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उत्तराखंडः बचाव, पुनर्वास को एकजुट हुए वैज्ञानिक

Sun, 28 Jul 2013 08:43 PM IST
देहरादून/आफताब अजमत
देहरादून/आफताब अजमत Updated Sun, 28 Jul 2013 08:43 PM IST
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scientist unite for rescue and rehabilitation in uttarakhand

आपदा से बचाव और पुनर्वास का खाका तैयार करने के लिए देशभर के वैज्ञानिक एक मंच पर आ गए हैं। विज्ञान एंव प्रौद्योगिकी विभाग की ओर से वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी में आयोजित कार्यशाला में भविष्य की रणनीति तय की गई।

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वैज्ञानिक मिलकर विस्तृत रिपोर्ट तैयार करेंगे
अब सभी वैज्ञानिक मिलकर विस्तृत रिपोर्ट तैयार करेंगे। भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी सचिव टी रामास्वामी ने कहा कि आपदा के बाद पुनर्वास और भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए कागजी शोध के बजाए इसे जमीनी तौर पर लागू करने पर ध्यान देना होगा।
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आपदा की मैपिंग के बाद इसके असर, कारणों और इससे निपटने का पूरा खाका तैयार कर उसे अमल में लाने पर ध्यान देने की जरूरत है। इसके बाद देशभर के विभिन्न संस्थानों से आए वैज्ञानिकों ने आपदा के कारण और निवारण पर चर्चा की।
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लखनऊ विवि के सेंटर ऑफ एडवांस स्टडी इन जियोलॉजी के डा. रामेश्वर बाली ने कहा कि बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री, हेमकुंड साहिब, अमरनाथ यात्रा ऐसे धार्मिक आयोजन हैं, जो या तो ग्लेशियर के बीच हो रहे हैं या इन यात्रा रूटों पर ग्लेशियर पड़ते हैं।

साइंटिफिक इको ट्रैक तैयार किए जाएं
इन स्थानों पर श्रद्धालुओं की संख्या में भारी बढ़ोत्तरी का बुरा असर सामने आने लगा है। जरूरी है कि वैज्ञानिक सलाह लेकर साइंटिफिक इको ट्रैक तैयार किए जाएं, जिससे ग्लेशियर की नाजुकता बरकरार रह सके।

गढ़वाल विवि से आए प्रो. वाईपी सुंद्रियाल ने विभिन्न वैज्ञानिकों के साथ तैयार की गई अपनी रिपोर्ट पेश की। उन्होंने बताया कि एक प्रभावी योजना बनाकर सुरक्षित स्थानों पर पुनर्वास से ही सुरक्षा संभव है।

वाडिया इंस्टीट्यूट के निदेशक डा. अनिल कुमार गुप्ता ने बताया कि दिनभर चली कार्यशाला के बाद यह निर्णय हुआ है कि सभी वैज्ञानिक, शिक्षण और शोध संस्थान साथ मिलकर छह माह में एक रिपोर्ट तैयार करेंगे। इस रिपोर्ट को प्रदेश और केंद्र सरकार को सौंपा जाएगा।

इस मौके पर पूर्व विदेश सचिव श्याम सरन, एनडीएमए कंसलटेंट डा. एके पचौरी, आईआईटीआर रुड़की के प्रो. डीसी श्रीवास्तव और प्रो. अरुण सराफ, कुमाऊं विवि के प्रो. पीडी पंत, प्रो. प्रदीप गोस्वामी, प्रो. जेएस रावत, गढ़वाल विवि के कुलपति प्रो. एसके सिंह, प्रो. एचसी नैनवाल, आईटीबीपी के डीआईजी अमित प्रसाद, हेस्को के डा. अनिल जोशी, पर्यावरणविद् चंडीप्रसाद भट्ट, डा. चंदन घोष, डा. पीएस नेगी, डा. एसके पारछा आदि मौजूद रहे।

राज्य सरकार पर नाराजगी
कार्यशाला में राज्य सरकार के प्रति भी नाराजगी सामने आई। जीएसआई के उप निदेशक डा. वधावन ने कहा कि जरूरी यह है कि अब राज्य सरकार उनकी हर चेतावनी और रिपोर्ट को गंभीरतापूर्वक ले। कई और वैज्ञानिकों ने अपने शोध कार्यों के प्रति सरकार की उदासीनता पर दुख जताया।

जीएसआई दिखाएगा बचाव की राह
जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया(जीएसआई) के डायरेक्टर जनरल डा. ए सुंदरमूर्ति और उप निदेशक डा. एसके वधावन ने बताया कि प्रदेश के पुनर्वास और भविष्य को देखते हुए उन्होंने मुख्य सचिव से वार्ता की। शासन की ओर से 22 ऐसे स्थानों को बताया गया है, जिनका तुरंत पुनर्वास होना है।

इसलिए जीएसआई अपने दून स्थित सेटेलाइट केंद्र को और विस्तारित कर जल्द से जल्द प्रदेश के उन ट्रैक की पहचान करेगा, जहां आपदा आने पर जान बचाई जा सकती है। इसके अलावा वह लोकेशन भी पहचानने का प्रयास किया जा रहा है, जहां जल्द से जल्द प्रभावितों का पुनर्वास किया जा सके।


डा. ललित पांडे ने विज्ञानियों को दिखाया आइना
आपदा पर मंथन को लेकर वैज्ञानिकों की सोच और उनके शोध कार्यों के प्रेजेंटेशन के बीच पद्मश्री डा. ललित पांडे ने सभी वैज्ञानिकों को आइना भी दिखाया। उन्होंने साफ किया कि यहां फैंसी ग्राफ के साथ लेक्चर देने से क्या कुछ होगा।

क्या वैज्ञानिक इस आपदा को लेकर सच में गंभीर हैं। डा. पांडे ने कहा कि जिस सड़क को वैज्ञानिक बनाने के लिए हरी झंडी दिखाते हैं, बरसात में वही नदी में समां जाती है। ऐसे में हमारे लंबे-लंबे लेक्चर देने से क्या फायदा।


हमें वैज्ञानिक भाषा और शोध को सरकारों तक ऐसे पहुंचाना होगा ताकि वह उस पर आसानी से अमल कर सकें। मसलन, अगर किसी नदी किनारे हम मजबूत फाउंडेशन की जरूरत बताते हैं तो हमें यह भी बताना होगा कि मजबूती की परिभाषा क्या है।

डा. पांडे के विचारों ने एक ओर जहां वैज्ञानिकों के चेहरे पर हंसी लाने का काम किया तो उनकी व्यंग्यपूर्ण भाषा ने माहौल गंभीर भी किया।

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