अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 2020: मजदूर दंपती की बेटी संघर्ष कर बनी जीजीआईसी की प्रधानाचार्य
एक मजदूर दंपती की बेटी, जिसका बचपन रेता-बजरी और ईंटों के साथ हुए खेलते हुए बीता। घर का खर्च चलाने के लिए जिसने कपड़े सिले, सामाजिक कुप्रथा पर्दा प्रथा को चुनौती देते हुए उच्च शिक्षा प्राप्त की और आखिर में वह जीजीआईसी की प्रधानाचार्य बनी। संघर्ष की यह जीवंत मिसाल फाजलपुर महरौला जीजीआईसी रुद्रपुर की प्रधानाचार्य पार्वती देवी की है।
पार्वती देवी जब रुद्रपुर जीजीआईसी की प्रधानाचार्य बनी थीं, तब कॉलेज में छात्राओं की संख्या करीब ढाई सौ थी। आज छात्रा संख्या 900 से अधिक हो चुकी है। छात्राओं की कमी की प्रमुख वजह कॉलेज में चहारदीवारी न होना, कक्षों की कमी और अन्य कई सुविधाओं का अभाव था।
पार्वती देवी कहती हैं कि उन्होंने व्यक्तिगत प्रयास कर सीएसआर और उच्च अधिकारियों से लगातार कॉलेज के लिए सुविधाओं की मांग की। नया शिक्षा सत्र शुरू होने पर वह बालिकाओं के परिजनों से मिलकर बेटियों को पढ़ाने के लिए प्रेरित करती हैं।
पार्वती कहती हैं कि संघर्ष का यह जज्बा उन्हें अपने जीवन के संघर्षों और तल्ख अनुभवों से मिला है। वह बताती हैं कि उनका जन्म अल्हा-उदल की जन्मस्थली महोबा जिले (यूपी) के कुल पहाड़ गांव में हुआ था। माता-पिता मजदूरी करते थे।
घर पर कोई मौजूद न होने के कारण माता-पिता उनको अपने साथ ही ले जाते थे। जब माता-पिता मजदूरी कर रहे होते थे, तब वह रेत, बजरी और ईंटों के बीच बैठी रहती थीं। गरीबी के कारण 10वीं कक्षा उत्तीर्ण करते ही उनका बांदा जिले (यूपी) में विवाह हो गया था।
उस समय समाज में महिलाओं के लिए पर्दा प्रथा बहुत प्रचलित थी। बेटियों के लिए उच्च शिक्षा प्राप्त करना चुनौती था लेकिन माता-पिता, पति और सास-ससुर का सहयोग मिलने से उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने विवाह के बाद महोबा से इंटरमीडिएट, बांदा जिले से बीए, एमए, बीएड और बीटीसी किया। घर का खर्च चलाने के लिए कपड़े भी सिले।
लंबे संघर्ष के बाद वर्ष 1991 उनकी प्रवक्ता के पद तैनाती हुई। उनकी पहली पहली तैनाती जीजीआईसी गंगोलीहाट (पिथौरागढ़) में हुई। वहां वह 15 वर्ष तैनात रहीं। उसके बाद उच्चर कन्या प्राथमिक विद्यालय बागेश्वर में प्रधानाध्यापक बनीं। इसके बाद वह रुद्रपुर जीजीआईसी की प्रधानाचार्य बनीं।