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उम्मीद की मशाल: शिक्षकों ने बदला स्कूलों का स्वरूप

Tue, 26 Apr 2016 12:21 PM IST
बिशन सिंह बोरा / अमर उजाला, देहरादून
बिशन सिंह बोरा / अमर उजाला, देहरादून Updated Tue, 26 Apr 2016 12:21 PM IST
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teacher change government school condition
टीचर - फोटो : amar ujala

उत्तराखंड के सरकारी स्कूलों में दयनीय होती शिक्षा की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। विभागीय लापरवाही और संसाधनों के अभाव के कारण लगातार सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर गिर रहा है।

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इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कई विद्यालय छात्र संख्या शून्य होने के कारण बंद हो चुके हैं तो 1800 से अधिक स्कूल बंद होने की कगार पर हैं। इसके लिए लोग शिक्षकों को भी जिम्मेदार ठहराते हैं। कहीं न कहीं लोगों के ये आरोप सच्चाई भी लगते हैं, क्योंकि शिक्षक शिक्षा सत्र का ज्यादातर वक्त तबादला, मांगों, संघ आदि की राजनीति में गुजार देते हैं। 
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बात उनके मन मुताबिक न बैठी तो स्कूल बंद कर हड़ताल में जाने से भी गुरेज नहीं करते। इससे उलट प्रदेश में अभी भी कई शिक्षक ऐसे हैं जो शिक्षा की अलख जगाए रखने के लिए हर मुमकिन प्रयास करते हैं।
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आज अमर उजाला आपको ऐसे ही दो शिक्षकों से रू-ब-रू कराने जा रहा है, जो शिक्षा की अलख जगाए रखने के लिए हर मुमकिन कोशिश कर रहे हैं। इनके  प्रयास का स्तर छोटा भले ही हो लेकिन, इसके दूरगामी परिणाम काफी समृद्ध और विशाल होंगे।

शिक्षिका पुष्पा ने की अनूठी पहल
राजकीय प्राथमिक विद्यालय जगतपुर डालावाला ब्लॉक सहसपुर की प्रधानाध्यापिका पुष्पा रानी ने बच्चों के लिए अपने खर्च पर आई कार्ड, स्कूल बेल्ट, टाई आदि उपलब्ध कराकर स्कूलों की स्थिति में सुधार की अनूठी पहल की है। बकौल पुष्पा रानी अभिभावक पब्लिक स्कूलों की चमक-धमक देखकर भी उनकी तरफ ज्यादा आकर्षित हो रहे हैं।

ऐसे में सरकारी स्कूलों में छात्र संख्या बढ़ाने के लिए शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के साथ ही वेशभूषा आदि पर भी ध्यान देना होगा। बता दें कि सरकारी स्कूलों में ड्रेस के लिए मिलने वाली धनराशि भी इतनी कम है रहती है कि कई बार शिक्षकों को इसके लिए अपनी जेब से व्यवस्था करनी पड़ती है।

बच्चों को टाई, बेल्ट व आई कार्ड उपलब्ध कराया गया है, इससे हमारे बच्चे भी पब्लिक स्कूलों के बच्चों की तरह नजर आएंगे। साथ ही स्कूल से बाहर उनकी भी अलग पहचान हो सकेगी।
- पुष्पा रानी, शिक्षिका

200 साल पुराने स्कूल को रखा जिंदा
देहरादून के सबसे पुराने विद्यालयों में से एक राजकीय पूर्व माध्यमिक विद्यालय देहरा भी कभी बंदी की कगार पर था। वर्ष 2008 में इस स्कूल में छात्रों की संख्या मात्र 16 रह गई थी, लेकिन शिक्षक हुकुम सिंह ने बगैर किसी सरकारी मदद के स्कूल को आवासीय स्कूल में बदलकर इसे बंद होने से बचाया और अन्य शिक्षकों के सामने एक नजीर पेश की।

यह स्कूल सन 1816 में तहसीली मिडिल स्कूल के नाम से पलटन बाजार में स्थापित हुआ, जहां वर्तमान में कोतवाली है। वर्ष 1953 से स्कूल अब राजपुर रोड में चल रहा है। 2008 में एक बार स्कूल बंदी की कगार पर आ गया था, तब हुकुम सिंह ने इस स्कूल को जीवित रखने का फैसला लिया। उन्होंने अपने खर्च से इसे आवासीय स्कूल में बदलकर एक बार फिर इसमें जान फूंक दी। अब इसमें 225 छात्र अध्ययनरत हैं।


मेरे पिता सेना में थे, वे अक्सर सेना के बारे में बताया करते थे, मुझे बच्चों के लिए कुछ करने की उन्हीं से प्रेरणा मिली, विभागीय अधिकारियों का भी सहयोग मिला। वर्षों पुराने इस स्कूल को संचालित रखने और इसके विकास के लिए सभी को आगे आना चाहिए।
- हुकुम सिंह उनियाल, प्रधानाध्यापक

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