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जमाने के साथ ही बदल गया होली मनाने का तरीका
Updated Wed, 28 Feb 2018 12:30 AM IST
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जसपुर। तेजी से बदलते माहौल में होली मनाने का स्वरूप ही बदल गया। एक वक्त था जब महीना भर पहले से होली के ढोल बजते थे। आधी रात तक होली के लोकगीत गाए जाते थे। उस समय होली गाने वाले लोगों की टोली हुआ करती थी।
वक्त के साथ होली के लोकगीत गाने वाले अब कम ही लोग बचे हैं। रामकिशन, गोपाल सिंह, बलराम, रामकुमार आदि बताते हैं कि पहले होली को लेकर सभी वर्गों के लोगों में उत्साह रहता था। अब महंगाई एवं रिश्तों में आई दूरियों की वजह से होली का त्योहार मनाने में वह पहली जैसी बात नहीं रही। होली के नाम सिर्फ खानापूर्ति ही की जाती है।
घरों पर नहीं बनती गुजिया
जसपुर। पहले होली से एक माह पहले घरों में महिलाएं गुजिया और पापड़ बनाना शुरू कर देती थी। लेकिन अब यह प्रथा बदल गई है। व्यस्तता के चलते नई पीढ़ी की महिलाएं बाजार से ही गुजिया, पापड़ आदि मंगा लेती हैं। जबकि, बुजुर्ग महिलाएं अब भी गुजिया, पापड़ बनाने को लालायित रहती हैं।
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वक्त के साथ होली के लोकगीत गाने वाले अब कम ही लोग बचे हैं। रामकिशन, गोपाल सिंह, बलराम, रामकुमार आदि बताते हैं कि पहले होली को लेकर सभी वर्गों के लोगों में उत्साह रहता था। अब महंगाई एवं रिश्तों में आई दूरियों की वजह से होली का त्योहार मनाने में वह पहली जैसी बात नहीं रही। होली के नाम सिर्फ खानापूर्ति ही की जाती है।
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घरों पर नहीं बनती गुजिया
जसपुर। पहले होली से एक माह पहले घरों में महिलाएं गुजिया और पापड़ बनाना शुरू कर देती थी। लेकिन अब यह प्रथा बदल गई है। व्यस्तता के चलते नई पीढ़ी की महिलाएं बाजार से ही गुजिया, पापड़ आदि मंगा लेती हैं। जबकि, बुजुर्ग महिलाएं अब भी गुजिया, पापड़ बनाने को लालायित रहती हैं।
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