झोलाछाप डॉक्टर ने कूल्हे का किया कबाड़ा...

विज्ञापन
देहरादून/ब्यूरो Published by: Updated Thu, 11 Jul 2013 04:57 PM IST
Seek treatment from a doctor without knowledge is dangerous

पढ़ें अमर उजाला ई-पेपर
कहीं भी, कभी भी।

ख़बर सुनें
जरा संभलिए..अपने शरीर को किसी भी डॉक्टर के पास सौंपने से पहले जरा जांच तो कीजिए कि जिसे आप डॉक्टर समझ बेहोश हो बेड पर लेट गए वह डॉक्टर है भी या नहीं।
विज्ञापन


जी हां ऐसे ही किसी भी नर्सिंग होम में अपने स्वास्थ्य की मंगल कामना करना आप पर भारी पड़ सकता है और शायद मंगल कामना के चक्कर में आपकों अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा भी गंवाना पड़े। एक व्यक्ति को अपनी लापरवाही का खामियाजा अपने कूल्हे में निकले फोडे के
तौर पर भुगतना पड़ रहा है, जिसे ठीक करने के लिए अब सर्जरी होगी।

उत्तराखंड के सुदूर पहाड़ी अंचलों में ही नहीं राजधानी देहरादून में भी झोलाछाप डाक्टरों की भरमार है। देहरादून में पैसा बचाने के लिए कई नर्सिंगहोम अप्रशिक्षित स्टाफ रखे हैं। मरीजों का कहना है कि इन नर्सिंगहोमों में रात की व्यवस्था ऐसा ही स्टाफ संभालता है। मुख्य चिकित्साधिकारी डा. एएस सेंगर भी नर्सिंगहोमों में अप्रशिक्षित स्टाफ की बात मानते हैं।

और खराब हो गए पिस्टुला
उनका कहना है कि क्लीनिकल इस्टेब्लिशमेंट एक्ट लागू होने के बाद नर्सिंगहोमों में अप्रशिक्षित स्टाफ रखने की समस्या खत्म हो जाएगी। गुर्दा रोगी प्रीति त्यागी ने बताया कि डायलिसिस यूनिट के अप्रशिक्षित टेक्नीशियन के चक्कर में उनके तीन फिस्टुला खराब हो चुके हैं।

एक फिस्टुला बनवाने में 20-25 हजार रुपये खर्च आता है। इसे बनवाने दिल्ली जाना पड़ता है। प्रीति वेटेनरी विभाग की सेवानिवृत्त अतिरिक्त निदेशक डा. डीएन त्यागी की पत्नी हैं। उनका कहना है कि एक गुर्दा रोगी के अधिकतम चार फिस्टुला बन सकते हैं।

लगाया इंजेक्शन निकला फोड़ा
बताया कि मेरा तीन फिस्टुला खराब हो चुके हैं चौथा खराब हुआ तो डायलिसिस नहीं हो पाएगी। दून अस्पताल की इमरजेंसी में बुधवार को आए रोगी राजेश कुमार ने बताया कि उसे टायफाइड हुआ था। रायपुर रोड स्थित एक नर्सिंगहोम में भरती था। उसके दोनों कूल्हों पर चार इंजेक्शन लगे थे। चारों पक कर फोड़ा हो गए। एक का जख्म नासूर बन गया है।

डॉक्टर ने राजेश को सर्जरी की सलाह दी है। इसी तरह कोरोनेशन की ओपीडी में आईं विमला रावत के हाथ में गलत ‘प्रिक’ होने से सड़न पैदा हो गई है। ऐसे ही कई लोग हैं जिन्होंने सरकारी अस्पताल की लाइन में लगने के बजाय अपना शरीर निजी क्लीनिकों को सौंपना ज्यादा उचित समझा ओर आज वह इसी का खमियाजा भुगतने को विवश हैं।

आपकी राय हमारे लिए महत्वपूर्ण है। खबरों को बेहतर बनाने में हमारी मदद करें।

खबर में दी गई जानकारी और सूचना से आप संतुष्ट हैं?
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

Spotlight

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
Election
  • Downloads

Follow Us

X

प्रिय पाठक

कृपया अमर उजाला प्लस के अनुभव को बेहतर बनाने में हमारी मदद करें।
डेली पॉडकास्ट सुनने के लिए सब्सक्राइब करें

क्लिप सुनें

00:00
00:00
X