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पैदावार में कमी का मुख्य कारण जलवायु परिवर्तन
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पंतनगर में हुए प्रशिक्षण कार्यक्रम को संबोधित करते अधिष्ठाता कृषि डॉ. जे. कुमार
- फोटो : RUDRAPUR
पंतनगर। भारत में 60 प्रतिशत वर्षा आधारित खेती मानसून, प्राकृतिक संसाधनों के संकुचन और गिरावट से प्रभावित है। अधिकांश फसलों में बहुपोषक तत्वों की कमी, खराब उत्पादकता और जलवायु परिवर्तन पैदावार में कमी के मुख्य कारण हैं। यह बात अधिष्ठाता कृषि डॉ. जे. कुमार ने ‘फसलों और फसल प्रणालियों की कारक उत्पादकता बढ़ाने के लिए सुरक्षित और स्थायी कृषि’ विषय पर 21 दिवसीय प्रशिक्षण का शुभारंभ के अवसर पर कही।
विवि स्थित कृषि महाविद्यालय के डॉ. केसी शर्मा सभागार में डॉ. जे. कुमार ने कहा कि कृषि विकास आने वाले समय में विभिन्न चुनौतियों, जैसे घटती हुई कृषि योग्य भूमि, जल संसाधनों की कमी, जलवायु परिवर्तन, कृषि श्रमिकों की कमी, बढ़ती हुई लागत एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती प्रतिस्पर्धा से और भी प्रभावित होगा।
अब स्थान विशेष को ध्यान में रखते हुए कृषि में शोध किया जाना जरूरी है। नई तकनीकों में कोई खामी नहीं है लेकिन इनके उपयोग के तरीके में कुछ समस्याएं हैं। परंपरागत तकनीकों के साथ नवीन खोजों का उचित समावेश जरूरी है। प्रशिक्षण निदेशक एवं सस्य विज्ञान के विभागाध्यक्ष डॉ. केएस शेखर ने कहा कि सस्य विज्ञान विभाग विभिन्न शोध पत्रों के साथ विभिन्न तकनीकों का विकास कर चुका है।
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उन्होंने वर्तमान में अपनाई जाने वाली कृषि प्रणालियों में नवीन तकनीकों के समावेश करने पर जोर दिया। वास्तव में समुचित सस्य विज्ञान प्रथाओं को कृषि प्रबंधन के रूप में समान रूप से प्रयोग किया जा सकता है। प्राध्यापिका डॉ. सुनीता टी. पांडे ने प्रशिक्षण के विषय पर विस्तृत जानकारी दी। सह प्राध्यापिका डॉ. ओमवती वर्मा ने सभी का आभार जताया।
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विवि स्थित कृषि महाविद्यालय के डॉ. केसी शर्मा सभागार में डॉ. जे. कुमार ने कहा कि कृषि विकास आने वाले समय में विभिन्न चुनौतियों, जैसे घटती हुई कृषि योग्य भूमि, जल संसाधनों की कमी, जलवायु परिवर्तन, कृषि श्रमिकों की कमी, बढ़ती हुई लागत एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती प्रतिस्पर्धा से और भी प्रभावित होगा।
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अब स्थान विशेष को ध्यान में रखते हुए कृषि में शोध किया जाना जरूरी है। नई तकनीकों में कोई खामी नहीं है लेकिन इनके उपयोग के तरीके में कुछ समस्याएं हैं। परंपरागत तकनीकों के साथ नवीन खोजों का उचित समावेश जरूरी है। प्रशिक्षण निदेशक एवं सस्य विज्ञान के विभागाध्यक्ष डॉ. केएस शेखर ने कहा कि सस्य विज्ञान विभाग विभिन्न शोध पत्रों के साथ विभिन्न तकनीकों का विकास कर चुका है।
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उन्होंने वर्तमान में अपनाई जाने वाली कृषि प्रणालियों में नवीन तकनीकों के समावेश करने पर जोर दिया। वास्तव में समुचित सस्य विज्ञान प्रथाओं को कृषि प्रबंधन के रूप में समान रूप से प्रयोग किया जा सकता है। प्राध्यापिका डॉ. सुनीता टी. पांडे ने प्रशिक्षण के विषय पर विस्तृत जानकारी दी। सह प्राध्यापिका डॉ. ओमवती वर्मा ने सभी का आभार जताया।