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आर्थिकी से नहीं जुड़ रहा राज्य पुष्प
ब्यूरो/ अमर उजाला, रुद्रप्रयाग
Updated Sat, 19 Mar 2016 08:37 PM IST
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खेतीबाड़ी और औद्यानिकी को आर्थिकी का जरिया बनाने के लिए तमाम दावों के बावजूद राज्य पुष्प बुरांश लोगों की आर्थिकी से नहीं जुड़ पाया है। जबकि प्रदेश में बुरांश 25 फीसदी से अधिक मौजूदगी है।
बुरांश के पेड़ की छाल के उपयोग से पेट के रोगों से निजात मिलती है। वहीं फूलों के रस का सेवन करने से हृदय रोग दूर होते हैं। लकड़ी से कृषि यंत्र बनाए जाते हैं। घरों में इसका उपयोग ईधन के रूप में होता है। बुरांश चारे का भी बेहतर विकल्प है। यही नहीं, बुरांश का लोक संस्कृति में रचा-बसा है। लोकगीतों और देव भजनों में उल्लेख मिलता है। यह भगवान शिव का प्रिय पुष्प भी माना जाता है।
पहाड़ में बुरांश का उपयोग कृषि यंत्र और ईंधन तक सीमिति है। वसंत ऋतु में खिलने वाला बुरांश का सिर्फ 8 से 10 प्रतिशत फूल का उपयोग जूस या स्क्वैश बनाने में होता है, जिसका सीमित बाजार है। अधिकांश पुष्प झड़कर नष्ट हो जाता है। जिले में इक्का-दुक्का स्थानों पर ही कुछ स्वयं सहायता समूह बुरांश का जूस बनाने का काम कर रहे हैं।
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बुरांश की विश्व में 850 प्रजातियां
मध्य हिमालय क्षेत्र के 1500 मीटर से 3600 मीटर की ऊंचाई पर पाया जाता है। विश्व में इसकी 850 प्रजातियां हैं। इसमें 65 से अधिक मध्य हिमालयी क्षेत्र में पाई जाती हैं। रोडेन्ड्रेन ऑरबेरियम प्रजाति सबसे अधिक पाई जाती है। जिले मे मद्महेश्वर, तुंगनाथ, चोपता, देवरियाताल, मोहनखाल, घिमतोली और जखोली में बुरांश सबसे अधिक है। यहां बुरांश लाल, गुलाबी और सफेद रंग के रूप में मिलता है।
अस्तित्व पर मंडरा रहा खतरा
राज्य वृक्ष बुरांश के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है। पहाड़ में जंगलों के कटान से बुरांश भी अछूता नहीं है। पुराने जंगल सिमटने और नए पौधों के न उगने से बुरांश सिमटने लगा है। बावजूद ठोस प्रयास नहीं हो रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि बुरांश के बीजों को एकत्रित कर पौधों को नर्सरी में तैयार कर इसे संरक्षित किया जाना चाहिए।
बुंराश प्रकृति के यौवन को निखारने के साथ ही यह मानव जीवन के लिए बहुपयोगी है।चौड़ी पत्ती का यह वृक्ष, पर्यावरण संरक्षण में भी अहम भूमिका निभाता है। बावजूद इसे बचाने के लिए सरकारी स्तर पर कोई प्रयास नहीं हो रहे हैं।- जगत सिंह जंगली, पर्यावरणविद्, रुद्रप्रयाग
बुरांश के पेड़ की छाल के उपयोग से पेट के रोगों से निजात मिलती है। वहीं फूलों के रस का सेवन करने से हृदय रोग दूर होते हैं। लकड़ी से कृषि यंत्र बनाए जाते हैं। घरों में इसका उपयोग ईधन के रूप में होता है। बुरांश चारे का भी बेहतर विकल्प है। यही नहीं, बुरांश का लोक संस्कृति में रचा-बसा है। लोकगीतों और देव भजनों में उल्लेख मिलता है। यह भगवान शिव का प्रिय पुष्प भी माना जाता है।
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पहाड़ में बुरांश का उपयोग कृषि यंत्र और ईंधन तक सीमिति है। वसंत ऋतु में खिलने वाला बुरांश का सिर्फ 8 से 10 प्रतिशत फूल का उपयोग जूस या स्क्वैश बनाने में होता है, जिसका सीमित बाजार है। अधिकांश पुष्प झड़कर नष्ट हो जाता है। जिले में इक्का-दुक्का स्थानों पर ही कुछ स्वयं सहायता समूह बुरांश का जूस बनाने का काम कर रहे हैं।
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बुरांश की विश्व में 850 प्रजातियां
मध्य हिमालय क्षेत्र के 1500 मीटर से 3600 मीटर की ऊंचाई पर पाया जाता है। विश्व में इसकी 850 प्रजातियां हैं। इसमें 65 से अधिक मध्य हिमालयी क्षेत्र में पाई जाती हैं। रोडेन्ड्रेन ऑरबेरियम प्रजाति सबसे अधिक पाई जाती है। जिले मे मद्महेश्वर, तुंगनाथ, चोपता, देवरियाताल, मोहनखाल, घिमतोली और जखोली में बुरांश सबसे अधिक है। यहां बुरांश लाल, गुलाबी और सफेद रंग के रूप में मिलता है।
अस्तित्व पर मंडरा रहा खतरा
राज्य वृक्ष बुरांश के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है। पहाड़ में जंगलों के कटान से बुरांश भी अछूता नहीं है। पुराने जंगल सिमटने और नए पौधों के न उगने से बुरांश सिमटने लगा है। बावजूद ठोस प्रयास नहीं हो रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि बुरांश के बीजों को एकत्रित कर पौधों को नर्सरी में तैयार कर इसे संरक्षित किया जाना चाहिए।
बुंराश प्रकृति के यौवन को निखारने के साथ ही यह मानव जीवन के लिए बहुपयोगी है।चौड़ी पत्ती का यह वृक्ष, पर्यावरण संरक्षण में भी अहम भूमिका निभाता है। बावजूद इसे बचाने के लिए सरकारी स्तर पर कोई प्रयास नहीं हो रहे हैं।- जगत सिंह जंगली, पर्यावरणविद्, रुद्रप्रयाग