजह से बच्चों को झुककर चलना पड़ता है। बोझ ज्यादा होने पर मजबूरन अभिभावकों को बच्चों का बस्ता लाना ले जाना पड़ता है।


- मनोज कहते हैं कि मासूम बच्चों के कंधों पर कॉपी किताबों का बहुत ज्यादा बोझ नहीं होना चाहिए। लेकिन अधिकांश स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के बस्तों का बोझ बहुत ज्यादा भारी होता है। इसे कम करने की जरूरत है।

- कामिनी कहती हैं कि भारी भरकम बैग कंधों में टांगने से बच्चों को तकलीफ तो बहुत होती है। अभिभावकों को इसका अहसास भी होता है, मगर वे बहुत चाहने पर भी कुछ नहीं कर पाते हैं।


- अनुज शर्मा के मुताबिक बस्तों का बोझ कम करने के लिए सरकार को ध्यान देने की जरूरत है। महाराष्ट्र में दो बच्चों ने बोझ कम करने की गुहार लगाई है। स्कूलों को भी इस ओर पहल करने की जरूरत है।


एलडी भट्ट सरकारी अस्पताल के हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ. विकास गहलौत कहते हैं कि भारी बोझ से बच्चे के दोनों कंधों में दर्द हो सकता है। रीढ़ की हड्डी टेढ़ी होने के साथ ही स्पाइन (नसों का दर्द) होने की संभावना हो सकती है। कंधों पर बहुत ज्यादा भार डाला गया तो शरीर का झुकाव आगे की तरफ हो जाएगा। इसके अलावा पीठ और गर्दन की हड्डियों पर भी असर पड़ता है।


समर स्टडी हॉल स्कूल की अध्यक्षा मुक्ता सिंह सहित अन्य स्कूलों के प्रधानाचार्य तर्क देते हैं कि अगर बच्चे टाइम टेबल के हिसाब से कॉपी किताब लाते हैं तो वे ज्यादा बोझिल नहीं होती हैं। ये अलग बात है कि बच्चे अपने मन से ज्यादा किताबें ले आएं। बस्तों का बोझ कम करने के लिए ही टाइम टेबिल से कॉपी-किताब मंगवाई जाती हैं। वह कहते हैं कि कोर्स बढ़ने से थोड़ा किताबों की संख्या भी बढ़ी है।
 
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