{"_id":"118-95072","slug":"Udham-singh-nagar-95072-118","type":"story","status":"publish","title_hn":"जिन्ना के प्रस्ताव का शुक्ल ने किया था विरोध","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
जिन्ना के प्रस्ताव का शुक्ल ने किया था विरोध
Udham singh nagar
Updated Fri, 05 Dec 2014 05:30 AM IST
विज्ञापन
रुद्रपुर। प्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पं. रामसुमेर शुक्ल का जन्म 28 नवंबर 1915 को यूपी के ग्राम भेंडी तहसील रुद्रपुर जिला देवरिया में पं. रामनक्षत्र शुक्ल के यहां हुआ था। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पं. शुक्ल के पिता का रंगून (म्यंमार) वर्मा में व्यवसाय था। इसके चलते उनकी प्रारंभिक शिक्षा कैंब्रिज विद्यालय रंगून में हुई। गोरखपुर स्थित सेंट एंड्रयूज कालेज में कक्षा-10 की शिक्षा ग्रहण करने के बाद वह वाराणसी चले गए। जहां से इंटरमीडिएट के बाद उन्होंने बनारस हिंदू विवि से स्नातक किया। बाद में इलाहाबाद विवि से कानून की डिग्री ली। वर्ष 1936 में लाहौर अधिवेशन में मात्र 21 वर्ष की आयु में पं. शुक्ल ने जिन्ना के द्विराष्ट्र वाद का खुले मंच से विरोध कर अपनी पहचान बनाई। महात्मा गांधी के विचारों से प्रेरित होकर वह स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय हो गए और तीन बार जेल गए। 31 दिसंबर 1943 को दिल्ली में हुए छात्र एवं युवा कांग्रेस के प्रतिनिधि सम्मेलन में उन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष निर्वाचित किया गया। उन्होंने अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन में छात्र क्रांति का राष्ट्रीय स्तर पर कुशलतापूर्वक नेतृत्व किया। स्वतंत्रता के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पं. गोविंद बल्लभ पंत ने उनको नैनीताल जिले की तराई को बसाने की जिम्मेदारी सौंपते हुए तराई कालोनाइजेशन का अध्यक्ष बनाया। किसानों के हितों के संघर्ष में उनकी सक्रियता को देखते हुए किसान कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष आचार्य पुरुषोत्तम दास टंडन ने उन्हें अपने साथ राष्ट्रीय महामंत्री तथा स्वतंत्रता संग्राम सेनानी संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष शीलभद्र याजी ने उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया। चार दिसंबर 1978 को 63 वर्ष की आयु में उनका देहांत हो गया।
विज्ञापन