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दिव्यंगता की सीमा लांघ संगीता ने किस्मत को लिया बांध

Mon, 03 Jan 2022 08:15 PM IST
Dehradun Bureau देहरादून ब्यूरो
Updated Mon, 03 Jan 2022 08:15 PM IST
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Sangeeta crossed the limit of disability, tied her luck
विकलांग संगीता। - फोटो : ROORKEE
कौन कहता है कि आसमान में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों...। इस कहावत को चरितार्थ कर दिखाया है हरचंदपुर निवासी 28 वर्षीय दिव्यांग संगीता ने। उन्होंने यह साबित कर दिया कि हौसले अगर बुलंद हों तो दिव्यांगता भी सफलता की राह में बाधा नहीं बन सकती। बचपन में ही दोनों पैर गंवा चुकी संगीता आज अपनी मेहनत की बदौलत डेयरी का संचालन कर रही हैं और अपने पिता के साथ काम में भी हाथ बंटाती हैं।
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हरचंदपुर निवासी संगीता ने बचपन में ही बुखार के बाद अपने दोनों पैर गंवा दिए, लेकिन हिम्मत नहीं हारी। समय के साथ दिव्यांगता को बौना साबित कर उन्होंने स्वरोजगार अपनाया और पिता का भी सहारा बनीं। संगीता की तीन बहनें और दो भाई हैं। एक भाई का वर्ष 2007 में सड़क हादसे में निधन हो गया था। बेटे की मौत से पिता सदमे में रहने लगे और बीमार हो गए। इसके बाद संगीता ने घर की जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठा ली। पिता की बंद हो चुकी दूध की डेयरी को फिर से खोला।
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वर्तमान में संगीता खेत से चारा लाने के बाद डेयरी पर दूध एकत्र करती हैं। डेयरी का काम निपटाने के बाद पिता को मंडावली गांव स्थित जनरल स्टोर पर छोड़ने ले जाती हैं। इसके बाद बैंक संबंधित काम निपटाकर गांव में ही दुकान पर बैठती हैं। शाम को डेयरी का काम निपटाकर अपने पिता को वापस लेने जाती हैं। संगीता का कहना है कि वह सरकारी नौकरी की तैयारी भी कर रही हैं, लेकिन घर बैठे परिवार वालों पर बोझ बनने के बजाय उनका सहारा बन रही हैं। वह कहती हैं कि हौसले बुलंद हों तो रास्ते भी खुद बन जाते हैं। युवा वर्ग को स्वावलंबी बनना चाहिए। संवाद
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काम के साथ नौकरी की तैयारी भी
डेयरी का संचालन कर संगीता स्वावलंबी बन गई हैं, लेकिन उन्होंने पढ़ाई नहीं छोड़ी। काम के साथ-साथ पढ़ाई करते हुए एमकॉम किा। अब जितना भी समय बचता है, उसे पढ़ाई में लगाती हैं। संगीता के अनुसार, वे सरकारी नौकरी की तैयारी कर रही हैं। जब तक आयु सीमा है, वह नौकरी के लिए तैयारी करती रहेंगी। अपने छोटे भाइयों को भी पढ़ने के लिए लगातार प्रेरित करती रहती हैं।
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