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पहाड़ में चीड़ के प्रकोप को रोकेगा बांज
ब्यूरो/अमर उजाला, रुद्रप्रयाग
Updated Thu, 07 Jul 2016 10:31 PM IST
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वन विभाग की मुहिम लाई रंग, रुद्रप्रयाग के कोदिमा गांव में चीड़ के जंगल में विकसित हो रहे बांज के पेड़।
- फोटो : Amar Ujala
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पहाड़ी क्षेत्रों के लिए जी का जंजाल बन चुके चीड़ के प्रकोप को अब बांज रोकेगा। पांच वर्ष पहले शुरू की गई वन विभाग के रुद्रप्रयाग रेंज की मुहिम रंग लाने लगी है। कोदिमा गांव में चीड़ वन क्षेत्र में 10 हेक्टेयर भूमि पर रोपे गए 11 हजार बांज के पौधे पेड़ के रूप में विकसित होकर लहलहाने लगे हैं।
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पहाड़ में वनाग्नि और अन्य प्राकृतिक घटनाओं का कारण बन रहे चीड़ को रुद्रप्रयाग क्षेत्र में सीमित रखने के लिए वन विभाग द्वारा पांच वर्ष पहले योजना बनाई गई थी। योजना के तहत चीड़ वन क्षेत्र में बांज के पौधों का रोपण होना था।
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प्रयोग के तौर पर अगस्त्यमुनि ब्लक के कोदिमा गांव का चयन कर वहां चीड़ के जंगल में 10 हेक्टेयर भूमि पर ग्रामीणों की मदद से 11 हजार बांज के पौधे रोपे गए थे। पांच वर्ष तक वन विभाग के कर्मचारी इस क्षेत्र की निगरानी करते रहे। अब इसके सुखद परिणाम सामने आए हैं। यहां चीड़ के विशालकाय पेड़ों के बीच बांज के पेड़ नजर आ रहे हैं। दो फीट से पांच फीट ऊंचाई के बांज के पेड़ों के चारों तरफ हरी घास भी उगी है।
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ग्रामीणों का कहना है कि गांव के ऊपर जंगल में विकसित हो रहे बांज के पेड़ों से जहां वन क्षेत्र में आर्द्रता बढ़ी है, वहीं अच्छी घास भी उग रही है। पिछले दो वर्षों से यहां बरसात में भू-कटाव में भी कमी आई है, साथ ही जल संरक्षण में भी मदद मिल रही है।
खंती विधि से हो रहा जल संरक्षण
वन विभाग द्वारा जिले में अलग-अलग स्थानों पर ग्रामीणों की मदद से बारिश के जल को संग्रहीत करने के लिए गड्ढे (खंतियां) बनाई गई है। इन खंतियों में बरसात का पानी जमा हो रहा है।
ढलान वाले खाली पड़े स्थानों पर बने इन गड्ढों में पानी खूब जमा होने से आसपास वाले क्षेत्र में जहां नमी बढ़ रही है, वहीं हरी घास भी उग रही है, जिससे बरसात में भूधंसाव भी थम रहा है। गड्ढों में जमा पानी से जल संरक्षण के साथ जंगली जानवरों को भी पीने के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध हो रहा है।
कोदिमा गांव में चीड़ वाले क्षेत्र में बांज के जो पौधे रोपे गए थे, वह अब पेड़ बन रहे हैं। ग्रामीणों की मदद और विभागीय कर्मचारियों की मेहनत का परिणाम है कि यह मुहिम सफल हुई है। अन्य क्षेत्रों में भी इसे अपनाया जाएगा।
-- ललित मोहन सिंह नेगी, रेंजर, रुद्रप्रयाग रेंज