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1837 के अकाल से आहत हुए कॉटले ने खींचा था गंगनहर का खाका
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मानवीय त्रासदी से उठे दर्द से मानव जाति को राहत दिलाने की प्रेरणा से गंगनहर का निर्माण हुआ था। ये उस समय की बात है जब वर्ष 1837 में आगरा में भयंकर अकाल पड़ा। इससे करीब आठ लाख लोगों की अकाल मृत्यु हो गई थी। इसकी भयंकर पीड़ा कॉटले के दिल को छू गई और काफी दुरूह दिख रहे गंगनहर के निर्माण कार्य को पूरा करने के लिए उन्हें मजबूर कर दिया। अंग्रेजी हुक्मरानों ने कभी ऐसा अकाल नहीं देखा था जिसमें उस जमाने में अकाल पीड़ितों के लिए दस लाख रुपये खर्च किए गए थे। ऐसे में कॉटले को मानवता को सिंचित करने के साथ ही अंग्रेजी हुकूमत के लिए राजस्व के नए द्वार खोलने का भी चुनौतीपूर्ण मौका मिला।
गंगनहर निर्माण के पीछे कई रोचक पहलू हैं। 168 साल पहले अपनी तरह के पहले और सबसे नए काम को अंजाम देने की सोच कहां से पैदा हुई, यह जानना भी बेहद दिलचस्प है क्योंकि गंगनहर के निर्माण का काम भावनात्मक कारण उपजे बिना नहीं हो सकता था। दिल्ली गजट में दिए गए तथ्यों के अनुसार, एक-एक कर कई पहलू उभरकर सामने आते हैं। इसके अनुसार वर्ष 1837-38 में आगरा में भयंकर अकाल पड़ा था। इसमें आठ लाख लोगों की मृत्यु हुई और मानवता दीनहीन होकर अन्न के एक-एक दाने को तरस गई। उस समय अंग्रेज अधिकारियों का इस भयंकर चुनौती से सामना हुआ। बताया जाता है कि अंग्रेजों ने इतनी खराब परिस्थिति पहले कभी नहीं देखी थी। इस दौरान अंग्रेजी सरकार ने अकाल से निपटने के लिए मदद कार्यों में दस लाख रुपये की रकम खर्च की थी।
इसके चलते ईस्ट इंडिया कंपनी को भारी राजस्व हानि उठानी पड़ी थी। इस अकाल को देखकर प्रोबी थॉमस कॉटले का हृदय द्रवित हो उठा। उन्होंने अपने सीनियर जॉन कॉल्विन की प्रेरणा से गंगनहर के निर्माण का खाका खींचना शुरू किया। कॉटले इस काम के लिए नवंबर 1836 में पहली बार हरिद्वार आए थे। इस दौरान उन्होंने हरिद्वार से रुड़की के बीच पहाड़ी नदियों के कारण ऊबड़-खाबड़ हो चुके भूभाग पर गंगनहर निकालने को मुश्किल करार दिया था लेकिन अकाल पीड़ितों की पीड़ा ने उन्हें फिर से सोचने पर मजबूर किया। इसके बाद दिसंबर 1849 में वह फिर गंगनहर निर्माण की योजना बनाने हरिद्वार आए। इसके बाद 1854 में उन्होंने 16 साल पहले बुने सपने को पूरा करने में सफलता हासिल की।
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रुड़की तक बनी गंगनहर ने ही लिखी थी सिविल इंजीनियरिंग के करिश्मे की इबारत
वैसे तो गंगनहर के निर्माण को पूरा होने में करीब आठ साल लगे थे, लेकिन जिस दिन से गंगनहर के निर्माण की सोच शुरू हुई, उसके 16 साल बाद कल्पनाओं की गंगनहर धरातल पर उतर पाई थी। खास बात ये थी कि कानपुर तक बनाई गई गंगनहर में सबसे ज्यादा चुनौती हरिद्वार से रुड़की के बीच थी। नदियों के ऊपर से गंगनहर को ले जाना और उबड़ खाबड़ जमीन के चलते करीब डेढ़ करोड़ की योजना का 45 प्रतिशत हिस्सा इस छोटे से टुकड़े में ही खर्च हो गया था। हरिद्वार से रुड़की के बीच का यही हिस्सा ऐसा था जो सिविल इंजीनियरिंग के नायाब नमूने की इबारत के रूप में इतिहास में दर्ज हुआ।
