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होलिका दहन के लिए मिलेगा दो घंटे का शुभ मुहूर्त
Updated Tue, 27 Feb 2018 11:04 PM IST
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चंबा (टिहरी)। एक मार्च को होलिका दहन के साथ ही होली का उत्सव शुरू हो जाएगा, लेकिन इस साल होलिका दहन पर भद्रा का साया रहेगा। इसलिए इस साल दो घंटे ही होलिका दहन का शुभ मुहूर्त रहेगा। ज्योतिषाचार्यों का कहना है कि भद्रा काल के बाद होलिका दहन किया जाना आनंददायक और मंगलकारी रहता है।
रंगों के त्योहार होली से एक दिन पहले होलिका दहन किया जाता है। शास्त्रों के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को होलिका दहन किया जाता है। इस साल बृहस्पतिवार एक मार्च को सुबह 9.3 मिनट से पूर्णिमा प्रारंभ हो रही है, जो कि 2 मार्च सुबह 6.26 मिनट तक रहेगी। इसी बीच एक मार्च को सुबह 9.2 से शाम 7.42 मिनट तक भद्रा का साया भी रहेगा। शास्त्रों में भद्राकाल के दौरान होलिका दहन किया जाना अशुभ माना गया है। शास्त्रों में कहा गया है कि दोपहर बाद भी यदि फाल्गुन मास की पूर्णिमा हो तो भद्रा की समाप्ति पर ही होलिका दहन किया जाना चाहिए। ऐसे में एक मार्च को रात्रि 7.42 मिनट पर भद्रा समाप्त होने के बाद होलिका दहन किया जाना शुभ रहेगा। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार रात्रि 8.9 मिनट तक होलिका दहन का सामान्य काल रहेगा, जबकि इसके बाद रात 9.10 मिनट तक अमृतकाल में किया गया। होलिका दहन अधिक पुण्यकारी है। ऐसे में ज्योतिषाचार्य रात्रि 9.10 मिनट के बीच होलिका दहन करने को अधिक शुभ और मंगलकारी बता रहे हैं।
कोट
शास्त्रों में भद्रा के दौरान होलिका दहन किए जाने को अशुभ माना गया है। ऐसे में भद्रा के बाद होलिका दहन किया जाना चाहिए। इस साल रात्रि 9.10 मिनट के बीच अमृतकाल में किया गया होलिका दहन मंगलकारी और आनंददायक रहेगा।
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-जगदीश प्रसाद भट्ट, ज्योतिषाचार्य।
क्या होती है भद्रा
भद्रा भगवान सूर्य देव की पुत्री और शनि की बहन है। शनि की तरह ही इसका स्वभाव कड़क बताया गया है। उनके स्वभाव को नियंत्रित करने के लिए भगवान ब्रह्मा ने उन्हें कालगणना या पंचांग के प्रमुख अंग विष्टी करण में स्थान दिया है। भद्रा की स्थिति में शुभ कार्यों का निषेध माना गया है।
होलिका दहन क्यों किया जाता है?
भगवान सर्वव्यापक है, यह बोध कराने के लिए होली मनाई जाती है। वहीं होलिका दहन के माध्यम से भगवान यह बताते हैं कि जो उनकी शरण में आ जाता है, उसकी हमेशा रक्षा की जाती है। जिस प्रकार से प्रह्लाद को लेकर होलिका अग्नि पर जलाने के उद्देश्य से बैठी थी, मगर भगवान ने अपने भक्त प्रह्लाद को बचा दिया था। होलिका दहन बुराइयों के अंत एवं अच्छाइयों की विजय के पर्व के रूप में भी मनाया जाता है। काम, क्रोध, मद, मोह एवं लोभ रूपी राक्षस होलिका के रूप में हमारे अंदर विद्यमान हैं। होलिका दहन यह संदेश देता है कि मानव को इन दोषों का त्याग करना चाहिए।
रंगों के त्योहार होली से एक दिन पहले होलिका दहन किया जाता है। शास्त्रों के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को होलिका दहन किया जाता है। इस साल बृहस्पतिवार एक मार्च को सुबह 9.3 मिनट से पूर्णिमा प्रारंभ हो रही है, जो कि 2 मार्च सुबह 6.26 मिनट तक रहेगी। इसी बीच एक मार्च को सुबह 9.2 से शाम 7.42 मिनट तक भद्रा का साया भी रहेगा। शास्त्रों में भद्राकाल के दौरान होलिका दहन किया जाना अशुभ माना गया है। शास्त्रों में कहा गया है कि दोपहर बाद भी यदि फाल्गुन मास की पूर्णिमा हो तो भद्रा की समाप्ति पर ही होलिका दहन किया जाना चाहिए। ऐसे में एक मार्च को रात्रि 7.42 मिनट पर भद्रा समाप्त होने के बाद होलिका दहन किया जाना शुभ रहेगा। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार रात्रि 8.9 मिनट तक होलिका दहन का सामान्य काल रहेगा, जबकि इसके बाद रात 9.10 मिनट तक अमृतकाल में किया गया। होलिका दहन अधिक पुण्यकारी है। ऐसे में ज्योतिषाचार्य रात्रि 9.10 मिनट के बीच होलिका दहन करने को अधिक शुभ और मंगलकारी बता रहे हैं।
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शास्त्रों में भद्रा के दौरान होलिका दहन किए जाने को अशुभ माना गया है। ऐसे में भद्रा के बाद होलिका दहन किया जाना चाहिए। इस साल रात्रि 9.10 मिनट के बीच अमृतकाल में किया गया होलिका दहन मंगलकारी और आनंददायक रहेगा।
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-जगदीश प्रसाद भट्ट, ज्योतिषाचार्य।
क्या होती है भद्रा
भद्रा भगवान सूर्य देव की पुत्री और शनि की बहन है। शनि की तरह ही इसका स्वभाव कड़क बताया गया है। उनके स्वभाव को नियंत्रित करने के लिए भगवान ब्रह्मा ने उन्हें कालगणना या पंचांग के प्रमुख अंग विष्टी करण में स्थान दिया है। भद्रा की स्थिति में शुभ कार्यों का निषेध माना गया है।
होलिका दहन क्यों किया जाता है?
भगवान सर्वव्यापक है, यह बोध कराने के लिए होली मनाई जाती है। वहीं होलिका दहन के माध्यम से भगवान यह बताते हैं कि जो उनकी शरण में आ जाता है, उसकी हमेशा रक्षा की जाती है। जिस प्रकार से प्रह्लाद को लेकर होलिका अग्नि पर जलाने के उद्देश्य से बैठी थी, मगर भगवान ने अपने भक्त प्रह्लाद को बचा दिया था। होलिका दहन बुराइयों के अंत एवं अच्छाइयों की विजय के पर्व के रूप में भी मनाया जाता है। काम, क्रोध, मद, मोह एवं लोभ रूपी राक्षस होलिका के रूप में हमारे अंदर विद्यमान हैं। होलिका दहन यह संदेश देता है कि मानव को इन दोषों का त्याग करना चाहिए।