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शंकराचार्य माधवाश्रम जी महाराज के निधन रुद्रप्रयाग के लिए बड़ी क्षति
Updated Fri, 20 Oct 2017 10:51 PM IST
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रुद्रप्रयाग। विद्वान संत, धर्म के मर्मज्ञ और शंकराचार्य माधवाश्रम के निधन से उनके पैतृक गांव बेंजी सहित पूरे जनपद में शोक की लहर छा गई है।
स्वामी माधवाश्रम जी का जन्म 1944 में अगस्त्यमुनि ब्लॉक के ग्राम पंचायत बेंजी में हुआ। उनका वास्तविक नाम केशवानंद था। प्रारंभिक शिक्षा गांव में ग्रहण करने के बाद उन्होंने हरिद्वार और अंबाला में सनातन धर्म संस्कृत कॉलेज और वृंदावन में बंशीवट में प्रभुदत्त ब्रह्मचारी जी के आश्रम, वाराणसी में भी वेदों-धर्मशास्त्रों का अध्ययन किया था। उन्होंने युवा काल में ही संन्यास ले लिया था। उनकी विद्वता को देखते हुए धर्म संघ के तत्वावधान में धर्म सम्राट करपात्री जी ने उन्हें जगन्नाथ पुरीपीठ के तत्कालीन शंकराचार्य स्वामी निरंजनदेव तीर्थ जी और काशी विद्वत परिषद ने उन्हें शंकराचार्य नियुक्त किया। वे धर्म और संस्कृति के लिए निरंतर जी-जान से कार्य करते रहे। उत्तराखंड में शराबबंदी, गैरसैंण राजधानी और गोरक्षा आंदोलन में उनकी अहम भूमिका रही है, लेकिन स्वास्थ्य में लगातार गिरावट के कारण उन्हें दिक्कतें होती रहीं। बीते वर्ष ब्रेन हैमरेज के कारण उनकी स्थिति काफी खराब हो गई थी। चंडीगढ़ में इलाज के बाद वे करीब चार माह तक कोटेश्वर मंदिर (रुद्रप्रयाग) में भी रहे।
बेंजी गांव के सर्वेश्वर प्रसाद बेंजवाल, महिमानंद बेंजवाल, जयदत्त बेंजवाल, आचार्य श्रीकांत बेंजवाल ने बताया कि माधवाश्रम जी के साथ बचपन की कई यादें आज भी जुड़ी हैं। वे शुरुआत से धार्मिक और ज्योतिष में उनकी रूचि रही है। उनका निधन, गांव ही नहीं वरन प्रदेश और देश के लिए अपूर्णीय क्षति है। इधर, साहित्यकार गिरीश बेंजवाल, पूर्व प्रधान मनोज बेंजवाल, जगदंबा बेंजवाल, कैलाश बेंजवाल, दीपक बेंजवाल ने बताया कि गंभीर बीमारी व न बोलने की स्थिति में भी वे अपने लोगों से इशारों में बातकर कुशलक्षेम पूछते थे। वरिष्ठ पत्रकार कैलाश खंडूरी व श्याम लाल सुंदरियाल ने बताया कि शंकराचार्य जी के प्रयास से ही कोटेश्वर में अस्पताल खोला गया था।
पहले पहाड़ी शंकराचार्य थे माधवाश्रम जी महाराज
संस्कृत ग्राम बेंजी गांव में जन्मे और देश के अलग-अलग क्षेत्रों में धर्म का ज्ञान अर्जित करने वाले विद्वान माधवाश्रम जी महाराज उत्तराखंड, विशेषकर पहाड़ी मूल के पहले शंकराचार्य भी थे। उन्होंने पहाड़ में धर्म, संस्कृति, शिक्षा, स्वास्थ्य के क्षेत्र में कई कार्य किए। यहीं नहीं, संस्कृत शिक्षा व ज्योतिष के प्रति वे युवा पीढ़ी को आगे बढ़ाने के लिए कार्य कर रहे थे। कोटेश्वर के महंत शिवानंद गिरि बताते हैं कि गंभीर बीमारी में होने के बाद भी वे निरंतर माला जाप करते थे।