कॉटले ने हरिद्वार भ्रमण के बाद सबसे पहला प्रोजेक्ट 30 जून 1840 को और एक पूरक रिपोर्ट 15 अगस्त 1840 को बोर्ड को सौंपी थी। जिसे इंजीनियरों की एक कमेटी ने योग्य करार दिया। जिसके बाद आगरा गर्वमेंट ने 25 फरवरी 1842 को नहर का निर्माण शुरू कराने का आदेश दे दिया। 16 अप्रैल 1842 को कनखल और हरिद्वार के बीच खुदाई का काम धीमी गति से शुरू हुआ। जिसे जल्दी ही रोकना पड़ गया। सिंचाई नहर व नेवीगेशन नहर का विवाद और गंगनहर के पानी से मलेरिया के मच्छर पैदा होने जैसे डर और विवादास्पद विषयों के अलावा सतलज युद्ध आदि कारणों के चलते यह योजना लंबित हो गई, लेकिन 1840 में नॉर्थ वैस्टन प्रोविंस के लेफ्टिनेंट गवर्नर जेम्स थॉमसन और कॉटले के उत्साहजनक अनुरोध ने ईस्ट इंडिया कंपनी को फिर से इस योजना को शुरू करने के लिए राजी कर लिया। जिसके बाद तीन मार्च 1847 में भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड हार्डिंज ने रुड़की में प्रस्तावित सोलानी एक्वाडक्ट प्रोजेक्ट का स्थलीय निरीक्षण किया। इसके बाद गंगनहर के निर्माण कार्य ने गति पकड़ी। गंगा के तीव्र प्रवाह को देखते हुए हरिद्वार से ही गंगनहर निकालने की कॉटले की जिद ने उन्हें काफी परेशान किया। सबसे ज्यादा मुश्किल हरिद्वार से रुड़की के बीच निर्माण में हुई। गंगनहर निर्माण को छह डिवीजनों में बांटा गया था। जिसमें पहले डिवीजन में हरिद्वार से रुड़की के बीच गंगनहर के निर्माण में पथरी, रतमऊ, सोलानी जैसी पड़ने वाली नदियां बाधा पैदा कर रही थी। वहीं उबड़-खाबड़ भूमि चुनौती दे रही थी, लेकिन सर प्रोबी कॉटले ने न हिम्मत हारी और न हार मानी। इस दुरुह कार्य को पूरा करके दिखाया। हालांकि कुल गंगनहर की लंबाई के इस मार्ग आठ प्रतिशत हिस्से में कुल खर्च हुए डेढ़ करोड़ का 45 प्रतिशत धन खर्च हो गया, लेकिन इस हिस्से में बनी गंगनहर सिविल इंजीनियरिंग के करिश्मे के रूप में एक नई इबारत लिख गई।
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गंगनहर निर्माण के पीछे कई रोचक पहलू हैं। 168 साल पहले अपनी तरह के पहले और सबसे नए काम को अंजाम देने की सोच कहां से पैदा हुई, यह जानना भी बेहद दिलचस्प है क्योंकि गंगनहर के निर्माण का काम भावनात्मक कारण उपजे बिना नहीं हो सकता था। दिल्ली गजट में दिए गए तथ्यों के अनुसार, एक-एक कर कई पहलू उभरकर सामने आते हैं। इसके अनुसार वर्ष 1837-38 में आगरा में भयंकर अकाल पड़ा था। इसमें आठ लाख लोगों की मृत्यु हुई और मानवता दीनहीन होकर अन्न के एक-एक दाने को तरस गई। उस समय अंग्रेज अधिकारियों का इस भयंकर चुनौती से सामना हुआ। बताया जाता है कि अंग्रेजों ने इतनी खराब परिस्थिति पहले कभी नहीं देखी थी। इस दौरान अंग्रेजी सरकार ने अकाल से निपटने के लिए मदद कार्यों में दस लाख रुपये की रकम खर्च की थी।
