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उत्तराखंडः भगवान न करे भगवान के घर तक पहुंचे आग

Mon, 02 May 2016 03:36 PM IST
नवीन भट्ट/ अमर उजाला, रानीखेत (अल्मोड़ा)
नवीन भट्ट/ अमर उजाला, रानीखेत (अल्मोड़ा) Updated Mon, 02 May 2016 03:36 PM IST
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temple of uttarakhand also in danger of fire
आग - फोटो : amar ujala

जंगलों की आग से उपमंडल क्षेत्र के प्रख्यात देवालय तक सुरक्षित नहीं हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में अधिकांश मंदिर बांज, बुरांश और चीड़ से घिरे वनों के बीच स्थित हैं। लेकिन, अधिकांश मंदिरों में आग से सुरक्षा के लिए कोई भी उपाय नहीं हैं।

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मंदिर समितियां दावानल से निपटने के लिए पूरी तरह से वन विभाग पर निर्भर हैं। पांडवों की अज्ञात स्थली पांडवखोली, शक्तिपीठ मानिला देवी हो या वैष्णवी शक्तिपीठ दूनागिरी मंदिर। सभी मंदिरों में आग से बचाव के कोई भी इंतजाम नहीं हैं। हालांकि अभी तक दावानल से बड़ी दुर्घटनाएं तो नहीं हुई हैं, लेकिन जंगल की आग कभी भी मंदिरों तक पहुंच गई तो बड़ी दुर्घटना हो सकती है।
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देश के 51 शक्तिपीठों में से एक वैष्णवी शक्तिपीठ मां दूनागिरि मंदिर जंगल के बीच स्थापित है। साल भर यहां श्रद्धालुओं की चहल-पहल रहती है। लेकिन, दावानल से निपटने के लिए यहां भी पुख्ता इंतजाम नहीं हैं। मंदिर की देखरेख का जिम्मा मंदिर ट्रस्ट के पास है।
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सचिव जगदीश उपाध्याय का कहना है कि अभी तक दावानल की बड़ी दुर्घटनाएं तो नहीं हुई हैं, अलबत्ता दावानल से पूर्व ही वह लोग परिसर के चारों ओर सूखे पत्ते और कूड़े को निस्तारित कर लेते हैं। समस्या को देखते हुए ट्रस्ट के कर्मचारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश दिए जाते हैं। आग से सुरक्षा के लिए उपकरण तक नहीं हैं।

यहां देश विदेशों से ध्यान और योग के लिए पहुंचते हैं लोग

temple of uttarakhand also in danger of fire
उत्तराखंड में जंगल की आग

पांडवों की अज्ञात स्थली रही स्वर्गपुरी पांडवखोली मंदिर भी दूनागिरि के समीपवर्ती पहाड़ी पर स्थित है। चारों और बांज, बुरांश के घनघोर जंगलों से घिरा यह मंदिर रमणीक और एकांत स्थल है।

देश ही नहीं विदेशों के श्रद्धालु भी ध्यान और योग के लिए पहुंचते हैं। ग्रीष्मकाल में मंदिर के चारों तरफ का जंगल दावानल से राख हो जाता है, लेकिन दावानल की आग इस मंदिर तक नहीं पहुंच पाई है। मंदिर की देखरेख करने वाले पथ भ्रमण संघ के अध्यक्ष हरीश शाह ने बताया कि पहाड़ के 99 प्रतिशत मंदिरों में आग से सुरक्षा के लिए कोई इंतजाम नहीं हैं। मंदिर से जुड़े लोग और आसपास के ग्रामीण ही आग पर काबू पाते हैं।

शक्तिपीठ के नाम से प्रख्यात मानिला देवी मंदिर भी जौरासी रेंज के अंतर्गत है। चौतरफा जंगलों से घिरा हुआ है, लेकिन इस मंदिर में भी दावानल से बचाव के पुख्ता इंतजाम नहीं हैं। मंदिर में गतिविधियां मानिला मंदिर प्रबंधन ट्रस्ट के माध्यम से संचालित होती हैं।

अध्यक्ष नंदन सिंह पुजारी ने बताया कि मंदिर में अभी तक आग की घटनाएं नहीं हुई हैं, लेकिन भविष्य में संभावनाएं प्रबल हैं। ट्रस्ट के कर्मचारियों को ग्रीष्मकाल में अलर्ट रहना पड़ता है। नियमित रूप से जंगल की पिरूल को साफ किया जाता है। आग बुझाने के उपकरण की कोई व्यवस्था नहीं है।

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