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स्वामी माधवाश्रम जी का जन्म 1944 में अगस्त्यमुनि ब्लॉक के ग्राम पंचायत बेंजी में हुआ। उनका वास्तविक नाम केशवानंद था। प्रारंभिक शिक्षा गांव में ग्रहण करने के बाद उन्होंने हरिद्वार और अंबाला में सनातन धर्म संस्कृत कॉलेज और वृंदावन में बंशीवट में प्रभुदत्त ब्रह्मचारी जी के आश्रम, वाराणसी में भी वेदों-धर्मशास्त्रों का अध्ययन किया था। उन्होंने युवा काल में ही संन्यास ले लिया था। उनकी विद्वता को देखते हुए धर्म संघ के तत्वावधान में धर्म सम्राट करपात्री जी ने उन्हें जगन्नाथ पुरीपीठ के तत्कालीन शंकराचार्य स्वामी निरंजनदेव तीर्थ जी और काशी विद्वत परिषद ने उन्हें शंकराचार्य नियुक्त किया। वे धर्म और संस्कृति के लिए निरंतर जी-जान से कार्य करते रहे। उत्तराखंड में शराबबंदी, गैरसैंण राजधानी और गोरक्षा आंदोलन में उनकी अहम भूमिका रही है, लेकिन स्वास्थ्य में लगातार गिरावट के कारण उन्हें दिक्कतें होती रहीं। बीते वर्ष ब्रेन हैमरेज के कारण उनकी स्थिति काफी खराब हो गई थी। चंडीगढ़ में इलाज के बाद वे करीब चार माह तक कोटेश्वर मंदिर (रुद्रप्रयाग) में भी रहे।
बेंजी गांव के सर्वेश्वर प्रसाद बेंजवाल, महिमानंद बेंजवाल, जयदत्त बेंजवाल, आचार्य श्रीकांत बेंजवाल ने बताया कि माधवाश्रम जी के साथ बचपन की कई यादें आज भी जुड़ी हैं। वे शुरुआत से धार्मिक और ज्योतिष में उनकी रूचि रही है। उनका निधन, गांव ही नहीं वरन प्रदेश और देश के लिए अपूर्णीय क्षति है। इधर, साहित्यकार गिरीश बेंजवाल, पूर्व प्रधान मनोज बेंजवाल, जगदंबा बेंजवाल, कैलाश बेंजवाल, दीपक बेंजवाल ने बताया कि गंभीर बीमारी व न बोलने की स्थिति में भी वे अपने लोगों से इशारों में बातकर कुशलक्षेम पूछते थे। वरिष्ठ पत्रकार कैलाश खंडूरी व श्याम लाल सुंदरियाल ने बताया कि शंकराचार्य जी के प्रयास से ही कोटेश्वर में अस्पताल खोला गया था।
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पहले पहाड़ी शंकराचार्य थे माधवाश्रम जी महाराज
संस्कृत ग्राम बेंजी गांव में जन्मे और देश के अलग-अलग क्षेत्रों में धर्म का ज्ञान अर्जित करने वाले विद्वान माधवाश्रम जी महाराज उत्तराखंड, विशेषकर पहाड़ी मूल के पहले शंकराचार्य भी थे। उन्होंने पहाड़ में धर्म, संस्कृति, शिक्षा, स्वास्थ्य के क्षेत्र में कई कार्य किए। यहीं नहीं, संस्कृत शिक्षा व ज्योतिष के प्रति वे युवा पीढ़ी को आगे बढ़ाने के लिए कार्य कर रहे थे। कोटेश्वर के महंत शिवानंद गिरि बताते हैं कि गंभीर बीमारी में होने के बाद भी वे निरंतर माला जाप करते थे।
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