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ग्रेटर हिमालय की तलहटी पर बसे हजारों गांव खतरे में

Mon, 08 Jul 2013 08:36 AM IST
राजीव पांडे
राजीव पांडे Updated Mon, 08 Jul 2013 08:36 AM IST
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thousands of village settled on greater himalaya are in danger

शिव की नगरी में मौत के तांडव से सबक लेने की जरूरत है। भूगोल की भाषा में हम आज भी मेन सेंट्रल थ्रस्ट जोन के ऊपर हैं।

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जिस जमीन के ऊपर हम हैं वह ग्रेटर हिमालय की तलहटी है। यहां अधिसंख्य भ्रंश (थ्रस्ट) सक्रिय हैं। थ्रस्टों की सक्रियता और अंधाधुंध बारिश से तलहटी पर बसे हजारों गांव खतरे में हैं।

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जवाहर लाल नेहरू सेंटर फॉर एडवांस्ड साइंटिफिक रिसर्च बंगलूरू  के मानद प्रोफेसर खड्ग सिंह वल्दिया कहते हैं कि उत्तुंग केदारनाथ, बदरीनाथ, त्रिशूल, नंदादेवी और पंचाचूली शिखरों वाले ग्रेटर हिमालय की दक्षिणी ढाल हमेशा से भारी बारिश की मार झेलती रही है, लेकिन पिछले आठ सालों में इसमें एक निरंतरता आई है।
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तीन दरारों में कटी है लघु हिमालयी अंचल की पट्टी
ग्रेटर हिमालय की दक्षिणी ढाल और उससे लगी आबाद लघु हिमालयी अंचल की पट्टी एक नहीं तीन बड़ी दरारों में कटी हुई है। ये झुकी हुई दरारें हिमालय के एक छोर से दूसरे छोर तक सैकड़ों किमी. तक फैली हुई हैं।

लगभग समांतर झुकी हुई इन तीन दरारों को संयुक्त रूप से मेन सेंट्रल थ्रस्ट जोन कहा जाता है। प्रो. वल्दिया कहते हैं कि सबसे खतरनाक बात यह है कि कोई भी दरार अकेले नहीं होती, इससे अनेक भ्रंश जुड़े होते हैं।


चिंता की बात यह है कि समांतर चल रही तीन दरारों से जुड़े अधिकांश भ्रंश सक्रिय हैं। इस कारण चट्टानें आगे-पीछे, दाएं-बाएं और ऊपर-नीचे सरक रही हैं। कमजोर चट्टानों वाली पहाड़िया अस्थिर हो चुकी हैं। घनघोर बारिश की मार पड़ते ही इन दरारों के कारण हिमालय के लोग भूस्खलन की मार झेल रहे हैं।

हमेशा बनी रहती है आपदा की आशंका
भूविज्ञानी इस विषय को कई चित्रों और आलेखों से समझा चुके हैं कि इन पट्टियों और क्षेत्रों में आपदा की हमेशा आशंका बनी रहती है और रहेगी। बावजूद इसके अवैज्ञानिक तरीके से सड़कें बनाई जा रही हैं, जबकि पहाड़ों पर बांध, सुरंग, भवन बनाने और गांव बसाने से पहले यह ध्यान रखना चाहिए कि हम आज भी सक्रिय भंशों के ऊपर बैठे हैं।

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