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पांडवों की विरासत को संजोए हुए रुद्रप्रयाग जिले के गांव
Updated Sun, 29 Oct 2017 09:50 PM IST
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रुद्रप्रयाग। जिले के गांवों में पांडव लीला का शुभारंभ हो गया है। जखोली ब्लाक के दरमोला गांव में पांडव अन्य देवी-देवताओं के साथ संगम स्नान करेंगे। इसके उपरांत अगले दो सप्ताह तक गांव में पांडव नृत्य होगा।
जनपद के भरदार, तल्लानागपुर सहित केदार, मंदाकिनी, मद्महेश्वर और तुंगनाथ घाटी के गांव पांडवों की विरासत को पांडव लीला के रूप में आज भी संजोए हुए हैं। कार्तिक मास की दशमी से गांवों में इस धार्मिक अनुष्ठान की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। एकादशी (इगास) के दिन इगास की प्रात: देवी-देवताओं को गंगा स्नान कराया जाता है। यहां पर पांडवों के शस्त्रों की विधिवत पूजा की जाती है। अनुष्ठान के साथ बाद देव निशान गांव पहुंचते हैं। पंचांग गणना के आधार पर शस्त्रों के साथ पांडव नृत्य की तिथि और तय दिन का निर्धारण किया जाता है और फिर 11 दिन से लेकर 45 दिन तक पांडव लीला का मंचन होता है। जनपद के दरमोला, कोटली, सेम, तरवाड़ी गांव के ग्रामीण प्रत्येक तीसरे वर्ष में सामूूहिक रूप से पांडव लीला का मंचन करते हैं। उधर, केदारघाटी के हुड्डू, करोखी, दिलमी, दैड़ा सहित 20 से अधिक गांवों में तीन से पांच वर्ष के अंतराल में यह अनुष्ठान होता है। बीते वर्ष जहां अगस्त्युनि के बीरों गांव में 45 वर्ष बाद पांडव लीला का आयोजन हुआ। वहीं, ऊखीमठ के उषाड़ा गांव में 42 वर्ष और पाली में 38 वर्ष बाद पांडव लीला हो रही है।
पांडव लीला को लेकर मान्यता
महाभारत युद्ध के बाद जब पांडव स्वर्गारोहिणी के लिए जा रहे थे, तो उन्होंने केदारघाटी के लोगों को अपने शस्त्र संभालने के लिए दिए थे। इस पर ग्रामीणों ने पांडवों से आग्रह किया था, कि उन्हें जब भी बुलाया जाए, वे उनके गांवों में आए। इसी परंपरा का निवर्हन आज भी पांडव लीला के रूप में होता है। पांडव लीला में शंकरनाथ, नृसिंह, हित, चामुंडा देवी, नागराजा सहित गांवों के कुल देवता भी शामिल होते हैं।
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इनका होगा मंचन
चक्रव्यूह, कमलव्यू, गैंडा-कौथिक, जयद्रथ वध, दुर्योधन वध सहित कई लीलाओं का मंचन होता है।
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जनपद के भरदार, तल्लानागपुर सहित केदार, मंदाकिनी, मद्महेश्वर और तुंगनाथ घाटी के गांव पांडवों की विरासत को पांडव लीला के रूप में आज भी संजोए हुए हैं। कार्तिक मास की दशमी से गांवों में इस धार्मिक अनुष्ठान की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। एकादशी (इगास) के दिन इगास की प्रात: देवी-देवताओं को गंगा स्नान कराया जाता है। यहां पर पांडवों के शस्त्रों की विधिवत पूजा की जाती है। अनुष्ठान के साथ बाद देव निशान गांव पहुंचते हैं। पंचांग गणना के आधार पर शस्त्रों के साथ पांडव नृत्य की तिथि और तय दिन का निर्धारण किया जाता है और फिर 11 दिन से लेकर 45 दिन तक पांडव लीला का मंचन होता है। जनपद के दरमोला, कोटली, सेम, तरवाड़ी गांव के ग्रामीण प्रत्येक तीसरे वर्ष में सामूूहिक रूप से पांडव लीला का मंचन करते हैं। उधर, केदारघाटी के हुड्डू, करोखी, दिलमी, दैड़ा सहित 20 से अधिक गांवों में तीन से पांच वर्ष के अंतराल में यह अनुष्ठान होता है। बीते वर्ष जहां अगस्त्युनि के बीरों गांव में 45 वर्ष बाद पांडव लीला का आयोजन हुआ। वहीं, ऊखीमठ के उषाड़ा गांव में 42 वर्ष और पाली में 38 वर्ष बाद पांडव लीला हो रही है।
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पांडव लीला को लेकर मान्यता
महाभारत युद्ध के बाद जब पांडव स्वर्गारोहिणी के लिए जा रहे थे, तो उन्होंने केदारघाटी के लोगों को अपने शस्त्र संभालने के लिए दिए थे। इस पर ग्रामीणों ने पांडवों से आग्रह किया था, कि उन्हें जब भी बुलाया जाए, वे उनके गांवों में आए। इसी परंपरा का निवर्हन आज भी पांडव लीला के रूप में होता है। पांडव लीला में शंकरनाथ, नृसिंह, हित, चामुंडा देवी, नागराजा सहित गांवों के कुल देवता भी शामिल होते हैं।
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इनका होगा मंचन
चक्रव्यूह, कमलव्यू, गैंडा-कौथिक, जयद्रथ वध, दुर्योधन वध सहित कई लीलाओं का मंचन होता है।