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विवादित भूमि पर रामलीला कमेटी का कब्जा बरकरार

Haldwani Bureau हल्द्वानी ब्यूरो
Updated Mon, 18 Nov 2019 11:45 PM IST
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Ramlila committee continues to occupy disputed land
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गूलरभोज। अपर जिला जज प्रथम ने दस साल चली सुनवाई के बाद वादी (उत्तरदाता) की ओर से विवादित भूमि का कोई साक्ष्य अभिलेख प्रस्तुत नहीं कर पाने के कारण अपना फैसला रामलीला कमेटी के पक्ष में सुनाया है। कोर्ट ने निचली अदालत के निर्णयादेश एवं डिक्री को अपास्त कर दिया है।
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बता दें कि गूलरभोज का बहुचर्चित जमीनी विवाद तराई कला संगम रामलीला कमेटी एवं शंभू प्रसाद जोशी, जिज्ञासा शिक्षा एवं जनसेवा समिति में पिछले 19 वर्षों से न्यायालय में लंबित था। इस पर आठ नवंबर को अपर जिला जज ने वादी (उत्तरदाता) की ओर से विवादित भूखंड पर अपना कोई स्वामित्व व साक्ष्य प्रस्तुत न करने पर अपना फैसला सुनाया।
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शंभू प्रसाद जोशी ने जमीन के एक भूखंड पर उसकी हद बंदी को लगाए खूंटे और हदबंदी को नष्ट करने का आरोप लगाकर रामलीला कमेटी के खिलाफ वर्ष 2000 में प्रथम अपर सिविल जज में दिवानी वाद संख्या 32 दायर की थी। नौ साल चली सुनवाई के बाद कोर्ट ने 27 अप्रैल 2009 को रामलीला मैदान के पूर्वी भाग में बनाए मंच को तोड़ने के आदेशात्मक निषेधाज्ञा एवं स्थायी निषेधाज्ञा लागू करने के आदेश कर दिए थे।
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इस पर रामलीला कमेटी ने 2009 को ही जिला जजी में अपील दायर कर दी। अपील की सुनवाई प्रथम अपर जिला जज की अदालत में लगातार दस साल चली। अपीलकर्ता (रामलीला कमेटी) के वरिष्ठ अधिवक्ता वीरेंद्र गोस्वामी ने लंबी बहस के बाद साबित कर दिया कि वादी (उत्तरदाता) के पास विवादित भूखंड का कोई अभिलेख नहीं है और न ही वह कोई अपना कब्जा साबित कर सका है।

अदालत ने वादी (उत्तरदाता) की ओर से अपना स्वामित्व नौ हजार वर्ग फुट में कब्जा, स्कूल का संचालन 1978 से करना और भूखंड का खसरा नंबर 779 बताना आदि कहा गया। सुनवाई के दौरान उक्त दावों के प्रति वह कोई भी अभिलेख और साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका है। इसके बाद प्रथम अपर जिला जज ने आठ नवंबर को अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि निचली अदालत के निर्णयादेश व डिक्री दिनांक 27 अप्रैल 2009 को अपास्त किया जाता है।
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