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कैंसर से लड़ाई में पैतृक जमीन भी बिक गई
ब्यूरो, अमर उजाला, रुद्रपुर
Updated Wed, 04 Feb 2015 12:10 AM IST
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कांग्रेस में कभी तेजतर्रार नेता रही मंजू भट्टी को कैंसर की बीमारी ने पूरी तरह से तोड़ दिया है। पहले जब वह जन आंदोलनों की अगुवाई करती थीं तो उसकी दमदार आवाज से अफसरों के भी पसीने छूट जाते थे। मगर आज बोलने की भी स्थिति में नहीं है। घर वाले उनका इलाज कराने के लिए सबकुछ गंवा चुके हैं। उन्हें पैतृक जमीन तक बेचनी पड़ी। अब भी रोजाना चार हजार रुपए की दवाइयां चल रही हैं।
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आवास विकास में रहने वाली मंजू भट्टी को लोग ‘भोली’ नाम से अच्छी तरह से जानते हैं। भोली कांग्रेस की वर्षों पुरानी सक्रिय कार्यकत्रियोें में से एक मानी जाती रही हैं। उनके बारे में प्रसिद्ध था कि किसी भी आंदोलन का जब वह नेतृत्व करती थीं तो साथी आंदोलनकारियों का जोश दुगुना हो जाता था। इसके अलावा शहर में चुनावों के दौरान पार्टी की ओर से घोषित दावेदारों को जिताने के लिए वे रात दिन एक कर देती थीं।
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लेकिन करीब दो साल पहले मंजू को पता चला कि उन्हें कैंसर है। 50 वर्षीय मंजू आज बिस्तर पर पड़ी जिंदगी की जंग लड़ रही हैं। परिवार में माता कपूर कौर, भाई सुरेंद्र सिंह और प्रीत सिंह हैं। सुरेंद्र ट्रक ड्राइवर तो प्रीत सिंह ट्रांसपोर्ट दफ्तर में काम करते हैं। सुरेंद्र ने बताया कि एक्सरे करने के बाद ब्रेस्ट कैंसर का पता चला। इसके बाद दिल्ली में आपरेशन कराया गया। तब से अब तक 15 लाख रुपए खर्च हो चुके हैं। इसके बावजूद उपचार बाकी है। बताया कि इलाज कराने के लिए पैतृक जमीन को भी बेचना पड़ा, कई लोगों से रुपए भी उधार लेने पडे़।
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15 दिनों से ट्रक भी नहीं चला पाए हैं। कहा कि 21 दिन तक कोर्स की दवा खिलानी पड़ रही है दवा का रोजाना का खर्च चार हजार है और यह दवा दिल्ली में ही मिलती है। इससे आने जाने में भी हजारों का खर्च आ रहा है। सुरेंद्र सामाजिक संगठनों व सरकार की ओर से की गई उपेक्षा से बेहद आहत हैं।