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इसके चलते ईस्ट इंडिया कंपनी को भारी राजस्व हानि उठानी पड़ी थी। इस अकाल को देखकर प्रोबी थॉमस कॉटले का हृदय द्रवित हो उठा। उन्होंने अपने सीनियर जॉन कॉल्विन की प्रेरणा से गंगनहर के निर्माण का खाका खींचना शुरू किया। कॉटले इस काम के लिए नवंबर 1836 में पहली बार हरिद्वार आए थे। इस दौरान उन्होंने हरिद्वार से रुड़की के बीच पहाड़ी नदियों के कारण ऊबड़-खाबड़ हो चुके भूभाग पर गंगनहर निकालने को मुश्किल करार दिया था लेकिन अकाल पीड़ितों की पीड़ा ने उन्हें फिर से सोचने पर मजबूर किया। इसके बाद दिसंबर 1849 में वह फिर गंगनहर निर्माण की योजना बनाने हरिद्वार आए। इसके बाद 1854 में उन्होंने 16 साल पहले बुने सपने को पूरा करने में सफलता हासिल की।
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रुड़की तक बनी गंगनहर ने ही लिखी थी सिविल इंजीनियरिंग के करिश्मे की इबारत
वैसे तो गंगनहर के निर्माण को पूरा होने में करीब आठ साल लगे थे, लेकिन जिस दिन से गंगनहर के निर्माण की सोच शुरू हुई, उसके 16 साल बाद कल्पनाओं की गंगनहर धरातल पर उतर पाई थी। खास बात ये थी कि कानपुर तक बनाई गई गंगनहर में सबसे ज्यादा चुनौती हरिद्वार से रुड़की के बीच थी। नदियों के ऊपर से गंगनहर को ले जाना और उबड़ खाबड़ जमीन के चलते करीब डेढ़ करोड़ की योजना का 45 प्रतिशत हिस्सा इस छोटे से टुकड़े में ही खर्च हो गया था। हरिद्वार से रुड़की के बीच का यही हिस्सा ऐसा था जो सिविल इंजीनियरिंग के नायाब नमूने की इबारत के रूप में इतिहास में दर्ज हुआ।
कॉटले ने हरिद्वार भ्रमण के बाद सबसे पहला प्रोजेक्ट 30 जून 1840 को और एक पूरक रिपोर्ट 15 अगस्त 1840 को बोर्ड को सौंपी थी। जिसे इंजीनियरों की एक कमेटी ने योग्य करार दिया। जिसके बाद आगरा गर्वमेंट ने 25 फरवरी 1842 को नहर का निर्माण शुरू कराने का आदेश दे दिया। 16 अप्रैल 1842 को कनखल और हरिद्वार के बीच खुदाई का काम धीमी गति से शुरू हुआ। जिसे जल्दी ही रोकना पड़ गया। सिंचाई नहर व नेवीगेशन नहर का विवाद और गंगनहर के पानी से मलेरिया के मच्छर पैदा होने जैसे डर और विवादास्पद विषयों के अलावा सतलज युद्ध आदि कारणों के चलते यह योजना लंबित हो गई, लेकिन 1840 में नॉर्थ वैस्टन प्रोविंस के लेफ्टिनेंट गवर्नर जेम्स थॉमसन और कॉटले के उत्साहजनक अनुरोध ने ईस्ट इंडिया कंपनी को फिर से इस योजना को शुरू करने के लिए राजी कर लिया। जिसके बाद तीन मार्च 1847 में भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड हार्डिंज ने रुड़की में प्रस्तावित सोलानी एक्वाडक्ट प्रोजेक्ट का स्थलीय निरीक्षण किया। इसके बाद गंगनहर के निर्माण कार्य ने गति पकड़ी। गंगा के तीव्र प्रवाह को देखते हुए हरिद्वार से ही गंगनहर निकालने की कॉटले की जिद ने उन्हें काफी परेशान किया। सबसे ज्यादा मुश्किल हरिद्वार से रुड़की के बीच निर्माण में हुई। गंगनहर निर्माण को छह डिवीजनों में बांटा गया था। जिसमें पहले डिवीजन में हरिद्वार से रुड़की के बीच गंगनहर के निर्माण में पथरी, रतमऊ, सोलानी जैसी पड़ने वाली नदियां बाधा पैदा कर रही थी। वहीं उबड़-खाबड़ भूमि चुनौती दे रही थी, लेकिन सर प्रोबी कॉटले ने न हिम्मत हारी और न हार मानी। इस दुरुह कार्य को पूरा करके दिखाया। हालांकि कुल गंगनहर की लंबाई के इस मार्ग आठ प्रतिशत हिस्से में कुल खर्च हुए डेढ़ करोड़ का 45 प्रतिशत धन खर्च हो गया, लेकिन इस हिस्से में बनी गंगनहर सिविल इंजीनियरिंग के करिश्मे के रूप में एक नई इबारत लिख गई।